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ख़्वाब का दर बंद है

शहरयार


मेरे लिए रात ने
आज फ़राहम किया
एक नया मर्हला
नींदों ने ख़ाली किया
अश्कों से फ़िर भर दिया
कासा मेरी आँख का
और कहा कान में
मैंने हर एक जुर्म से
तुमको बरी कर दिया
मैंने सदा के लिए
तुमको रिहा कर दिया
जाओ जिधर चाहो तुम
जागो कि सो जाओ तुम
ख़्वाब का दर बंद है

Comments

यह भी ग़ज़ल नहीं है ,नज़्म कह सकते हैं ।
Junaid said…
bahut khoob :) shaharyar sahab apni nazmo,ghazlon or naghmon me jawedan rahenge!!

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