Monday, March 17, 2008

नागरी लिपि और फ़ारसी लिपि - आपसी संबंध

- प्रो० माजदा असद
दुनिया आपसी रिश्तों में बंधी हुई है। ये रिश्ते-नाते, घर-परिवार, खानदान इस समाज का एक हिस्सा हैं। गांव, शहर, देश-विदेश में आपसी संबंध होते हैं। संसार में एक देश का दूसरे देश के साथ मिलना मिलाना रहा है, विज्ञान की प्रगति के बाद तो संसार वास्तव में बहुत ही निकट आ गया है। एक देश के साहित्य और भाषा का सम्बन्ध भी दूसरे देश के साहित्य और भाषा से रहा। भाषा को पढ़ने और लिखने के लिए अक्षरों का प्रयोग होता है। बोलने और सुनने के लिए ध्वनियों का। ध्वनियाँ सीखने के बाद ही अक्षर सीखे जाते हैं। इस तरह भाषा सीखना आसान हो जाता है।
भाषा को पढ़ने और लिखने के लिए लिपि की आवश्यकता पड़ी। संसार में अनेक भाषाएँ हैं और उन्हें विविध लिपियों में लिखा जाता है। कौन-सी लिपि अच्छी है, आसान है अपनानी चाहिए यह एक अलग बहस का मुद्दा है। मैं इस संबंध में बात न करके फारसी और देवनागरी लिपि के आपसी रिश्तों, संबंधों और परस्पर आदान-प्रदान की बात करूँगी।
हमारे देश की संपन्नता हमेशा से ही आकर्षण का केन्द्र रही। विदेशों से लोग यहाँ आते रहे और जाते रहे। कुछ लोगों को यह देश इतना अच्छा लगा कि उन्होंने यहाँ रहना शुरू कर दिया उनमें मुसलमान विशेष उल्लेखनीय हैं। मुसलमानों के साथ-साथ अरबी-फारसी भाषाएँ भी यहाँ आयीं। अरबी, फारसी, खड़ी बोली और दूसरी बोलियों के मेल से भारत में एक नई भाषा बनी जो उर्दू कहलायी। यहाँ कई भाषाओं ने अरबी-फारसी लिपि को अपनाया। अक्षरों के हिसाब से अरबी फारसी में विशेष अंतर नहीं है। फारसी भाषा में तीन-चार अक्षर ज्यादा हैं यह अरबी भाषा में नहीं है। ये चे, ज़े, गाफ़, ज़े अरबी लिपि में अट्ठाइस अक्षर हैं फारसी में बत्तीस अक्षर। दोनों भाषाएँ दायीं ओर से बायीं ओर लिखी जाती हैं। फारसी वर्णमाला की ध्वनियाँ अक्षरों में इस प्रकार हैं -
अलिफ़ बे, पे, ते, से, जीम चे हे ख़े। दाल ज़ाल र ज़े। ज़े सीन शीन स्वाद जुवाद तोए ज़ोए, ऐन ग़ैन फ़े क़ाफ़ गाफ़ लाम मीम नून वाव हमज़ा हे ये यी।
ये फारसी लिपि की मूल ध्वनियाँ हैं। जब उर्दू भाषा ने जन्म लिया तो हिन्दुस्तानी होने की वजह से उसका काम फारसी की इन ३२ मूल ध्वनियों से नहीं चला। वहाँ फारसी लिपि में नागरी लिपि से बहुत सी ध्वनियाँ अपना ली गयी। यह अक्षर हैं - ख घ छ ड ड़ ट ढ ढ़ थ फ भ। इस तरह उर्दू भाषा में अपनायी गयी फारसी लिपि में यह चौदह ध्वनियां अक्षर और बढ़ गये हैं वहाँ यह ध्वनियाँ अब ४६ हो जाती हैं। नागरी लिपि से कुछ अक्षर फारसी लिपि में जुड़े और फारसी लिपि के साथ नागरी लिपि का एक रिश्ता बना।
एक बात और ध्यान देने की है। ऊपर फारसी के जिन अक्षरों की चर्चा की गयी है उनकी आवाज़ भी नागरी लिपि को ध्वनियों से मिलती है। फारसी लिपि की प्रत्येक ध्वनि की पहली आवाज़ नागरी लिपि से मिलती है। अलिफ़ अ, बे ब, पे प, ते त, टे ट, से स, जीम ज, चे च, हे ह, दाल द, डाल ड, रे र, ढे ढ, सीन स, शीन श, स्वाद स, तोय त, ऐन ऐ, काफ क, गाफ़ ग, मीम म, नोन न, वाव व, हे ह, ये य आदि वर्ण लगभग समान ध्वनि के पर्याय हैं।
जिस तरह फारसी ने हिन्दी या नागरी लिपि से कुछ ध्वनियों और अक्षरों को अपनी वर्णमाला में ले लिया उसी तरह हिन्दी ने भी कुछ ध्वनियों और अक्षरों को अपनी वर्णमाला में अपनाया। नागरी लिपि के कुछ अक्षरों पर बिंदी लगाकर फारसी की यह ध्वनियाँ हिन्दी में अपना ली गयी - क़ ख़ ग़ ज़ फ़।
नागरी लिपि में बारह स्वर हैं। फारसी लिपि में भी स्वर का प्रयोग होता है। नागरी लिपि में जो मात्राएँ कहलाती है बे फारसी में आराब। बारह स्वरों की अभिव्यक्ति फारसी लिपि अलिफ, वाव ये के साथ ज़बर ज़ेर पेश रूपी मात्राओं को लगाकर कर देती है। जैसे नागरी लिपि में ईख ई और ख को मिलाकर लिखा जाएगा तो फारसी लिपि में अलिफ ये और ख को मिला कर। उर्दू भाषा में जब फारसी लिपि का प्रयोग होता है तो बहुत सारी चीज़ ध्वनि अक्षर आदि समान होते हैं केवल लिपि का अंतर होता है। दोनों लिपियाँ जानने वाला ध्वनियों की इन समानताओं का आसानी से पहचान लेता है।
दोनों लिपियों का सबसे बड़ा रिश्ता यह है कि दोनों लिपियों में यह क्षमता है कि एक दूसरे की भाषाओं को अपनी-अपनी लिपि में लिख पढ़ सकती हैं। बोलते समय तो कोई अंतर रहता ही नहीं। विशेष ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि नागरी लिपि और हिन्दी भाषा में लिखने वालों को फारसी लिपि के अक्षरों का ज्ञान था। तुलसीदास ने अपनी सतसई। चतुर्थ सर्ग के दोहा ७१-७२, पृ० १३५ पर फारसी लिपि के एन ग़ैन अक्षरों का प्रयोग करते हुए कहा है - नाम जगत सम जानु जग, वस्तुन करि चित बैन।/बिन्दु गये जिमि ग़ैन ते रहत ऐन को ऐन॥/आपो ‘ऐ’विचार विधि सिद्ध विमल मति मान।/आन बासना बिंदु सम, तुलसी परम प्रमान।
तुलसीदास को इस बात का भी ज्ञान था कि ग़ैन पर नुक्ता (बिंदी) लगता है। उस बिंदी को हटाने से यह बिंदी रहित होने से वह अक्षर 'ऐन' रह जाता है। तुलसीदास ने फारसी लिपि में प्रयुक्त अरबी भाषा के अनेक शब्दों का प्रयोग किया और राम को गरीबनवाज़ कहा और स्वयं को गुलाम।
रीतिकालीन हिंदी कवियों की जानकारी भी फारसी अक्षरों से थी। आलम कवि कहते हैं - अलक मुबारक तिय बदन लहकि परि यों साफ़।/खुसनसीब मुनसी मदन लिखयों कांच पर काफ़।
'काफ़' अक्षर का प्रयोग इस बात का द्योतक है कि यह कवि फारसी लिपि में प्रयुक्त वर्णमाला से परिचित थे। मैं शब्दों की बात नहीं करूँगी। वह एक अलग लेख का विषय हो जाएगा। फारसी लिपि में लिखे गये असंख्य शब्दों का प्रयोग नागरी लिपि में हुआ है। संतों ने अपने काव्य में नागरी लिपि में क़ुर्आन शरीफ़ की आयतों को लिपिबद्ध किया है। फारसी लिपि में लिखी गयी उर्दू भाषा का आधार नागरी है। अमीर खुसरो के जमाने से यह प्रयोग मिलता है स्वयं अमीर खुसरो ने अनेक नागरी लिपि के अक्षरों एवं शब्दों का प्रयोग किया है।
बहुत सूक्ष्मता और उदारता से देखा जाये तो पता चलेगा कि दोनों भाषाओं की दोनों लिपियों में कुछ अक्षर एक दूसरे से मिलते हैं फारसी लिपि के द और र को पलट दिया जाये तो वह नागरी लिपि के द और र बन जाते हैं। य की शिरोरेखा को तनिक परिवर्तन से हटा दें तो फारसी और हिंदी की य ध्वनि समान हो जाती है।
प्राचीन हिंदी कवियों की अधिकांश पाण्डुलिपियाँ फारसी लिपि में मिलती हैं। मध्यकाल में टोडरमल ने फारसी भाषा और लिपि को राजकाज के साथ जोड़ दिया था। उससे पहले भी फारसी लिपि का प्रयोग होने लगा था। पटना संग्रहालय के पूर्व अध्यक्ष डॉ० परमेश्वरीलाल गुप्त का मत है - अभी पचास वर्ष पूर्व तक अधिकांश कायस्थ परिवारों का नागरी लिपि के साथ नाम का भी संबंध न था। उनके घरों में रामायण ही नहीं, दुर्गापाठ और भगवद्गीता का भी पाठ उर्दू फारसी में लिखी कापियों से होता था और वे शुद्ध उच्चारण के साथ उनका पाठ किया करते थे। इंग्लैंड और फ्रांस के पुस्तकालयों में न केवल सूरसागर आदि धार्मिक ग्रंथों का ही वरन्‌ हिंदू कवियों द्वारा रचित अनेक श्रृंगार काव्यों यथा केशवदास की रसिक प्रिया, बिहारी सतसई आदि भी फारसी लिपि में लिखी काफी प्राचीन प्रतियाँ सुरक्षित हैं। उन्हें देखते हुए यह कल्पना करना कि प्रेमाख्यान काव्यों के रचयिता मुसलमानों ने अपने काव्य को आदि प्रति नागरी अक्षरों में लिखी हो हास्यास्पद है। ये कवि न केवल स्वयं मुसलमान थे वरन्‌ उनके गुरू भी मुसलमान थे और उनके शिष्य भी मुसलमान ही थे। एक भी ऐसी नागरी प्रति उपलब्ध नहीं है जो सतरहवीं शताब्दी के पूर्व की हो ''भक्तिकाल और मुस्लिम संस्कृति, पृ० १९४'' लेखक असद अली द्वारा चंदायन पृ० २७-२८ से उद्धृत, संपादक परमेश्वरी लाल गुप्त।
नागरी प्रचारिणी सभा काशी में मैंने स्वयं फारसी लिपि में हिंदी के हस्तलेख देखे हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय पुस्तकालय, हरदयाल पब्लिक लाइब्रेरी, दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी की विभिन्न शाखाओं में फारसी लिपि में प्रकाशित धार्मिक पुस्तकें बड़ी संख्या में हैं। यह रचनाएँ नागरी लिपि में भी हैं। इसी तरह फारसी लिपि में प्रकाशित मुसलमानों का धार्मिक साहित्य नागरी लिपि में भी मिलता है। कुर्आन शरीफ़ की अनेक प्रतियाँ नागरी लिपि में मिल जाती हैं।
यह फारसी लिपि और नागरी लिपि की बड़ी विशेषता है कि कुछ साहित्यकार ऐसे हैं जिनका साहित्य दोनों लिपियों में मिलता है। दोनों लिपियों को उन पर गर्व है। इनमें सबसे पहला नाम अमीर खुसरो का है। उनकी हिंदी शायरी, फारसी शायरी के साथ-साथ मिलती है। एजाज़ खुसरवी में उनकी पहेलियाँ, कह मुकरियाँ अनमिल ढकोसले, गीत दो सुखने, कव्वाली आदि फारसी लिपि में मिलते हैं। अमीर खुसरो की हिंदी कविता पुस्तक में उनकी हिंदी कविता नागरी लिपि में मिलती है। उन्होंने दोनों लिपियों के अक्षरों को मिलाकर ग़ज़ल भी लिखी - ज़हाले मिस्कीं शकुन तग़ाकुल दुराय नैना बनाए बातयाँ/सखी पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां।
नज़ीर अकबराबादी भी ऐसा ही नाम है जिनकी कविता हमें दोनों लिपियों में मिलती हैं। दकिनी शायरी में भी दोनों लिपियों को अपनाया गया। नागरी लिपि में यह कविता दक्षिणी हिंदी काव्यधारा शीर्षक के अंतर्गत लिखी गयी। फारसी लिपि में दकिनी शायरी के नाम से प्रकाशित हुई। रानी केतकी की कहानी इंशाअल्ला खां ने लिखा है फारसी और नागरी दोनों लिपियों में मिलती हैं। आधुनिक काल में भी प्रेमचंद ने दोनों लिपियों को अपनाया। उपेन्द्रनाथ अश्क, देवेन्द्र सत्यार्थी और ऐसे अनेक नाम सामने आते हैं जिनका दोनों लिपियों पर समान अधिकार है। दोनों लिपियाँ उनके लेखन पर गर्व करती हैं। अली सरदार जाफरी प्रगतिशील लेखक ने बहुत से कवियों को एक ही पुस्तक में जेसे एक पृष्ठ नागरी और एक फारसी लिपि में लिखकर प्रकाशित किया है।
भारतीय देवी-देवताओं की कहानियां महाभारत, रामायण, भगवतगीता, सावित्री सत्यवान की कथा, दुष्यन्त और शकुंतला की कहानी, मेघदूत माधव अनल कामकंदला, चंदायन, पद्मावत, मधुमालती आदि की कहानियाँ, बारहमासा आदि दोनों लिपियों का विषय बनीं। हिंदी लिपि से बहुत सी चीजें या कथाएँ खलीफ़ाओं विशेष रूप से हारून रशीद और मामून रशीद के जमाने से फारसी में अनुदित होने लगी। फारसी लिपि में आयीं। इसी तरह फारसी लिपि से बहुत सी रचनाएं हिंदी लिपि में ली गयी। हम्द मंक़बत नात, अल्लाह की प्रशंसा नात में मुहम्मद साहब की तारीफ मुंक़बत में चारों खलीफ़ाओं के प्रति श्रद्धा और सूफी औलिया की गुणगान किया जाता है। यह फारसी लिपि से हिंदी लिपि में आया। इसी तरह अपने देश के तीज त्यौहार, मेले ठेले, ईद, बकराईद, होली, दिवाली, बसंत आदि फारसी लिपि में भी मनाया गया।
दोनों लिपियों में प्रयुक्त होने वाले काव्यरूप भी एक दूसरे से प्रभावित हुए। मसनवियाँ फारसी और हिंदी दोनों लिपियों में लिखी हुई मिलती हैं। मैं उनके विस्तार में नहीं जाऊँगी। ग़ज+ल फारसी और नागरी लिपि की प्रिय विधा रही है। भारतेन्दु रसा नाम से ग़ज़लें लिखते थे। उनकी ग़ज़ल का मतला है - उसको शहंशाही हर बार मुबारक होवे।/क़सरे-हिंद का दरबार मुबारक होवे।
दोनों लिपियों में समान छंद और बहरें प्रयोग की गयी हैं। कसीदा भी उर्दू-हिंदी अर्थात्‌ फारसी और नागरी लिपि में लिखा गया। केशव दास और अकबरी दरबार के हिंदी कवियों के लिखे कसीदे नागरी लिपि में तो सौदा और जौक़ के लिखे कसीदे फारसी लिपि में मिलते हैं। अलिफ़नामा और ककहरा भी दोनों लिपियों में समान रूप से लिखा गया। दूसरी तरह गीत और दोहे भी दोनों लिपियों की शान बने। पाकिस्तान के प्रसिद्ध कवि जमीलउद्दीन आली कहते हैं- फारसी लिपि में सूर कबीर बिहारी रहीमन तुलसीदास/सबकी सेवा की पर आली गई न मन की प्यास।
मरसिया या शोक गीत भी दोनों लिपियों की संपत्ति है।
दोनों लिपियों में समान अलंकारों का प्रयोग भी मिलता है। उपमा, रूपक, श्लेष, यमक का प्रयोग किया गया। कहीं-कहीं समान उपमान भी मिलते हैं। दोनों लिपियों में आंखों की उपमा खंजन पक्षी से दी गयी है फारसी लिपि में इसका उदाहरण पेश है। फ़ायाज+ कहते हैं - दो नैन थे उसके चंचल ज्यों खंजन।/जिनके देखे मृग पकड़े जोग बन।/नाक उसकी थी कली सूं खूबतर।/साफ दरपन सूँ था वह मुख बेशतर॥/नागिनी सी था लटाँ दो उसके सर।/होश उन देखे से जाता था बिसर।/दिलफ़रेबी की अदा उसकी अनूप।/रूप में थी राधिका सूँ भी सरूप॥
यहाँ प्रयुक्त सारे उपमान नागरी लिपि में प्रयुक्त उपमान हैं जो फारसी लिपि में अपनाये गये हैं।
हमारे देश में दोनों लिपियाँ बहुत प्रचलित रही हैं। उनमें प्रचुर साहित्य लिखा गया है। अनेक भाषाओं को इन्होंने गले लगाया है। आज जरूरत इस बात की है लोग अधिक से अधिक लिपियों का ज्ञान प्राप्त करें ताकि एक भाषा की सामग्री से दूसरी भाषा के जानने वालों को परिचित करा सकें। यह काम हो भी रहा है। नागरी लिपि में प्रकाशित सामग्री विदेशों में दूसरी लिपियों में छप रही हैं। यहाँ की कहानियाँ, उपन्यास, कविता, लेख आदि पाकिस्तान में फारसी लिपि में छपते हैं वहाँ के लेखक यहाँ नागरी लिपि में।
नागरी लिपि यदि कुछ नए ध्वनि चिह्‌न जिन्हें लखनऊ के नंदकुमार अवस्थी ने कुर्आन शरीफ़ को हिंदी लिपियांतरित करते समय अपने छापेखाने में ढाला था, का प्रयोग करे उन बहुत-सी ध्वनियों या अक्षरों को जो नागरी लिपि में नहीं है अपनी संपत्ति बना लेगी। उसके द्वारा सही उच्चारण और अर्थ के साथ लिख सकेगी।
फारसी लिपि और नागरी लिपि दोनों का संबंध सदियों पुराना है। जरूरत है इस रिश्ते को मज़बूत करने की। दोनों लिपियों ने मिलकर राष्ट्रीय चेतना को जगाया है। आजादी की लड़ाई लड़ी है। इनको धर्म संप्रदाय की श्रृंखलाओं ने बांध कर स्वतंत्र रूप से फलने फूलने का, आगे बढ़ने का अवसर दिया जाये। दोनों लिपियों में प्रकाशित साहित्य अधिक अच्छे ढंग से छप कर सामने आये। अधिक से अधिक लोग उससे लाभान्वित हों।

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