Friday, March 14, 2008

विश्व सुन्दरी का नगरागमन

- शास्त्री नित्यगोपाल कटारे
आज जब कि सारा नगर विश्व सुन्दरी के आगमन पर अपने पलक पाँवड़े बिछाकर स्वागत की तैयारी कर रहा है। चारों ओर उत्साह ही उत्साह है। मुख्य मार्गों पर बड़े-बड़े स्वागत द्वारा बनाये गए हैं। न जाने कितनी मारुतियाँ इधर से उधर दौड़ रही हैं। ऑटो रिक्शा में लाउडस्पीकर लगाकर कई बेरोजगार नवयुवक नई विश्व सुन्दरी के स्वागत की अपील चिल्ला-चिल्ला कर रहे हैं। सारा नगर मारे खुशी के फूला नहीं समा रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे कोई महामानव नगर में पहली बार पदार्पण कर रहा हो। ऐसे उत्सवी माहौल में भी विपन्न बुद्धि मुँह लटकाये चिन्तायुक्त मुद्रा में इन मूर्खतापूर्ण गतिविधियों को न चाहते हुये भी देखने को विवश हैं। हमने उसकी दुःखती नस छेड़ते हुये पूछा -विपन्न बुद्धि! तुम नहीं चल रहे विश्व सुनदरी के दर्शन करने? कौन कर रहा है इतना फजूल खर्च? कौन है विश्व सुन्दरी? .... कल तक जो हमारे मुहल्ले में नाक पोंछते घूमती रहती थी .... कभी किसी ने उसे विश्व सुन्दरी तो क्या वार्ड सुन्दरी भी नहीं माना ..... वह अचानक रातोंरात विश्व सुन्दरी कैसे बन गई? उससे लाख गुनी सौन्दर्य की धनी बालायें किसी की नजर न लग जाये' इस डर से अपने प्राकृतिक सौन्दर्य पर एक काली टिपकी लगाकर उसे छुपाने की कोशिश करती हुई अध्ययनरत है। तुम किसका स्वागत कर रहे हो? जो सुन्दरी अपने नगर की मर्यादा को दुनिया के चुने हुये लफंगों के सामने निर्लज्जतापूर्वक तोड़ आयी है, जो ईश्वर प्रदत्त सौन्दर्य का पोस्टमार्टम कराकर लौटी है उसका स्वात कर रहे हों? जिस देश की नारियाँ अपने शारीरिक अवयवों को हवा तक लगने में संकोच का अनुभव करती है, उन अंगों का यह तथाकथित विश्व सुन्दरी इंचटेप से नापतौल करवा कर बेहूदा प्रदर्शन कर लौटी है, उसका स्वागत करने जा रहे हो ..... और यदि वह सचमुच सुन्दरी है भी तो इसमें हल्ला मचाने की क्या जरूरत है? सौन्दर्य तो हमारे यहाँ बिखरा पड़ा है ... मालवा के ग्रामों में, हिमाचल के पर्वतीय क्षेत्रों में, कश्मीर की वादियों में, उत्तरांचल की घाटियों में, राजस्थान के नगरों में जहाँ-तहाँ सौन्दर्य ही सौन्दर्य है। किन्तु इसमें प्रतियोगिता की क्या बात है? निर्लज्जता की अवश्य प्रतियोगिता हो सकती है। विश्व निर्लज्ज प्रतियोगिता इसमें जो सबसे अधिक निर्लज्जता का प्रदर्शन कर सके उसे विश्व-निर्लज्ज की उपाधि से अलंकृत किया जाना चाहिये।
लज्जा नारी का आभूषण है, जो उस आभूषण को हँसते-हँसते उतार कर फेंक दे उसका स्वागत कौन करेगा? स्वागत करना ही है तो मल्लेश्वरी का करो, जिसने अपने शौर्य से विश्व ओलम्पिक में भारत का सम्मान बचाया है। स्वागत करना है तो उन सुन्दरियों का करो जो विज्ञान और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में पूरे विश्व में भारत का प्रतिनिधित्व कर रही है। स्वागत उन सुन्दरियों का करो जो खेतों में, फैक्टरियों में, चाय बागानों में अपने परिश्रम से राष्ट्रीय उत्पादन में वृद्धि कर रही है। अन्तर्राष्ट्रीय माफिया गिरोह के निर्देशन में बेहूदा कमर मटकाने वालों का क्या स्वागत? विपन्न बुद्धि गुस्से में था उसे समझाते हुए कहा - देखो विपन्न बुद्धि! यह इक्कीसवीं सदी है .... यह हल्ला की सदी है .... जो जितना हल्ला मचायेगा, उतना लाभ पायेगा। आप क्या हैं? यह इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, अपितु आप को लोग किस रूप में जानते हैं, यह ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। हल्ला मचाइये और चुनाव जीतिये .... हल्ला मचाइये और अपना घटिया उत्पादन बेचिये। इसी प्रकार यह सौन्दर्य प्रतियोगिता भी एक हल्ला है। इसमें जुड़े हुए समस्त लोगों का अपना-अपना स्वार्थ होता है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ पहले यह आयोजन करवाती हैं फिर विश्व सुन्दरी का हल्ला मचाती हैं। सारे देश में ग्लैमर उत्पन्न करती हैं फिर धीरे से विश्व सुन्दरी अपने सौन्दर्य का राज खोलती है। किस साबुन से उसकी त्वचा निखरी है ..... कौन से शैम्पू से उसके बाल चमके हैं ..... किस कम्पनी के वस्त्र उसे पसन्द हैं ..... कौन सी लिपिस्टिक से विश्व सुन्दरी बना जा सकता है। .... आदि आदि। भारत के सीधे सादे युवा-युवतियों को बताती हैं।
बेचारे अक्ल के कच्चे, हमारे बच्चे वो सब सामान खरीद डालते हैं। इस तरह के कार्य के लिये भारत से अच्छा बाजार विश्व में और कहीं उपलब्ध नहीं है। इसलिये हर साल इस प्रतियोगिता में भारतीय युवती ही विश्व सुन्दरी बन रही है। अब हमें ही समझना होगा इस दुष्चक्र को।
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1 comment:

sidheshwer said...

बढिया जी बढिया