Sunday, March 16, 2008

जो लौटकर नहीं आयेंगे

- मूल लेखक - इलियास अहमद गद्दी
लिप्यान्तरण - डॉ० शगुफ्ता नियाज

जरा सा हाथ काँपा था। चुल्लू भर चाय छलक कर टे्र से गिरी थी। फिर सईदा खाला अपने आप पर काबू पा लिया था। उन्होंने रफअत के चेहरे को गौर से देखा फिर मतानत से बोली, ''तुम्हें इसलिए बुलाया था कि अकेला घर एकदम वीरान लगता है सारा दिन हम दो आदमी इतने बड़े घर में रूहों की तरह इधर से उधर फिरते रहते हैं।''
रफअत ने देखा वाकई सजा-सजाया सीटिंग रूम भाँय-भाँय कर रहा था। मजीद खालू एक सोफे में धंसे अख्बार पढ़ने में मसरूफ थे, कोई हरकत नहीं, कोई आवाज नहीं, जैसे इस कमरे की दूसरी अशिया (वस्तुएँ) की तरह वह भी उसकी सजावट का एक जुज्ज (अंग) हो। अलमारियों और रैकों में सजी हुई किताबे पढ़ने वालों को तरस रही थीं। रेडियोग्राम को पिछले साल घर से किसी ने हाथ तक नहीं लगाया। रंगीन टी०वी० का बस इतना मसरफ़ (उपयोग) है कि ख़बरों के वक्त चालू किया फिर बन्द। मजीद ख़ालू दिन भर अखबारों और रिसालों पर वर्क गिरदानी (पृष्ठ पलटना) में वक्त गुजार लेते हैं मगर सईदा ख़ाला...? खाला ने खाना बनाने वाली नौकरानी की छुट्टी कर दी है। अब वह अपने हाथ से खाना बनाती है। उन्हें खाना बनाने का शौक नहीं है। मगर पहाड़ सा दिन गुजरने के लिये और कोई शगल भी न था। कम से कम बावर्ची खाने में बर्तनों की खड़खड़ाहट से कुछ वक्त तो गुजर ही जाता था।
सईदा खाला ने फिर अपनी बात शुरू की।
''तुम्हें इसलिए बुलवाया था कि तुम्हारी शहर में बहुत जान-पहचान है बल्कि दूसरे शहरों के लोग तुमको जानते हैं। हम लोग चाहते हैं कि हमारी मदद करो।''
वह हमातन गोश (ध्यान से सुनने के लिये कान लगाना) हो गया। मगर खाला आगे कुछ बोली नहीं। उन्होंने मजीद खालू की तरफ देखा जैसे कुछ पूछना चाहती हो या कुछ कहने से पहले उनकी रजामन्दी समझती हो मगर वह अख़बार में दफ़न थे। कुछ झुझलाकर खाला ने बात को आगे बढ़ाया।
''हम चाहते है कि घर फरोख्त हो जाये''
उसने चौंककर सईदा खाला की तरफ देखा। उसकी आँखों में जो सवाल था उसको समझते देर नहीं लगी खाला को, बोलीं ''जर्री जबसे गई है एक-एक दिन काटना मुश्किल हो गया है। हम भी चाहते हैं कि बच्चों के पास चले जायें बेमतलब बैठकर अपनी कब्र पर फातेहा पढ़ने रहने की बात अजीब सी लगती है।''
बड़ा लड़का कमाल अमेरिका में था, छोटा लड़का जमाल कनाडा में। और अब साल भर से जर्री भी जमाल के बुलावे पर कनाडा पहुँच गयी थी। सारा काम मजीद खालू के मनसूबे के एैन मुताबिक हुआ था। वह ऐसे आदमी थे जिनके बारे में कहा जा सकता है कि वह सूरज पर भी कमन्द (पाश) डाल सकते हैं। गो अब पिरानासाली (वृद्धा अवस्था) गिरा था। डॉक्टरों ने बचा तो लिया मगर एक पाँव में लँग आ गया। अब वह लंगड़ा-लंगड़ाकर इधर-उधर फिरने से मुनासिब समझते थे कि घर में बैठकर अख़बार पढ़ा करें। कनाडा में जर्री की भी नौकरी लग गयी है किसी फर्म में पैकिट पर लेबिल चिपकाने का काम। बहुत हल्का काम है और बहुज ज्यादा तनख्वाह। तीनों बच्चे बालदैन को इतने भेज देते हैं कि खर्च करके थक जाते हैं। जब भी कुछ न कुछ बच जाता है। चुनाचे कई मदरसो और यतीमखानों का वजीफा बाँध रक्खा है।
खाला सोफे से उठीं तो घुटनों पर हाथ रखकर जैसे सीधे-सीधे मुमकिन ही न रहा हो, बोली, ''उम्र होने को आयी घुटनों में दर्द रहने लगा है। आँखें कमजोर पड़ रही है। सोचती हूँ कि जर्री के पास रहूँ तो....''
जर्री....? एक जर्री, रौशन, जगमगाती लक़ीर, यादों के वसी (विस्तृत) स्याह आसमान को यहाँ से वहाँ तक उजालती चली जाती है।
''ऐ भाई जान आप इतना मोटा खद्दर का कुर्ता पहनते हैं। गर्मी नहीं लगती है आपको?''
एयर कूलर की हवा से उसके रूखे रेशमी बाल उड़ रहे होते बारीक दुपट्टा कभी गर्दन से लिपटा, कभी रूखसारों को छूता कभी शानू (कंधों) से लिपट जाता।
''ऐसा है बीबी....'' वह उसे एक छोटी सी बच्ची की तरह समझाने लगता।'' ऐसा है बीबी जिन्दगी कई सतहों पर जी जाती है। कुछ लोग रेशम में और कुछ लोग खद्दर में लिपट कर जीते हैं। कुछ लोग ठंड से एयर कूलर कमरों में सोते हैं और कुछ तपती दोपहर की लौ में। कोई अपने लिए सिर्फ अपने लिए जीते हैं और कोई दूसरों के लिये सिर्फ दूसरों के लिये जीता है। अपनी-अपनी पसन्द है। अपना-अपना जीने का अन्दाज है।''
वह ऊब गई थी।
''बस यही पागलपन वाली बातें मेरी समझ में नहीं आती। आखिर यह गाँव-गाँव धूल फाँकने, जलती दोपहर में मारे-मारे फिरने से क्या मिल जाता है?''
''किस्सा यह है बीबी सदियों से जंगलों में बेजरर (निरापद) हिरनों का शिकार होता रहा है। शिकारी आते, कुछ हिरनों का शिकार करते और चल देते, उनके बच्चों को उठाकर ले जाते। उनकी चारागाहें बरबाद कर देते। न कोई दाद न फरियाद। मगर अब ऐसा हुआ है कि इन बेजरर हिरनों ने अपनी मदाफ़ियत (आत्मरक्षा) शुरू कर दी है बल्कि जवाबी हमला भी करने लगे है। यह अजीबोगरीब वाकिया है। सदियों में पहली बार ऐसा हुआ है इसलिए शिकारियों में दहशत फैल गयी है। मैं उन्हीं बेजरर हिरनों के लिये काम करता हूँ।''
जर्री समझती है इस बात को। वह बिहार के जमींदारों और खेत-मजदूरों के बारे में भी जानती है। उसको मालूम है कि इन्तेकाम दर इन्तेकाम के इस खेल में कितना ख़ून इस सूख़ी जमीन ने जज्ब किया है। इसलिए वह हिरासा (लाचारी) नजरों से रफअत को देखती है देखती रहती है। यहाँ तक कि उसकी आँखों में आँसुओं की चमक इतनी वाजेय हो जाती है कि रफअत को बर्दाश्त करना मुश्किल हो जाता है।
जर्री बहुत खूबसूरत है और जितनी खूबसूरत है उतनी ही मासूम भी। माँ ने बचपन में शायद जब वह पैदा हुई थी उस वक्त उसकी कलाई पर काला धागा बाँध दिया था।
''यह मेरी बहू है आज से। रफअत की दुल्हन।''
मजीद खालू बहुत हंसे थे।
''भाई अभी तो रूख्सत करने से रहे आपकी बहू को क्योंकि अभी तो उसकी माँ को भी साथ भेजना होगा।''
दोनों खानदान एक से थे। मजीद खालू को दो लड़कों के बाद यह लड़की हुई थी। और खलीक मियाँ की बस एक ही औलाद थी रफअत.....रफअत इकलौती औलाद नाजनेम (लाड़ प्यार) में पल रहे थे। पचासों बीघा खेत थे। लम्बा-चौड़ा खपरैल का सही, घर था। बीसियों जानवर, नौकर-चाकर। मजीद खालू की तरह टुटपुन्जे क्लर्क नहीं थे। शहर में रहकर जितना साहब बन ले मगर खलीक मियाँ के पासंग भी नहीं थे।
आदमी की किस्मत हिन्दुस्तान के मौसमों की तरह गैर यकीनी है। पता नहीं कब बारिश हो और कब सूखा पड़ जाये। सो एक दिन अचानक खलीक मियाँ के हाथों खेत के झगड़ों में एक आदमी का खून हो गया। मुकदमा चला। सारे जेवरात, कीमती सामान, सारी ज+मीन हवा में तहलील (घुल गयी) हो गयी। फायदा भी कुछ नहीं हुआ। पाँच साल की सजा भी हो गयी। इस सजा के दौरान उनकी मौत वाकेअ हो गयी। और एक हँसता-खेलता खानदान बड़े जमींदार के साजिशों का शिकार हो गया। रफअत ने पढ़ाई बन्द नहीं की। अपनी पुरानी खड़खड़ाती साइकिल पर रोजाना कॉलेज जाते रहे और एम.ए. पास कर लिया।
इधर मजीद ख़ालू के दिन फिरे। उनके बड़े लड़के कमाल को अमेरिका में नौकरी मिल गयी फिर दूसरा लड़का जमाल भी कनाडा चला गया और कोई साल भर से जर्री भी कनाड़ा में नौकरी कर रही थी। ऐसे जैसे किसी सूखे तालाब में कई नदियों ने पानी उडेल दिये हो। देखते ही देखते सूखा तालाब लबालब भर गया।
अब वह रफअत को पसन्द नहीं करते। बहुत अरसे से नहीं करते। उसका अपने घर आना-जाना भी अच्छा नहीं लगता। कई बार तो उन्होंने अपनी बीबी से साफ-साफ कह दिया कि रफअत हमारे घर न आया करे। सईदा खाला ने कभी उसे इशारतन भी मना नहीं किया बल्कि वकतन-फवकतन किसी से खबर भिजवाकर बुलवा भी लेती। मजीद खालू को यह सब कुछ बहुत नागवार लगता मगर वह ऐसे आदमी थे जो हर काम सब्र व तहम्मुल (संयम) से करने के आदी थे। वह शदीद (अत्याधिक) गुस्से के आलम में भी आपे से बाहर नहीं होते। जर्री कनाडा जाने लगी तो रफअत से मजीद खालू की लम्बी बातचीत हुई थी।
मजीद खालू ने अपने पत्थर जैसे बेहिस आँखों से उनकी तरफ देखकर पूछा था.... ''क्यों? तुमको लड़कियों का गैर-मुल्क में बसना मुनासिब नहीं मालूम होता।''
''क्यों? क्या तुम चाहते हो कि वह यही घुट-घुटकर मर जायें? पाँच-पाँच सौ की नौकरियों के लिये पाँच सौ दफ्तरों का तवाफ (परिक्रमा) करते रहें जैसे तुम करते हो?''
ये बरायेरास्त हमला था। वह रसूलपुर के एक खपरैल के मकान में रहता है। वहाँ न रंगीन टी०वी० है, न फ्रिज है, न कूलर है, न सोफासेट है। जो आसाइश (समृद्धि) इस घर में मयस्सर है वह वहाँ के ख्वाब है। लेकिन जिन्दा रहने के लिये यह सारा आराम शर्त कब है? एक ऐसा मुल्क जिसकी चौथाई आबादी भूखी सोती है जहाँ लोगों को तन ढकने को कपड़ा मयस्सर नहीं, जहाँ लाखों लोग बगैर इलाज और दवा के सीधे मौत के मुँह में चले जाते हैं, वहाँ ऐशो आराम की ख्वाहिश एक अखलाकी जुर्म के सिवा क्या है?
वह बहुत संजीदगी से जवाब देता है और बहुत नरमी से।
''इन तमाम आसाइशों के बगैर भी जिन्दा रहा जा सकता है। हम सिर्फ अपना क्यों सोचें? इस पचास करोड़ आबादी वाले मुल्क में यह खुदगर्जी है।''
वह चीबाजबीं (काठमार जाना) हो गये थे।
''तुम अजीब तरह से सोचते हो। आखिर इस मुल्क में हमारा क्या हिस्सा है? नौकरी मिलती है हमको? बड़े कारोबार? ठेके? जो लोग कल तक जूतियाँ सीधी करते थे वह आज सर पर चढ़े बैठे हैं।''
''आप के सोचने का अन्दाज भी ग़लत है। वफादारी बशर्त इस्तवारी...(स्थायित्व की शर्त)
मजीद खालू एकदम से चिढ़ गये।
''क्या मिला तुमको इस वफादारी का सिला। पाँच बरस हो गये तुमको कॉलेज छोडे। एक नौकरी.... एक मामूली नौकरी की तो किसी ने बतौर सिलाए वफादारी (वफादारी का सिला) तुम्हारी झोली में नहीं डाली।''
''जो लोग जिन्दगी को एक अच्छी सरकारी नौकरी तक महदूद कर लेते हैं। वह सुखी रहते हैं उनको मजीद कुछ और नहीं सोचना पड़ता। मुल्क के बारे में न मुल्क की गरीबी और खस्ताहाली के बारे में, न आसपास फैले जबर व इस्तेह साल (अत्याचार व शोषण) के बारे में। बस महीना बजट के हिसाब से जिन्दगी गुजारते जाओ।''
मजीद खालू ने अपने गुस्से तपते हुए दिमाग को अचानक अपने काबू में कर लिया। वह ऐसे हालात में अपने ऊपर क़ाबू पा लेने की हैरतअंगेज सलाहियत रखते थे। उन्होंने रफ़अत को नरमी से समझाया था।
''इन फजूलियात में पड़कर वक्त जाया करने की कौन सी तुक है। ये बात मेरी समझ में नहीं आती। तुम्हारे लिए खुला मैदान है। कमाल या जमाल जिससे भी कहो, तुम्हारा इन्तेजाम कर देगा। मियाँ तुम्हारी किस्मत बदल जायेगी।''
किस्मत बदलने के लिये ही तो वह यह सब कुछ कर रहा था। उन हजारों लाखों लोगों की किस्मत जो रोज जीते हैं रोज मरते हैं। जो खेतों की कड़ी धूप में अपना लहू जलाते हैं और बदले में भूख और जिल्लत पाते हैं।
मजीद खालू बहुत मुश्किल में है कि वह जर्री का क्या करें? रफ़अत कुछ करता नहीं। गाँव-गाँव घूम कर लीडरी करता है। न घर है न गृहस्थी। ऐसी हालत में वह क्या करें? ये बात उनकी समझ में नहीं आती। एक तरफ लड़की का मुस्तकबिल है। उसकी रफअत के लिये बहुत मुहब्बत है जो उसके दिल में नमू (उर्वरा)पाकर अब इतनी तनावर (विस्तृत) हो गयी थी कि उसका उखाड़ फेंकना मुश्किल लग रहा है। दूसरी तरफ अपनी मरहूम साली को दिया गया वादा है। समझौते की एक राह हुनूज बच रही है या यूँ कह लें कि तमाम मुश्किलों का एक बेहतरीन हल सामने पड़ा है। यानी रफअत अमेरिका, कनाडा या इंग्लैण्ड चला जाये और एक नई और खूबसूरत जिन्दगी का आगाज करें। यही ख्वाहिश जर्री की भी थी लेकिन रफअत किसी तरह हिन्दुस्तान छोड़ने को तैयार न था और अब मजीद खालू उससे बहुत ख़फा रहते थे। जिस आदमी को अपनी जिन्दगी बनाने की फिक्र न हो यह एक पूरी गृहस्थी कैसे चलायेगा।
जर्री रफअत को चाहती है। ये बात सब जानते हैं। खुद रफ़अत भी जानता है। जर्री ने उसको कई बार अपनी मुहब्बत का वास्ता दिया। उससे तकरीबन लिपट कर रोई, जिद की, रूठी मगर कोई हथियार कारगर न हुआ। वह बस इसी बात पर अड़ा रहा कि वह अपनी दिन-ब-दिन तारीफ होती दुनिया न छोड़ेगा। उसको जर्री से भी प्यारी कोई शय है। यही बात जर्री को बहुत खलती है। और बिलाखिर (अन्ततः) उसने इसी गुस्से में कनाड़ा जाने का फैसला कर लिया।
वह कौन सी शय है जो उसको जर्री से भी प्यारी है । ये बात भी ज+र्री जानती है। वह रात दिन कितने ख़तरों में रहता है। ये भी उसको मालूम है। कोई भी दिन उसकी जिन्दगी का आखिरी दिन हो सकता है और कोई भी लम्हा आखिर लम्हा। बड़े किसानों और बे जमीन, खेत, मजदूरों के टकराव के दरम्यान वह कहीं रहता है। महीनों गाँवों और जंगलों में छिपता है। दुश्मन मौत के हरकारों की तरह ढूँढते हैं। पुलिस किसी अच्छे मौके की तलाश में रहती है । अनगिनत खतरों के बीच वह एक खुश आइन्द मुस्तकबिल (सुखद भविष्य) के ताने बाने बिन रहा है। मजीद खालू उसे पागल कहते हैं मगर ज+र्री को उस से हमदर्दी है। वह खाएफ़ (डरा हुआ) भी बहुत है और शायद इसी खौफ़ की वज+ह से वह चाहती है कि रफ़अत यहाँ से दूर चला जाए। चुनांचे कनाडा जाने से दो दिन पहले रफअत का हाथ पकड़कर जिद कर बैठी थी।
''रफअत खुदा के लिये बात को समझने की कोशिश करो। मैं जानती हूँ कि तुम बहुत ऊँचा और बड़ा काम कर रहे हो। मगर मेरी मुहब्बत बचपन से लेकर आज तक बेपनाह मुहब्बत, क्या कोई अहमियत नहीं रखती? खुदा के लिये मेरी बात मान लो। मेरे साथ चले चलो। जिन्दगी में शायद फिर कोई ऐसा मौका न आयेगा।''
उसने जर्री के फरते जज्बात से कंपकपाते चेहरे को दोनों हथेलियों में बाँध लिया। उसकी आँखों में दूर तक गहराई तक शायद कोई पाताल तक देखा था और भरे गले से बोला था।
''बीबी सब कुछ एकदम गैर यकीनी है। मैं जिस रास्ते पर चल रहा हूँ वह कब और कहा खत्म हो जायेगा कुछ कहना मुश्किल है इसलिए अब तो तुम से ये भी नहीं कह सकता कि मेरे साथ रूक जाओ। जिन्दगी में जिसको चाहा और दुनिया की हर शय से ज्याद चाहा तुम हो... सिर्फ तुम। और इसलिए तुम्हें चाहता कि मेरे साथ इस गैर यकीनी रास्ते पर जिन्दगी भर इस गर्म लू में जलती रही। किस्सा यह है कि बीबी कूलर की ठंडी हवा से मुझे एलर्जी होती है। और खुले मैदानों की गर्म हवा तुम बर्दाश्त नहीं कर पाओगी।
बात खत्म हो गयी थी। रफअत ने अपना फैसला सुना दिया था। शदीद गुस्से के आलम में उसने फैसला किया था कि वह रफअत के बगैर भी जी सकती है। और वह कनाड़ा के लिये परवाज कर गयी थी।
जब जर्री चली गयी तो वह एक बनाम रिश्ता भी खत्म हो गया जिसने उसको किसी न किसी नू (वजह) इस घर से बावस्ता (सम्बन्धित) कर रखा था। वह एक लालच....जर्री को एक नजर देख लेने पर उससे बातें कर लेने का उसके तन से उठती धीमी खुशबू में मदहोश होने का वह शौक फुजूल भी न रहा। इसलिए उसने अपने साल भर से इधर का रूख भी नहीं किया था मगर कल एक आदमी उसके घर गया था। वहाँ नहीं मिला तो जगदीशपुर पहुँचा और उसको खाला का पैग़ाम पहुँचाया कि उन्होंने उसको फौरी तौर पर बुलाया है वह जहाँ, जिस हाल में हो चला आये। वह बहुत हैरान हुआ था कि सईदा खाला को ऐसी क्या जरूरत आ पड़ी है। कहीं जर्री की कोई खबर न आई हो। या शायद खालू पर फिर फालिज गिरा हो। वह भागम भाग आया था और यहाँ आकर उसको मालूम हुआ था कि वह लोग अपना घर फरोख्त करना चाहते हैं ताकि बच्चों के पास चले जायें।''
मजीद खालू जो इतनी देर से अखबार पढ़ने में मसरूफ थे उन्होंने अपने चेहरे से अखबार का परदा हटाया, उसको ठंडी नजरों से देखा। फिर नरमी से उसको इत्तला बहम पहुँचायी। जर्री परसो एक माह की छुट्टी पर आयी है। वह चाहती है कि हम वहीं माइग्रेट कर जायें।
रफअत ने एकदम से चौंककर खालू की तरफ देखा।
''जर्री यही है....और मुझसे किसी नहीं....?
''मेरा ख्याल है अब उसकी जरूरत भी तो नहीं रह गई।''
खालू ने गहराई तक उसके अन्दर झांका और पापा कि बेचैनी का एक शोला उसके लहू में लहराता हुआ तमाम फासले तय करके उसके चेहरे पर आ ठहरा है। रफअत को चोट लगी, गहरी लगी। जर्री को छोड़ना भी दरअसल उसकी इन्तहाई मुहब्बत थी। उसको खोना जिन्दगी की हर खुशी खोना था। मगर उसने खुद ही उसको अपने हाथों से फिसल जाने दिया क्योंकि वह नहीं चाहता था कि उसकी दहश्त गर्दी में वक्त की चिलचिलाती धूप में जर्री का सारा सोना पिघल जाये।
मजीद खालू ने जर्री के इसरार को आखिरी बार दोहराया।
''वह यह भी चाहती है....वह जरा सा रूके, फिर बोले, ''कि अगर मुमकिन हो तो तुम भी हमारे....।''
साधनपुर के पाँच खेत मजदूरों के इज्तमाई (सामूहिक) कल्त का मन्जरनामा (दृश्य) उसकी आँखों के सामने खुलता है। वह उठ खड़ा होता है कि उसको डर है कि अगर जर्री आ जायेगी तो शायद यह कमजोर पड़ जायेगा......शायद हार जायेगा।
''ठीक है खालू मैं आपका काम करने की कोशिश करूँगा। वैसे अपनी तरफ से आप भी कोशिश करते रहिए। घर तो बहुत अच्छी जगह है। बिक ही जायेगा।''
एक खूबसूरत इन्कार। एक तेज.....बेहद तेज छुरी जो काट चुकती है तब दर्द का एहसास होता है।
मजीद ख़ालू के कलेजे में उतर गई । मगर उन्होंने बड़ी पामुखी से बड़े तहम्मुल से उस वार को सहा और रफअत को जाता हुआ देखते रहे। उनको मालूम था कि ड्रामे के इस मंजर की निगरा दो चमकीली आँखों में आँसुओं की मजीद चमक आ गयी थी। सिर्फ पच्चीस दिनों में घर बिक गया । एयर इण्डिया की फ्लाइट के टिकट आ गए। सारा सामान बाहर खड़ी टैक्सी में रख दिया गया। तभी मजीद खालू की नजर ताजा अखबार पर पड़ी।
उन्होंने अखबार की सुर्खियों पर नजर डाली और एक जगह रूक गये । काशीपुर से तीन किलोमीटर दूर बड़े किसानों और खेत मजदूरों के संघर्ष में चार आदमी मारे गये। मरने वालों के नाम हैं -
लखन दुसाद - साकिन जहानाबाद
प्रताप यादव - साकिन जहानाबाद
रफअत खान - साकिन रसूलपुर
मजीद खालू आगे न पढ़ सके। अखबार का पूरा सफ्हा धुंधला गया। जर्री और उसकी माँ को दूसरे कमरे से निकलते देखकर मजीद खालू ने अपने बिखरे हवास पर काबू पाया और अखबार को जल्दी से लपेट लिया।
टैक्सी पर बैठकर जर्री ने अपने घर को बड़े गौर से देखा...बहुत देर तक गौर से देखती रही फिर पलटकर अपने माँ-बाप से बोली.....पापा अब हम यहाँ कभी नहीं आयेंगे।
''हाँ बेटी कभी नहीं आयेंगे''
उन्होंने हामी भरी और खिड़की से बाहर लटकते अपने हाथ से लिपटा हुआ अखबार नीचे गिरा दिया।

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