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Showing posts from January, 2019

अस्तित्व : समाज में अपना अस्तित्व तलाशते किन्नर की गाथा

डॉ. लवलेश दत्त


हिन्दी कथासाहित्य में सर्वाधिक प्रभावशाली और सशक्त विधा है उपन्यास। उपन्यास सही अर्थों में कथा का विस्तार मात्रा नहीं है, बल्कि उसमें जीवन का सर्वांगपूर्ण दर्शन है। इसके साथ उपन्यास युगबोध, कालबोध, दैनिक जीवन की समस्याओं, घटनाक्रमों, मानवीय संवेदनाओं और पल-पल बदलते परिवेश का सूक्ष्म प्रस्तुतिकरण होता है। यह ऐसी विधा है जो जीवन को समग्रता के साथ अपने में समेट कर उसे पाठकों के समक्ष रखती है। उपन्यास समय के साथ यात्रा करने में पूर्णतः समर्थ है। इसीलिए प्रायः सभी कहानीकार उपन्यास अवश्य लिखते हैं। कुछ लेखक तो ऐसे भी हैं जिन्होंने अपने लेखन का आरंभ उपन्यास से ही किया है। समय और परिस्थितियों को बदलने के साथ-साथ दृष्टि में भी परिवर्तन होता है तथा जैसे-जैसे दृष्टि व्यापक होती जाती है, लेखक की लेखनी का फलक भी बढ़ता जाता है। जब उसकी संवेदनशील दृष्टि समाज के ऐसे वर्ग पर पड़ती है जो सदा से उपेक्षित, शोषित और तिरस्कृत रहा है तो उसकी लेखनी से ‘अस्तित्व’ जैसी रचना का सृजन होना स्वाभाविक है।  ‘अस्तित्व’ युवा लेखिका गिरिजा भारती का प्रथम उपन्यास है। प्रस्तुत उपन्यास एक किन्नर के जीवन की ग…

‘दरमियाना’ में चित्रित किन्नर जीवन-संघर्ष और संवेदना

डॉ. सियाराम वैश्वीकरण की सहज प्रतिक्रिया स्वरूप अस्तित्व में आये अस्मितामूलक विमर्शों में किन्नर-विमर्श सर्वाधिक नवीन है किन्तु यह विमर्श किन्नर समाज की स्वीकार्यता व अधिकारां के प्रति का गम्भीर चिन्तन करने पर बल देता है। कारण कि, किन्नर भी हमारे समान अपनी माँ की कोख से जन्म लेते हैं किन्तु लिंगाधारित-पुरुषवादी सामाजिक व्यवस्था में इन्हें अधिकार विहीन कर पशुवत् जीवन जीने को मजबूर किया गया है। एक ही माँ-बाप से जन्में बच्चों के साथ यदि किसी कारणवश किन्नर बच्चा पैदा हो जाता है तो सब कुछ समान व एक होते हुए भी उसके प्रति प्रेम और सहानुभूति के स्थान पर, उपेक्षा, तिरस्कार और घृणा का व्यवहार किया जाता है। किन्नर के प्रति होने वाले शोषण को केन्द्र में न आ पाने के कारणां का उल्लेख करते हुए प्रसिद्धि कथाकार नीरजा माधव कहती हैं- ‘‘समाज में संख्या और महत्त्व के आधार पर न्यूनता, साथ ही शोषण और अत्याचार के हर मानवीय आक्रमण से परे हास-परिहास का विषय मात्रा होना।’’1 साहित्य में किन्नरां पर केन्द्रित रचनाओं का अभाव ही है। रामायण, महाभारत और पौराणिक साहित्य में यद्यपि इनकी चर्चा मिलती है परन्तु प्रसंगव…

हिन्दी कथा साहित्य के सुखद भविष्य का संकेतः ज़िन्दगी 50-50

प्रो. मेराज अहमद
भगवंत अनमोलकृत ज़िन्दगी 50-50 वर्तमान में हिन्दी के बहुत चर्चित उपन्यासों में से एक है। चर्चा के कारणों के संबंध में इसके ‘बेस्ट सेलर’ होने का उल्लेख कदाचित् सर्वाधिक किया जाता है। निश्चित ही बाज़ारवाद के इस दौर में ‘वस्तु’ की महत्ता की वजह उसकी तमाम विशेषताओं को दरकिनार करते हुए उसकी ‘सेल’ अर्थात् बिक्री के द्वारा ही निर्धारित की जाती है। पाश्चात्य संस्कृति में पूर्व की अपेक्षा सबकुछ, यहाँ तक की भावनाएँ, संवेदनाएँ संबंध जैसे मानवीय प्रकृति के नैसर्गिक चरित्रा (गणना करने पर इनकी लम्बी फेहरिस्त हो जाएगी) वस्तु में तब्दील हो चुके हैं। साहित्य का संबंध मनुष्य की विविध प्रवृत्तियों की अभिव्यक्ति से ही होता है। प्रायः साहित्य भी एक सीमा तक वहाँ वस्तु में तब्दील हो चुका है, परन्तु भारतीय परिदृश्य में अभी पाश्चात्य देशों जैसी  स्थिति नहीं है। असल में बेस्ट विशेषण की आवश्यकता तो तभी होगी जब सेल शब्द का अस्तित्व हो। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि भारतीय भाषाओें में खासतौर से हिन्दी में तो रचनाएँ ‘सेलिंग’ से दूर ही होती जा रही हैं। ऐसे में किसी भ…