Tuesday, March 18, 2008

गुलाब की आग

डॉ० आलोक गुप्त
तुमने देखा है
कसमसाते हुए
अन्दर की आग को
बाहर आते हुए
लो हँसने लगा गुलाब
अपनी लपटों में
खिंची आ रही है
दूर से तितली
उसने पी लिया है
आग को
भटकने लगी है
बेचैन
सार्थकता देने के लिए
गुलाब की आग को

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