Friday, March 14, 2008

रसीद

- डॉ० जगदीश व्योम
बूढे और निरीह विकलांगों की एक संस्था के अनुरोध पर आदर्श निकेतन शिक्षण संस्था के प्राचार्य ने दरियादिली दिखायी और छात्र-छात्राओं से सहयोग का अनुरोध किया। छात्र-छात्राओं ने लगभग बारह हजार रूपये एक सप्ताह में ही इकट्ठे कर लिये जिनका चेक बनवाकर संस्था को दे दिया गया। संस्था के प्रतिनिधि ने भी छात्र-छात्राओं को प्रमाण-पत्र दिये और पुरस्कार भी।
''सर! एक छात्र चार सौ रूपये आज लाया है, लेकिन चेक तो संस्था को भेज दिया गया है ... अब क्या किया जाय?'' .... विद्यालय के शिक्षक रामगोपाल ने प्राचार्य से पूछा।
''आप ये रूपये लेकर अपने पास रख लीजिये, फिर इन्हें भेजने की व्यवस्था करते हैं।''
''ठीक है'' कहते हुये रामगोपाल ने एक लिफाफे में रखकर रूपये सुरक्षित रख दिये।
''रामगोपाल जी! पिछले सप्ताह निरीक्षक दल के चाय नाश्ते का बिल लेकर ये महाशय आये हैं, ... ऐसा करिये .... आप .... वो चार सौ रूपये इन्हें दे दीजिए, और इनसे रसीद ले लीजिये।'' - एक व्यक्ति की तरफ संकेत करते हुये प्रिंसिपल ने निर्देश दिया।
रामगोपाल जी चार सौ रूपये की रसीद हाथ में थामे शून्य में न जाने क्या ताकते रह गये।

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