Sunday, May 3, 2009

अनुदर्शन

महेंद्रभटनागर

उड़ गये
ज़िन्दगी के बरस
रे कई,
राग सूनी
अभावों भरी
ज़िन्दगी के बरस
हाँ,
कई उड़ गये !
.
लौट कर
आयगा अब नहीं
वक़्‍त
जो — धूल में, धूप में
खो गया,
स्याह में
सो गया !
.
शोर में
चीखती ही रही ज़िन्दगी,
हर क़दम पर विवश,
कोशिशों में अधिक विवश !
.
गा न पाया कभी
एक भी गीत मैं हर्ष का,
एक भी गीत मैं दर्द का !
.
गूँजता रव रहा
मात्र :
संघर्ष....संघर्ष... संघर्ष !
विश्रान्ति के
पथ सभी
मुड़ गये !
ज़िन्दगी के बरस,
रे कई
देखते...देखते
उड़ गये !

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