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पीर मेरी, प्यार बन जा

गोपालदास "नीरज" पीर मेरी, प्यार बन जा ! लुट गया सर्वस्व, जीवन, है बना बस पाप- सा धन, रे हृदय, मधु-कोष अक्षय, अब अनल-अंगार बन जा ! पीर मेरी, प्यार बन जा ! अस्थि-पंजर से लिपट कर, क्यों तड़पता आह भर भर, चिरविधुर मेरे विकल उर, जल अरे जल, छार बन जा पीर मेरी, प्यार बन जा ! क्यों जलाती व्यर्थ मुझको क्यों रुलाती व्यर्थ मुझको क्यों चलाती व्यर्थ मुझको री अमर मरु-प्यास, मेरी मृत्यु ही साकार बन जा पीर मेरी, प्यार बन जा !

ख़्वाब का दर बंद है

शहरयार मेरे लिए रात ने आज फ़राहम किया एक नया मर्हला नींदों ने ख़ाली किया अश्कों से फ़िर भर दिया कासा मेरी आँख का और कहा कान में मैंने हर एक जुर्म से तुमको बरी कर दिया मैंने सदा के लिए तुमको रिहा कर दिया जाओ जिधर चाहो तुम जागो कि सो जाओ तुम ख़्वाब का दर बंद है

ऐसे हिज्र के मौसम अब कब आते हैं

शहरयार ऐसे हिज्र के मौसम अब कब आते हैं तेरे अलावा याद हमें सब आते हैं जज़्ब करे क्यों रेत हमारे अश्कों को तेरा दामन तर करने अब आते हैं अब वो सफ़र की ताब नहीं बाक़ी वरना हम को बुलावे दश्त से जब तब आते हैं जागती आँखों से भी देखो दुनिया को ख़्वाबों का क्या है वो हर शब आते हैं काग़ज़ की कश्ती में दरिया पार किया देखो हम को क्या क्या करतब आते हैं

मेरी उम्मीदों को नाकाम ना होने देना

सीमा गुप्ता ज़िंदगी की उदास राहों में, कोई एक राह तो ऐसी होगी, तुम तक जो मुझे लेके चली आयेगी ... इन बिखरते ओर सम्भालते हुए लम्हात में , एक कोई लम्हा भी तो ऐसा होगा, तेरी खुशबू मुझे महका के चली जायेगी........ ये मोहब्बत के जूनून का ही असर हो शायद , तेरे आने की ही आहट कुछ ऐसी होगी, मेरी साँसों की जो रफ़्तार बढ़ा जायेगी........... मेरी पल पल की दुआओं में, कोई एक दुआ तो होगी, तेरे दरबार में मकबूल करी जायेगी....... तूने जो मेरी मोहब्बत के लिये होंगे लिखे, उन्हीं फूलों से एक बार ज़रूर, खुशबुओं से मेरी आगोश भरी जायेगी........ मैने आवाज़ दुआओं की उठा रक्खी है, तेरे दरबार में उम्मीद सजा रखी है, "मेरी उम्मीदों को नाकाम ना होने देना"

ये हवाएं तेरी ज़मीन से आई थी

Poornima Chaturvedi ये हवाएं तेरी ज़मीन से आई थी मेरी मिट्टी मे नही था बेवफा होना मेरे घर की तासीर कड़वी ही सही, मगर मैंने सिखा नही था मिश्री से ज़हर होना ढूंढते कोई और बहाना दूर होने का मुझे तो आता ही नही था तुझसे ख़फा होना ये वक्त का तकाज़ा था या तादीर मेरी पानी मे लिखा था मेरा धुंवा होना अब मैं मैखाने के जानिब ही जाऊंगा बहुत हो चुका अब मेरा ख़ुदा होना खेल ही खेल मे हालात बदल जाएंगे हमको मालूम न था यूँ दाना होना दिल की हसरत निगाहों से कही थी हमने उल्फत ने जाना नही था अभी ज़ुबां होना

प्यार आता है

सीमा गुप्ता तेरी बातों पे ना जाने मुझे क्यों प्यार आता है, तुझे देखूं ना मैं जब तक नही करार आता है. तेरी आँखों से यूं लगता है जैसे कोई जाम पीता हूँ, खुले होठों से गिरते फूलों को मैं थाम लेता हूँ. नींद आती नही मुझको तो हर पल ख्वाब आतें हैं, ख्वाबों मे मैं तुझे हर पल अपनी बाँहों मे पाता हूँ. मिलन के बाद एक पल बिछड़ने का भी आता है, वो घडी ऐसी होती है जैसे तूफान आता है. मेरी चाहत की हद कितनी है ये दिखलाना चाहता हूँ, जीते जी ही नही मर कर भी तुझको पाना चाहता हूँ...

गज़ल

देवमणि पांडेय नही और कोई कमी ज़िन्दगी में चलो मिल के ढ़ूंढ़ें ख़ुशी ज़िन्दगी में हज़ारों नहीं एक ख़्वाहिश है दिल में मिले काश कोई कभी ज़िन्दगी में अगर दिल किसी को बहुत चाहता है उसे कर लो शामिल अभी ज़िन्दगी में मोहब्बत की शाख़ों पे गुल तो खिलेंगे अगर होगी थोड़ी नमी ज़िन्दगी में निगाहों में ख़ुशबू क़दम बहके बहके ये दिन भी हैं आते सभी ज़िन्दगी में मिलेंगे बहुत चाहने वाले तुमको मिलेगा न हमसा कभी ज़िन्दगी में बिछड़कर किसी से न मर जाए कोई वो मौसम न आए किसी ज़िन्दगी में

गज़ल

देवमणि पांडेय दिल ने चाहा बहुत पर मिला कुछ नहीं ज़िन्दगी हसरतों के सिवा कुछ नहीं उसने रुसवा सरेआम मुझको किया उसके बारे में मैंने कहा कुछ नहीं इश्क़ ने हमको सौग़ात में क्या दिया ज़ख़्म ऐसे कि जिनकी दवा कुछ नहीं पढ़के देखीं किताबें मोहब्बत की सब आँसुओं के अलावा लिखा कुछ नहीं हर ख़ुशी मिल भी जाए तो क्या फ़ायदा ग़म अगर न मिले तो मज़ा कुछ नहीं ज़िन्दगी ये बता तुझसे कैसे मिलें जीने वालों को तेरा पता कुछ नहीं

गजल

रचना गौड़ भारती जज्बात और महक जो काबू में आ जाते इंसान भी फ़रिश्तें की गिनती में आ जाते खत्म होगई थी रोशनाई लिखते लिखते वरना जज्बात हमारे भी कागज पे आ जाते पहले ही क्या कम थे यहां सागर खारे काबू कर न पाते तो आंख में आंसू आ जाते हर जख्म भरता नहीं बिना मरहम के कुछ शब्द ही होते जो इसके काम आ जाते शब्द स्पर्श से बड़े हैं हम भी ये बताते कुछ तो शब्द कहते हम और करीब आ जाते

साक्षात्कार

प्रो. रमेश जैन साक्षात्कार जनसंचार का अनिवार्य अंग है। प्रत्येक जनसंचारकर्मी को समाचार से संबद्ध व्यक्तियों का साक्षात्कार लेना आना चाहिए, चाहे वह टेलीविजन-रेडियो का प्रतिनिधि हो, किसी पत्र-पत्रिका का संपादक, उपसंपादक, संवाददाता। साक्षात्कार लेना एक कला है। इस विधा को जनसंचारकर्मियों के अतिरिक्त साहित्यकारों ने भी अपनाया है। विश्व के प्रत्येक क्षेत्र में, हर भाषा में साक्षात्कार लिए जाते हैं। पत्र-पत्रिका, आकाशवाणी, दूरदर्शन, टेलीविजन के अन्य चैनलों में साक्षात्कार देखे जा सकते हैं। फोन, ई-मेल, इंटरनेट और फैक्स के माध्यम से विश्व के किसी भी स्थान से साक्षात्कार लिया जा सकता है। अंतरिक्ष में संपर्क स्थापित कर सकते हैं। पहली बार पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी ने अंतरिक्ष यात्री कैप्टन राकेश शर्मा से संवाद किया था, जिसे दूरदर्शन ने प्रसारित किया था। इस विधा का दिन पर दिन प्रचलन बढ़ता जा रहा है। मनुष्य में दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ होती हैं। एक तो यह कि वह दूसरों के विषय में सब कुछ जान लेना चाहता है और दूसरी यह कि वह अपने विषय में या अपने विचार दूसरों को बता देना चाहता है। अपने अनु...

लो चुप्पी साध ली माहौल ने सहमे शजर बाबा

सतपाल ख्याल लो चुप्पी साध ली माहौल ने सहमे शजर बाबा किसी तूफ़ान की इन बस्तियों पर है नज़र बाबा. है अब तो मौसमों में ज़हर खुलकर सांस कैसे लें हवा है आजकल कैसी तुझे कुछ है खबर बाबा. ये माथा घिस रहे हो जिस की चौखट पर बराबर तुम उठा के सर जरा देखो है उस पर कुछ असर बाबा. न है वो नीम, न बरगद, न है गोरी सी वो लड़्की जिसे छोड़ा था कल मैने यही है वो नगर बाबा. न कोई मील पत्थर है जो दूरी का पता दे दे ये कैसी है डगर बावा ये कैसा है सफ़र बाबा.

ग़ज़ल

सतपाल ख्याल इतने टुकड़ों में बंट गया हूं मैं मैं खुद का कितना हूं सोचता हूं मैं. ये हुनर आते आते आया है अब तो ग़ज़लों में ढल रहा हूं मैं. हो असर या न हो किसे परवाह काम सजदा मेरा दुआ हूं मैं. कैसे बाजार में गुजर होगी बस यही सोचकर बिका हूं मैं

खूब लुभाती मुंबई

देवमणि पाण्डेय शहर हमारा जो भी देखे उस पर छाए जादू हरा समंदर कर देता है हर दिल को बेक़ाबू ताजमहल में ताज़ा काफ़ी जो भी पीने आए चर्चगेट की चकाचौंध में वो आशिक़ बन जाए चौपाटी की चाट चटपटी मन में प्यार जगाती है भेलपुरी खाते ही दिल की हर खिडकी खुल जाती है कमला नेहरु पार्क पहुंचकर खो जाता जो फूलों में प्यार के नग़्मे वो गाता है एस्सेल वर्ल्ड के झूलों में जुहू बीच पर सुबह-शाम जो पानी-पूरी खाए वही इश्क़ की बाज़ी जीते दुल्हन घर ले आए नई नवेली दुल्हन जैसी हर पल लगती नई सबको ऊंचे ख़्वाब दिखाकर खूब लुभाती मुंबई द्वारा - चाँद शुक्ला हदियाबादी www.radiosabrang.com **********************************

नई सदी के रंग में ढलकर हम याराना भूल गए

देवमणि पाण्डेय नई सदी के रंग में ढलकर हम याराना भूल गए सबने ढूंढे अपने रस्ते साथ निभाना भूल गये शाम ढले इक रोशन चेहरा क्या देखा इन आंखों ने दिल में जागीं नई उमंगें दर्द पुराना भूल गए ईद, दशहरा, दीवाली का रंग है फीका फीका सा त्योहारों में इक दूजे को गले लगाना भूल गए वो भी कैसे दीवाने थे ख़ून से चिट्ठी लिखते थे आज के आशिक़ राहे वफ़ा में जान लुटाना भूल गए बचपन में हम जिन गलियों की धूल को चंदन कहते थे बड़े हुए तो उन गलियों में आना जाना भूल गए शहर में आकर हमकॊ इतने ख़ुशियों के सामान मिले घर - आंगन, पीपल, पगडंडी , गांव सुहाना भूल गए द्वारा - चाँद शुक्ला हदियाबादी www.radiosabrang.com **********************************

ये चाह कब है मुझे सब का सब जहान मिले

देवमणि पाण्डेय ये चाह कब है मुझे सब का सब जहान मिले मुझे तो मेरी ज़मीं मेरा आसमान मिले कमी नहीं है सजावट की इन मकानों में सुकून भी तो कभी इनके दरमियान मिले अजीब वक़्त है सबके लबों पे ताले हैं नज़र नज़र में मगर अनगिनत बयान मिले जवां हैं ख़्वाब क़फ़स में भी जिन परिंदों के मेरी दुआ है उन्हें फिर नई उड़ान मिले हमारा शहर या ख़्वाबों का कोई मक़्तल है क़दम क़दम पे लहू के यहां निशान मिले हो जिसमें प्यार की ख़ुशबू मिठास चाहत की हमारे दौर को ऐसी भी इक ज़ुबान मिले द्वारा - चाँद शुक्ला हदियाबादी http://www.radiosabrang.com/

कब ऐसा सोचा था मैंने मौसम भी छल जाएगा

देवमणि पाण्डेय कब ऐसा सोचा था मैंने मौसम भी छल जाएगा सावन भादों की बारिश में घर मेरा जल जाएगा रंजो ग़म की लम्बी रातों इतना मत इतराओ तुम निकलेगा कल सुख का सूरज अंधियारा टल जाएगा अक्सर बातें करता था जो दुनिया में तब्दीली की किसे ख़बर थी वो दुनिया के रंगों में ढल जाएगा नफ़रत की पागल चिंगारी कितनों के घर फूंक चुकी अगर न बरसा प्यार का बादल सारा शहर जल जाएगा दुख की इस नगरी में आख़िर रैन बसेरा है सबका आज रवाना होगा कोई और कोई कल जाएगा द्वारा - चाँद शुक्ला हदियाबादी www.radiosabrang.com ************************************************

पलकों पलकों हर चेहरे पर ठहरा रहता जाने कौन

देवमणि पाण्डेय पलकों पलकों हर चेहरे पर ठहरा रहता जाने कौन दिल में प्यार का दरिया बनकर बहता रहता जाने कौन दुनिया है इक भूल भुलैया लोग यहां खो जाते हैं हर पल मेरा हाथ पकड़कर चलता रहता जाने कौन कोई अब तक देख न पाया न कोई ये जान सका हर पत्थर में हर ज़र्रे में उभरा रहता जाने कौन कभी किसी मासूम के दिल में ख़ूनी ख़ंज़र उतरा है बीच सड़क पर गर्म लहू सा बिखरा रहता जाने कौन अक्सर जब तनहा होता हूं रात के गहरे साए में उम्मीदों का दीपक बनकर जलता रहता जाने कौन द्वारा - चाँद शुक्ला हदियाबादी www.radiosabrang.com ******************************************

सबसे दिल का हाल न कहना लोग तो कुछ भी कहतें हैं

देवमणि पाण्डेय सबसे दिल का हाल न कहना लोग तो कुछ भी कहतें हैं जो कुछ गुज़रे ख़ुद पर सहना लोग तो कुछ भी कहतें हैं हो सकता है इससे दिल का बोझ ज़रा कम हो जाए क़तरा क़तरा आंख से बहना लोग तो कुछ भी कहतें हैं इस जीवन की राह कठिन है पांव मे छाले पड़ते हैं मगर हमेशा सफ़र में रहना लोग तो कुछ भी कहतें हैं नए रंग में ढली है दुनिया प्यार पे लेकिन पहरे हैं ख़्वाब सुहाने बुनते रहना लोग तो कुछ भी कहतें हैं प्यार को अब इस दुनिया ने जाने कितने नाम दिये हमने कहा ख़ुशबू का गहना लोग तो कुछ भी कहतें हैं उसकी यादों से रोशन है अब तक दिल का हर कोना मिल जाए तो उससे कहना लोग तो कुछ भी कहते हैं द्वारा - चाँद शुक्ला हदियाबादी www.radiosabrang.com

क़तरे को इक दरिया समझा मैं भी कैसा पागल हूं

देवमणि पाण्डेय क़तरे को इक दरिया समझा मैं भी कैसा पागल हूं हर सपने को सच्चा समझा मैं भी कैसा पागल हूं तन पर तो उजले कपड़े थे पर जिनके मन काले थे उन लोगों को अच्छा समझा मैं भी कैसा पागल हूं मेरा फ़न तो बाज़ारों में बस मिट्टी के मोल बिका ख़ुद को इतना सस्ता समझा मैं भी कैसा पागल हूं बीच दिलों के वो दूरी थी तय करना आसान न था आंखों को इक रस्ता समझा मैं भी कैसा पागल हूं पाल पोसकर बड़ा किया था फिर भी इक दिन बिछड़ गये ख़्वाबों को इक बच्चा समझा मैं भी कैसा पागल हूं द्वारा - चाँद शुक्ला हदियाबादी www.radiosabrang.com

कभी कहना कभी कह कर न आना याद रहता है

इफ्तखार नसीम कभी कहना कभी कह कर न आना याद रहता है मुझे उस शक्स का हर एक बहाना याद रहता है कोई भी वक्त हो गम उसका मुझको ढूँढ लेता है यह ऐसा तीर है जिस को निशाना याद रहता है निकलते हो तो रस्ते मैं मेरा घर भूल जाते हो तुम्हें वैसे तो यह सारा ज़माना याद रहता है हम इन्सां हैं तो कैदे जबर में खामोश रहते हैं परिंदों को असीरी मैं भी गाना याद रहता है नसीम उस शख्स को हर हाल में तुम खुश ही देखोगे जिसे पीरी मैं बचपन का ज़माना याद रहता है Editor In Chief, Talk Show HostWeekly Pakistan NewsSargam Radio Channel6033 N. Sheridan Rd. Suite 40-JChicago IL 60660 द्वारा - चाँद शुक्ला हदियाबादी http://www.radiosabrang.com/