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आदिवासी कहानियों पर

 वाङ्मय  पत्रिका का आगामी अंक आदिवासी कहानियों पर (आलोचनात्मक/समीक्षा त्मक)  केंद्रित होगा। इस हेतु आप अपना अप्रकाशित शोध आलेख 31 मार्च 2021 तक   प्रेषित कर सकते हैं।  नोट: आलेख लिखने से पहले 7007606806 व्हाट्सअप नंबर पर सूचना अवश्य दें।

प्रवासी साहित्य

 

राष्ट्रीय एकता और आधुनिक हिन्दी ग़जल

डॉ. सादिक़ा नवाब सहर ग़जल हमेशा से ही विचारों के आदान-प्रदान का लोकप्रिय माध्यम रही है, बड़ी बात को कम शब्दों में गहराई तक पहुँचाने वाली और अब तो ग़जल केवल भारत ही नहीं बल्कि विश्व की अनेक भाषाओं में अपनी पहचान रखती है। आज का युग उन सपनों के साकार होने का युग है जिसे हमारे पूर्वज एक लम्बे समय के संघर्ष के समय से देखते आ रहे थे। हजारों साल की संयुक्त संस्कृति और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक भारत, अंग्रेजों के नफ़रत के शासन काल से लहू में तरबतर बाहर निकल आया। ग़जल के शायर ने दुआ की-ख्ुदा करे कि ये दस्तूर साज-गार आए/जो बेक़रार हैं अब तक उन्हें क़रार आए।/नुमायशी ही न हो ये निजामे-जम्हूरी/हक़ीक़तन भी ज+माने को साज+-गार आए।'' भारत के इतिहास से लक्ष्मण, भरत, रजिया सुलताना, भगत सिंह, गुरुनानक, वाजिद अली शाह अख्तर आदि जैसे व्यक्ति हमारी साझा संस्कृति और परम्पराओं के प्रतीक के रूप में हमारी ग़ज+ल की विरासत बने। स्वतंत्राता के बाद भी गाँधीजी, सरोजिनी नायडू, जवाहर लाल नेहरू और मौलाना आजाद हीरो के रूप में हमारी कविता तथा ग़जल को आकर्षित करते रहे। हमारे ग़जलकारों ने अपने युग की अपने देश की जनता की इच्छ...

हिन्दी साहित्य में उच्च षिक्षा के क्षेत्र में बढ़ते तकनीकी प्रयोग

जया सिंह उच्चा षिक्षा तकनीक के द्वारा आज का व्यक्ति जागरूक हो चुका है। दुसरी बात यह कि बी०ए० और एम०ए० के छात्रों को ÷प्रयोजनमूलक हिन्दी' जो पूरा पेपर ही तकनीक का है, का षिक्षण दिया जा रहा है। ऐसी उच्च षिक्षा प्रहण करने के बाद व्यक्ति हिन्दी को कम्प्यूटर से दूर नहीं रख सकता है। कम्प्यूटर, इन्टरनेट, ई-मेल के द्वारा सूचना तुरन्त पहुँचती है जिससे हमें पुस्तकें मंगवाने, जानकारी लेने में सुविधा होती है। इस तकनीक के माध्यम से पठन-पाठन का कार्य सरल और जल्दी हो गया है। अब हम घर बैठे-बैठे ही पुस्तकों, पत्रिकाओं का आर्डर कर सकते हैं, पत्र-व्यवहार कर सकते हैं, पुस्तकें और पत्रिकायें पढ़ सकते हैं, नयी पुस्तकों के विशय में जानकारी ले सकते हैं। इन्टरनेट की लोकप्रियता दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। इन्टरनेट कनेक्षन धारक व्यक्ति किसी भी समय, किसी भी विशय पर तत्काल इच्छित जानकारी प्राप्त कर सकता है। छात्र, षिक्षक, वैज्ञानिक, व्यापारी, खिलाड़ी मनोरंजन इच्छुक तथा सरकारी विभाग इन्टरनेट से अपनी आवष्यकता और रूचि के अनुसार सूचनाएँ पा रहे हैं। साथ ही हिन्दी के क्षेत्र में नए सॉटवेयर बन रहे हैं तथा इन्टरनेट पर भी...

समकालीन साहित्य में स्त्री विमर्श

जया सिंह औरतों की चुप्पी सदियों और युगों से चली आ रही है। इसलिए जब भी औरत बोलती है तो शास्त्र, अनुशासन व समाज उस पर आक्रमण करके उसे खामोश कर देते है। अगर हम स्त्री-पुरुष की तुलना करें तो बचपन से ही समाज में पुरुष का महत्त्व स्त्री से ज्यादा होता है। हमारा समाज स्त्री-पुरुष में भेद करता है। स्त्री विमर्श जिसे आज देह विमर्श का पर्याय मान लिया गया है। ऐसा लगता है कि स्त्री की सामाजिक स्थिति के केन्द्र में उसकी दैहिक संरचना ही है। उसकी दैहिकता को शील, चरित्रा और नैतिकता के साथ जोड़ा गया किन्तु यह नैतिकता एक पक्षीय है। नैतिकता की यह परिभाषा स्त्रिायों के लिए है पुरुषों के लिए नहीं। एंगिल्स की पुस्तक ÷÷द ओरिजन ऑव फेमिली प्राइवेट प्रापर्टी' के अनुसार दृष्टि के प्रारम्भ से ही पुरुष सत्ता स्त्राी की चेतना और उसकी गति को बाधित करती रही है। दरअसल सारा विधान ही इसी से निमित्त बनाया गया है, इतिहास गवाह है सारे विश्व में पुरुषतंत्रा, स्त्राी अस्मिता और उसकी स्वायत्तता को नृशंसता पूर्वक कुचलता आया है। उसकी शारीरिक सबलता के साथ-साथ न्याय, धर्म, समाज जैसी संस्थायें पुरुष के निजी हितों की रक्षा क...

आज की राजनीति एवं तत्त्वज्ञान

बशीरुद्दीन एम. मदरी ÷÷वृत्तियों की भिन्नता के बीच जो मार्ग निकल सकेगा वही लोक रक्षा का मार्ग होगा। वह धर्म का चलता हुआ मार्ग होगा। जिससे शिष्टों का आदर, दीनों पर दया, दुष्टों का दमन आदि जीवन के अनेक रूपों का सौंदर्य दिखाई पड़ेगा, वही सर्वांगीण मार्ग होगा।''१ इस नीति तथ्य के बावजूद भी विशेषकर जिस राजनीति की कुर्सी हथियाने में जात-पाँत का फासा फेंककर लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने की प्रवृत्ति को वृत्ति समझ लिया जाए जिससे यह प्रश्न उभरता है दुष्ट किसको कहा जाए, दीन कौन है? दया की वर्षा किस पर बरसाई जाय? ये सब मुद्दे हमें आज सोचने के लिए बाध्य कर रहे हैं। मनुष्य सर्वोत्तम प्राणी है। वह अपनी बुद्धि के बल से संसार की सुख-संपत्ति का अधिकारी माना जाता है। अपने गुणों से वह अन्य जीवधारियों से अधिक विकास कर गया है। नए-नए आविष्कारों तथा अपने निर्माण कौशल द्वारा उसने नैसर्गिक सृष्टि की शोभा सौ गुणी बढ़ा दी है। इसलिए उसे वसुंधरा के भोग करने का अधिकार है। इस कारण संसार की सब सामग्रियाँ मनुष्य के सुख के लिए बनाई गई हैं। मनुष्य इन अधिकारों एवं बुद्धिबल द्वारा सबका स्वामी अवश्य है। परंतु मनुष्य...

जीवनीपरक साहित्यकारों में डॉ. रांगेय राघव

भीम सिंह के. राठौर साहित्यकार बहु व्यक्तित्व संपन्न व्यक्ति होता है। जीवनी प्रधान साहित्य में लेखक का व्यक्तित्व निर्भिकता और ईमानदारी से सम्मिलित होता है। उसकी प्रत्येक रचना में उसके मैं का कोई न कोई टुकड़ा बसा होता है। जीवनी या जीवनी प्रधान उपन्यास लिखने वाले प्रत्येक लेखक को अपने मैं से विशेष साहित्यकार में मैं को जोड़कर ही उसकी जीवनी लिखना पड़ता है जो उसकी संवेदना, उसकी पूजा, आस्था और लेखकीय गरिमा का परिचायक ही नहीं अपितु उसके लेखकीय द्वंद्व की कसौटी भी होती है। हिन्दी साहित्य में भी कुछ लेखकों ने अपने श्रद्धेय साहित्यकारों के जीवन को केन्द्र बनाकर लेखकीय शक्ति का परिचय दिया है। जिनमें डॉ. रांगेय राघव, अमृतलाल नागर, इलाचंद्र जोशी, इकबाल बहादुर, देवसरे विशेष उल्लेखनीय है। विष्णु प्रभाकर की रचना ÷आवारा मसीहा' किसी भी उच्च कोटि के साहित्यिक उपन्यास से कम नहीं। अमृतराय ने भी अपने पिता उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द जी की जीवनी को एक उपन्यास के रूप में ढाला है- प्रेमचंद : कलम का सिपाही। जीवनी प्रधान उपन्यासों में ये सारी विपत्तियाँ, दुख, दर्द, चीख-चिल्लाहट, यश, मान-अभियान कल्पना द...

उस चिड़िया का नाम' में स्त्री चरित्र

कु० निशा आर्या उस चिड़िया का नाम' एक आंचलिक, सामाजिक, मर्मस्पर्शी उपन्यास है, जिसमें उपन्यासकार ने ग्रामीण परिवेश को अपने शब्दों तथा विचारों के द्वारा यथार्थ व मूर्त रूप प्रदान किया है। गाँव के परिवेश रहन-सहन तथा कठिन परिस्थितियों में जीवन-यापन करते हुए व्यक्तियों के यथार्थ चित्राण के प्रति उदासीनता का चित्र , पात्राों के मन की छटपटाहट, दिशाहीनता की प्रवृत्ति, मूल्यों के लिए संघर्ष तथा कुछ खोजने की प्रवृत्ति उपन्यास में दिखाई देती है। साथ ही ग्रामीण जीवन की विषमताओं, शारीरिक तथा मानसिक तौर पर शोषित स्त्रिायों का चित्राण, पिता के माध्यम से बुढ़ापे का वर्णन किया गया है कि किसी प्रकार से व्यक्ति वृद्धावस्था में अकेलेपन व बुढ़ापे से घबराकर दूसरे का सहारा चाहता है और अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए दूसरे पर शारीरिक तथा मानसिक रूप से निर्भर हो जाता है। अपने आंचलिक, सामाजिक उपन्यास में स्त्राी जीवन की विसंगतियों, शिक्षित व्यक्तियों का शहरों की ओर पलायन, अंधविश्वासों पर लोगों का विश्वास तथा पुत्रा के माध्यम से कर्मकाण्ड के विरोध को उजागर किया है। चिड़ियों की कहानी के माध्यम से उपन्यासकार ...

पद्मश्री मेहरुन्निसा परवेज+ कृत अकेला पलाश' में नारी की दशा

डॉ. सैय्यद मेहरून वैज्ञानिक तरक्की ने संसार को एक नया मोड़ दिया है। भूमंडलीकरण और विश्वबाज+ार ने सारे संसार को समेटकर विश्व ग्राम और विश्व घर बना दिया है। वैज्ञानिक रूप से संसार जितनी भी तरक्की कर ले सृष्टि के संतुलन के लिए स्त्राी और पुरुष के सहयोग की आवश्यकता है। ÷÷स्त्राी विश्व की महान् शक्ति है। इस शक्ति से संबंध रखने वाले पुरुष को शिव बनाना पड़ेगा। शिव और शक्ति इनके प्रेम पर पूरे समाज की नींव खड़ी है।'' (डॉ. सविता किर्ते, आठवें दशक की लेखिकाओं के उपन्यासों में व्यक्त स्त्राी चरित्रा, पृ.१३ ) फिर भी पुरुषसत्तात्मक समाज में नारी की विडंबनापूर्वक स्थिति रही है। आधुनिक युग में नारी जीवन में मात्रा दुःख, नैराश्य, संत्राास, त्राासदी, कुंठा के अलावा और कुछ नहीं रहा। फलतः दांपत्य जीवन में भी दरार उत्पन्न होने लगे। दांपत्य जीवन पारिवारिक जीवन का मूलाधार है। स्त्राी और पुरुष का विवाह ही परिवार की आधारशिला है। पति-पत्नी का पारस्परिक प्रेम ही दांपत्य जीवन में आनंद और खुशियां बिखेरता है। प्रस्तुत उपन्यास ÷अकेला पलाश' की नायिका ÷तहमीना' मुस्लिम समाज की अनमेल विवाह की शिकार बनी ...