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Showing posts from January, 2019

डॉ. एम. फ़ीरोज़ खान

मूल आलोचनात्मक ग्रंथ
1. मुस्लिम विमर्श साहित्य साहित्य के आईने में
2. हिंदी के मुस्लिम कथाकार : एक अध्ययन
3. मुस्लिम उपन्यासकारों के साहित्य में चित्रित जीवन और समाज (शीघ्र प्रकाश्य)

सम्पादित पुस्तकें 
1. थर्ड जेण्डर पर केन्द्रित हिंदी का प्रथम उपन्यास : यमदीप
2. थर्ड जेण्डर : हिंदी कहानियां 
3. सिनेमा की निगाह में थर्ड जेण्डर
4. थर्ड जेण्डर और साहित्य
5. थर्ड जेण्डर और ज़िंदगी 50-50
6. हम भी इंसान हैं (कहानी-संग्रह, थर्ड जेण्डर पर)
7. हमख़्याल (कहानी-संग्रह)
8. थर्ड जेण्डर : वर्तमान और अतीत
9. थर्ड जेण्डर : अनुदित कहानियां
10. किन्नर कथा : तीसरी दुनिया का सच
11. दरमियाना : आधी हकीकत आधा फसाना
12.प्रवासी महिला कथाकार (प्रथम एवं चर्चित कहानियाँ)
13. साहित्य के आईने में आदिवासी विमर्श
14. आदिवासी विमर्श दशा एवं दिशा
15. आदिवासी साहित्य की हकीकत उपन्यासों के आईने में
16. नासिरा शर्मा : एक मूल्यांकन
17. कुइंयाजान : एक मूल्यांकन
18. जीरो रोड  : एक मूल्यांकन
19. नारी विमर्श : दशा एवं दिशा
20. दलित साहित्य और हम
21. हिंदी के मुस्लिम कथाकार
22. नई सदी में कबीर
23. हिंदी साक्षात्कार उद्भव और विका…

वाड्मय पत्रिका

वाड्मय पत्रिका

महत्त्वपूर्ण विशेषांक (उपलब्ध)
समलैंगिकता पर केंद्रित हिंदी-उर्दू और पंजाबी कहानियाँ
प्रवासी अंक
साहित्य अकादमी से पुरस्कृत उपन्यासों और काव्यों पर केंद्रित अंक
गुलशेर खाँ शानी
आदिवासी कहानी अंक
कथाकार अब्दुल बिस्मिल्लाह अंक.

vangmaya patrika 

महत्त्वपूर्ण विशेषांक

अस्तित्व : समाज में अपना अस्तित्व तलाशते किन्नर की गाथा

डॉ. लवलेश दत्त


हिन्दी कथासाहित्य में सर्वाधिक प्रभावशाली और सशक्त विधा है उपन्यास। उपन्यास सही अर्थों में कथा का विस्तार मात्रा नहीं है, बल्कि उसमें जीवन का सर्वांगपूर्ण दर्शन है। इसके साथ उपन्यास युगबोध, कालबोध, दैनिक जीवन की समस्याओं, घटनाक्रमों, मानवीय संवेदनाओं और पल-पल बदलते परिवेश का सूक्ष्म प्रस्तुतिकरण होता है। यह ऐसी विधा है जो जीवन को समग्रता के साथ अपने में समेट कर उसे पाठकों के समक्ष रखती है। उपन्यास समय के साथ यात्रा करने में पूर्णतः समर्थ है। इसीलिए प्रायः सभी कहानीकार उपन्यास अवश्य लिखते हैं। कुछ लेखक तो ऐसे भी हैं जिन्होंने अपने लेखन का आरंभ उपन्यास से ही किया है। समय और परिस्थितियों को बदलने के साथ-साथ दृष्टि में भी परिवर्तन होता है तथा जैसे-जैसे दृष्टि व्यापक होती जाती है, लेखक की लेखनी का फलक भी बढ़ता जाता है। जब उसकी संवेदनशील दृष्टि समाज के ऐसे वर्ग पर पड़ती है जो सदा से उपेक्षित, शोषित और तिरस्कृत रहा है तो उसकी लेखनी से ‘अस्तित्व’ जैसी रचना का सृजन होना स्वाभाविक है।  ‘अस्तित्व’ युवा लेखिका गिरिजा भारती का प्रथम उपन्यास है। प्रस्तुत उपन्यास एक किन्नर के जीवन की ग…

‘दरमियाना’ में चित्रित किन्नर जीवन-संघर्ष और संवेदना

डॉ. सियाराम वैश्वीकरण की सहज प्रतिक्रिया स्वरूप अस्तित्व में आये अस्मितामूलक विमर्शों में किन्नर-विमर्श सर्वाधिक नवीन है किन्तु यह विमर्श किन्नर समाज की स्वीकार्यता व अधिकारां के प्रति का गम्भीर चिन्तन करने पर बल देता है। कारण कि, किन्नर भी हमारे समान अपनी माँ की कोख से जन्म लेते हैं किन्तु लिंगाधारित-पुरुषवादी सामाजिक व्यवस्था में इन्हें अधिकार विहीन कर पशुवत् जीवन जीने को मजबूर किया गया है। एक ही माँ-बाप से जन्में बच्चों के साथ यदि किसी कारणवश किन्नर बच्चा पैदा हो जाता है तो सब कुछ समान व एक होते हुए भी उसके प्रति प्रेम और सहानुभूति के स्थान पर, उपेक्षा, तिरस्कार और घृणा का व्यवहार किया जाता है। किन्नर के प्रति होने वाले शोषण को केन्द्र में न आ पाने के कारणां का उल्लेख करते हुए प्रसिद्धि कथाकार नीरजा माधव कहती हैं- ‘‘समाज में संख्या और महत्त्व के आधार पर न्यूनता, साथ ही शोषण और अत्याचार के हर मानवीय आक्रमण से परे हास-परिहास का विषय मात्रा होना।’’1 साहित्य में किन्नरां पर केन्द्रित रचनाओं का अभाव ही है। रामायण, महाभारत और पौराणिक साहित्य में यद्यपि इनकी चर्चा मिलती है परन्तु प्रसंगव…

हिन्दी कथा साहित्य के सुखद भविष्य का संकेतः ज़िन्दगी 50-50

प्रो. मेराज अहमद
भगवंत अनमोलकृत ज़िन्दगी 50-50 वर्तमान में हिन्दी के बहुत चर्चित उपन्यासों में से एक है। चर्चा के कारणों के संबंध में इसके ‘बेस्ट सेलर’ होने का उल्लेख कदाचित् सर्वाधिक किया जाता है। निश्चित ही बाज़ारवाद के इस दौर में ‘वस्तु’ की महत्ता की वजह उसकी तमाम विशेषताओं को दरकिनार करते हुए उसकी ‘सेल’ अर्थात् बिक्री के द्वारा ही निर्धारित की जाती है। पाश्चात्य संस्कृति में पूर्व की अपेक्षा सबकुछ, यहाँ तक की भावनाएँ, संवेदनाएँ संबंध जैसे मानवीय प्रकृति के नैसर्गिक चरित्रा (गणना करने पर इनकी लम्बी फेहरिस्त हो जाएगी) वस्तु में तब्दील हो चुके हैं। साहित्य का संबंध मनुष्य की विविध प्रवृत्तियों की अभिव्यक्ति से ही होता है। प्रायः साहित्य भी एक सीमा तक वहाँ वस्तु में तब्दील हो चुका है, परन्तु भारतीय परिदृश्य में अभी पाश्चात्य देशों जैसी  स्थिति नहीं है। असल में बेस्ट विशेषण की आवश्यकता तो तभी होगी जब सेल शब्द का अस्तित्व हो। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि भारतीय भाषाओें में खासतौर से हिन्दी में तो रचनाएँ ‘सेलिंग’ से दूर ही होती जा रही हैं। ऐसे में किसी भ…