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याद तो फिर भी आओगे

SEEMA GUPTA ह्दय के जल थल पर अंकित बस चित्र धूमिल कर जाओगे याद तो फिर भी आओगे हंसना रोना कोई गीत पुराना सुर सरगम का साज बजाना शब्द ताल ले जाओगे याद तो फिर भी आओगे सुनी राहे, दिल थाम के चलना साथ बिताये पलो का छलना सब खाली कर जाओगे याद तो फिर भी आओगे कांधे पर सर और स्पर्श का घेरा रात के मुख पर चाँद का सेहरा तुम विराना कर जाओगे याद तो फिर भी आओगे

तेरे जाने के बाद

Seema Gupta आँखों मे जलजले , मरुस्थल दिल की जमीन . भावनाओ की साजिश , संभावनाओ का जलना . धधकते अंगारों से पल, दर्द का विकराल रूप , म्रत्यु से द्वंद , पथराये जिस्म का गलना . तेरे जाने के बाद......

वैषम्य

महेंद्र भटनागर हर व्यक्ति का जीवन नहीं है राजपथ — उपवन सजा वृक्षों लदा विस्तृत अबाधित स्वच्छ समतल स्निग्ध ! . सम्भव नहीं हर व्यक्ति को उपलब्ध हो ऐसी सुगमता, इतनी सुकरता। सम दिशा सम भूमि पर आवास सबके हैं नहीं प्रस्थित, एक ही गन्तव्य सबका है नहीं जब अभिलषित। . कुछ को पार करनी ही पड़ेंगी तंग-सँकरी कण्ट-कँकरीली घुमावोंदार ऊँची और नीची जन-बहुल अंधारमय पगडण्डियाँ — गलियाँ पसीने-धूल से अभिषिक्त, प्रति पग पंक से लथपथ। . नहीं, हर व्यक्ति का जीवन सकल सुविधा सहित आलोक जगमग राजपथ ! . जब भूमि बदलेगी, मार्ग बदलेगा ! .  

जीवन-संदर्भ

महेंद्र भटनागर आओ जीवन की गीता को अभिनव संदर्भ प्रदान करें ! बदला जब परिवेश मनुज का आओ नयी ऋचाओं का निर्माण करें ! . नव मूल्यों को स्थापित कर जीवन-धर्मी कविता के अन्तर-बाह्य स्वरूपों को अभिनव रचना दे ! जीवन्त नये आदर्शों की आभा दें ! जगमग स्वर्णिम गहने पहना दें ! . जीवन की प्रतिमा को नयी गठन नव भाव-भंगिमा से सज्जित कर; मानव को चिर-इच्छित संबंधों की गरिमा से सम्पूरित कर युग को महिमावान करें ! आओ नव राहों के अन्वेषी बन नूतन क्षितिजों की ओर प्रवह प्रयाण करें ! .

ऊहापोह

महेंद्र भटनागर प्रश्न — अविकल स्थिर अपनी जगह पर। पंगु सारी तर्कना, विखण्डित कल्पना ! अनिश्चित की शिलाओं तले रोपित प्रश्न ! . सूत्राभाव पूर्व...उत्तर...सर्वत्र ठहराव ! . यह कश-म-कश और कब तक ? विवश मनःस्थिति और कब तक ? और कब तक ओढ़े रहोगे प्रश्न ? उलझी ऊबट सतह पर। . सब पूर्ववत् अपनी जगह पर।

वात्याचक्र

महेंद्र भटनागर अंधड़ आ रहा सम्मुख उमड़ता सनसनाता वेगवाही धूलि-धूसर ! . कुछ क्षणों में घेर लेगा बढ़ तुम्हारा भी गगन ! जागो उठो दृढ़ साहसिक मन हो सचेत-सतर्क ! थपेड़े झेलने का प्रण अभी तत्काल निश्चय आत्मगत कर। . अंधड़ों की शक्ति तुमको तौलनी है, संकटों पर आत्मबल सन्नद्ध हो जय बोलनी है, प्राण की सोयी हुई अज्ञात-मेधा को सचेतन कर ! . हिमालय-सम सुदृढ़ व्यक्तित्व के सम्मुख गरजता क्रूर अंधड़ राह बदलेगा ! मरण का तीव्र धावन तिमिर अंधड़ राह बदलेगा !

परिवेश के प्रति

महेंद्र भटनागर कितनी तीखी ऊमस से परिपूर्ण गगन, लहराती अग्नि-शिखाओं से कितना परितप्त भुवन ! कितना क्षोभ-युक्त भाराक्रांत दमित मानव-मन ! जीवन का वातावरण समस्त थका-हारा, काराबद्ध ! . आओ इसको बदलें, गतिमान करें, मल्लार-राग से भर दें जलवाह ! पवन-संघातों से निःशेष करें दिग्दाह !

नियति

महेंद्र भटनागर संदेहों का धूम भरा साँसें कैसे ली जायँ ! . अधरों में विष तीव्र घुला मधुरस कैसे पीया जाय ! . पछतावे का ज्वार उठा जब उर में कोमल शय्या पर कैसे सोया जाय ! . बंजर धरती की कँकरीली मिट्टी पर नूतन जीवन कैसे बोया जाय ! .  

अनुदर्शन

महेंद्रभटनागर उड़ गये ज़िन्दगी के बरस रे कई, राग सूनी अभावों भरी ज़िन्दगी के बरस हाँ, कई उड़ गये ! . लौट कर आयगा अब नहीं वक़्‍त जो — धूल में, धूप में खो गया, स्याह में सो गया ! . शोर में चीखती ही रही ज़िन्दगी, हर क़दम पर विवश, कोशिशों में अधिक विवश ! . गा न पाया कभी एक भी गीत मैं हर्ष का, एक भी गीत मैं दर्द का ! . गूँजता रव रहा मात्र : संघर्ष....संघर्ष... संघर्ष ! विश्रान्ति के पथ सभी मुड़ गये ! ज़िन्दगी के बरस, रे कई देखते...देखते उड़ गये !

दिनान्त

. महेंद्रभटनागर आज का भी दिन हमेशा की तरह चुपचाप बीत गया ! . अनिच्छित असह ब्राह्ममुहूर्त का कर्कश अलार्म बजा, दिनागम की खुशी में एक पक्षी भी न चहका, भोर घर-घर बाँट आयी स्वर्ण, मेरे बन्द द्वारों पर किसी ने भी न दस्तक दी न धीरे से किसी ने भी पुकारा नाम ! . प्रौढ़ा दोपहर प्रत्येक की दैनन्दिनी में लिख गयी विश्रान्ति के क्षण ; मात्र मुझको ऊब केवल ऊब ! . अलसाया शिथिल अब देखता हूँ आ रही सन्ध्या अरुणिमा, तुम भला क्या दे सकोगी ? मौन उत्तर था — ‘अँधेरा.... घन अँधेरा !’ .

सुकर : दुष्कर

महेंद्रभटनागर महज़ दिन बिताना सरल है, जीना कठिन ! . ज़िन्दगी को काटना कितना सहज है, खण्डित व्यक्तित्व के धागों रेशों को सहेजना सँवारना सीना कठिन ! . केवल समय-असमय उगलने को गरल है पीना कठिन ! महज़ दिन बिताना सरल है जीना कठिन !

मेरे ही लिए

डा. महेंद्र भटनागर शिशिर की मूक ठण्डी रात — मेरे ही लिए ! . सितारे सब अपरिचित वृक्ष सोये सामने बस एक तम का गात — मेरे ही लिए ! . न जाने किन अक्षम्य अभूत पापों का कुफल ; मधुलोक खोया हर मनुज, पर, मात्र मैं — परिश्रान्त विह्नल ! . यह अकेली स्तब्ध बोझिल हिम ठिठुरती रात — मेरे ही लिए !

अप्रत्याशित

डा. महेंद्र भटनागर सदा.... सदा की तरह नव मेघों के उपहारों की लेकर बाढ़ आया आषाढ़ ; पर, तीव्र पिपासाकुल चातक ने कुछ न कहा, सूनी-सूनी आँखों से बस देखता रहा, आगत का स्वागत नहीं किया, जीवन-रस नहीं पिया ! . सदा....सदा की तरह झर-झर सावन बरसा, रतिकर कंपित वक्षस्थल ले उमड़ीं तड़पीं श्याम घटाएँ हरित सजल आँचल फैलाये, पर, नृत्य मयूरों ने नहीं किया, भादों बीत गया नीरस मौन गगन ने कजली गीतों का स्वर नहीं दिया। . सदा... सदा की तरह आयीं शारद-ज्योत्स्ना रातें शीतल। याद दिलाने मांसल विधु-वदनी की बातें ! पर, शुक्लाभिसारिका निज गृह से नहीं हिली, पथ — सुनसान बनाये प्रति निशि जागा, शान्त सरोवर में नहीं मोरपंखी कहीं चली ! . सदा...सदा की तरह लह-लह मधु-माधव आया, नव पल्लव रंग-बिरंगे पुष्पों के गजरे लाया पर, वासन्ती नहीं खिली, मधुकण्ठी की पीड़ा भी नहीं सुनी ! . बोझिल तिथियों का, धूमिल स्मृतियों का, एक बरस बी...त...ग...या...!

प्रश्न

डा. महेंद्र भटनागर किसने अनास्था के हज़ारों बीज मानस-भूमि पर छितरा दिये ? . किसने हमारी अचल निष्ठा के विरल अनमोल माणिक संशयावह राह पर बिखरा दिये ? . रीती अश्रद्धा के नुकीले शूल चरणों में चुभा विश्वास की अक्षय धरोहर छीन ली ? किसने अचानक खोखले दर्शन-कथन से, सत्य अनुभव-सिद्ध जीवन-मान्यताओं की अकुण्ठित ज्ञान-गुरुता हीन की ? . किसने विनाशक आँधियों के वेग से विचलित किये उन्नत गगन-चम्बी हमारी लौह-आस्था के शिखर ?

प्रश्न

डा. महेंद्र भटनागर किसने अनास्था के हज़ारों बीज मानस-भूमि पर छितरा दिये ? . किसने हमारी अचल निष्ठा के विरल अनमोल माणिक संशयावह राह पर बिखरा दिये ? . रीती अश्रद्धा के नुकीले शूल चरणों में चुभा विश्वास की अक्षय धरोहर छीन ली ? किसने अचानक खोखले दर्शन-कथन से, सत्य अनुभव-सिद्ध जीवन-मान्यताओं की अकुण्ठित ज्ञान-गुरुता हीन की ? . किसने विनाशक आँधियों के वेग से विचलित किये उन्नत गगन-चम्बी हमारी लौह-आस्था के शिखर ?

विक्षोभ

डा. महेंद्र भटनागर इच्छाएँ हमारी — त्रस्त हैं, उद्विग्न हैं, आकार पाने के लिए ! . आसंग इच्छाएँ — जिन्हें हमने बड़े ही यत्न से गोपन-सुरक्षित स्थान पर रक्खा सदा वांछित अनागत की प्रतीक्षा में ! . विविक्षित भावनाएँ आकुलित हैं, आक्रमित हैं, वास्तविक अनुभूति का आधार पाने के लिए ! . पर, वायुमण्डल में न जाने किस तरह की अश्रुवाही वाष्प है परिव्याप्त ; जिससे हम विवश हैं मूक रोने के लिए, आक्रोश तृष्णा भार ढोने के लिए !

अनभिव्यक्त

डा. महेंद्र भटनागर व्यक्ति — अपनी अकल्पित हर व्यथा की सर्व-परिचित परिधि ! . किंचित् अनाकृत अतिक्रमण अपने-पराये के लिए रे अतिकथा, अरुचिकर अतिकथा ! . अनुभूत जीवन-वेदना बस बाँध रक्खो पूर्व निर्धारित परिधि में, व्यक्ति के परिवेश में, अवचेतना के देश में।

अपेक्षित

डा. महेंद्र भटनागर सरस अधरों पर प्रफुल्लित कंज-सी मुसकान हो ! या उमंगों से भरा मधु-गान हो ! . मुसकान की मधु-गान की अभिशप्त इस युग में कमी है ! अत्यधिक अनवधि कमी है ! मात्र — नीरव नील होठों पर बड़ी गहरी परत हिम की जमी है ! . प्रत्येक उर में वेदना की खड़खड़ाती है फ़सल, आह्लाद-बीजों का नहीं अस्तित्व, केवल झनझनाते अंग, मानव चित्र-रेखा-वत् खोजता सतरंग !

संवर्त

डा. महेंद्र भटनागर पथ का मोड़ भाता है मुझे ! . बहुत लम्बी डगर से ऊब जाता हूँ, अकारण ही थकावट की शिथिलता में न समझे डूब जाता हूँ ! सनातन एक-से पथ पर नयापन जब नज़र आता नहीं मुझसे चला जाता नहीं ! . तभी तो हर नवागत मोड़ का स्नेहिल हृदयहारी भाव-भीना मुग्ध स्वागत ! इसमें हर्ज़ क्या है — पथ का मोड़ यदि इतना सुहाता है मुझे ? पथ का मोड़ भाता है मुझे !

जीवनी

डा. महेंद्र भटनागर चित्र जो अतीत धुन्ध में समा गया — उसे पुनः-पुनः उरेहना। . जो बिखर गया जगह-जगह व्यतीत राह पर — उसे विचार कर समेटना। . जो समाप्त-प्राय — बार-बार चाह कर उसे सहेजना। . रीति-नीति काव्य की नहीं ! . जीवनी : विगत प्रवाह, जी चुके। काव्य: वर्तमान वेगवान जी रहे।