Monday, March 31, 2008

विरासत

विमलेश कुमार चतुर्वेदी
जैसे ही चुनाव आया,
मैंने -
दौरे का प्लान बनाया।
गाँव-गाँव, घर-घर जाकर
हर गरीब को समझाया।
भाया!
जब जब मैं आया,
तुमने....
हमारा मान बढ़ाया है;
इलेक्शन जिताया है।
हम...तुम्हें समझते हैं,
तुम्हारी गरीबी के लिए लड़ते हैं।
गरीब दास!
गरीबी...
तुम्हारी विरासत है
तुम्हारी भाषा है,
हम इसे बचाएंगे;
तुम्हें याद दिलाएंगे।
तुम्हारे पूर्वज
जंगलों में रहते थे,
आधे बदन कपड़ा पहनते थे,
जानवरों सा रहते थे,
उन्हीं की तरह खाते थे;
और....
अपनी गरीबी
संजोते
मर जाते थे।
पिछले चुनाव में
मैंने
एक सर्वेक्षण कराया था,
...गरीबी के स्तर को -
एक मानक दिलाया था,
योजनाएं बनवाईं थीं;
आर्थिक सहायता दिलाई थी।
...खुशी हुई कि आप -
गरीबी रेखा के ऊपर जा रहे हैं,
धीरे-धीरे
अपने को....
खुशहाल पा रहे हैं।
मगर
डरता हूँ कि लोग -
कल जब तुम्हें
गरीब दास...
कहने से कतराएंगे,
कोई और नया नाम
लेकर बुलाएंगे,
तो.....
तुम्हारा अपनापन
गरीब दास का गरीबपन
कहीं खो न जाए।
इसलिए
मैंने -
फिर से
सर्वेक्षण कराया है,
गरीबी के स्टेटस्‌ को
और ऊपर बढ़वाया है,
इससे
तुम उसी....
गरीबी रेखा में आ जावोगे;
फिर
अपने आपको..
अपनी संस्कृति से अविभूत पावोगे।
गरीब दास!
गरीबी
...तुम्हारी धरोहर
इसे बचाना होगा,
तुम्हारी झोपड़ियों को...
नाम
दिलाना होगा।
झोपड़ी-संस्कृति पर
मैं...
बहस करवाऊँगा;
डब्ल्यू.एच.ओ. से भी....
तुम्हारी गरीबी को -
पुरातात्विक धरोहर में
संरक्षित करवाऊँगा।
कल्प-कुटीर, २५४०-शिवपुरी, सुल्तानपुर-२२३००१
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1 comment:

seema sachdeva said...

विमलेश जी आज की सथिती पर कडा प्रहार , व्यंग्यात्मक कविता , किसी एक दो पंक्तियों की बात नही करूंगी ,पूरी कविता अपने आप मी सम्पूर्ण है |बधाई हो एक अच्छी रचना के लिए ......सीमा सचदेव