Tuesday, May 5, 2009

नियति

महेंद्र भटनागर


संदेहों का धूम भरा
साँसें
कैसे ली जायँ !
.
अधरों में
विष तीव्र घुला
मधुरस
कैसे पीया जाय !
.
पछतावे का ज्वार उठा
जब उर में
कोमल शय्या पर
कैसे सोया जाय !
.
बंजर धरती की
कँकरीली मिट्टी पर
नूतन जीवन
कैसे बोया जाय !
.
 

No comments: