Monday, March 10, 2008

ग़ज़ल

-शाशिष कुमार तिवारी
दर्द अपना बना के पराया किये जाने का तुम क्या जानोगे
दर्द सब कुछ पाकर खो जाने का तुम क्या जानोगे

तुम क्यों रोओगे तुम्हे आंसुओं की जरुरत नहीं
दर्द सताए जाने का आखिर तुम क्या जानोगे

तुमने तो हर बात को हलके से लिया जिन्दगी भर
बोझ शब्दों का दिल पर आखिर तुम क्या जानोगे

तुम तो एक पेड़ हो तो पत्तों के अलग होने का तुम्हें क्या गम
पत्तों के बेघर हो जाने का दर्द आखिर तुम क्या जानोगे

तुम्हारे लिए किसी का दुःख - दर्द तुम्हारा नहीं है
प्रेम सबों को अपना समझने का आखिर तुम क्या जानोगे

आदर्श कालोनी , बहादुरपुर , भूतनाथ रोड , पटना -२६

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