Saturday, October 11, 2008

तुलसी का रामचरित मानस


राही मासूम रज़ा

आलोचना कोई तीर मारने का काम नहीं है, बल्कि साहित्य को समझने की कला है । और चुँकि हम मनुष्य की आत्मा को साहित्य की मदद के बिना नहीं समझ सकते, इसलिए आलोचना का महत्व बढ़ जाता है । आलोचना टिप्पणी या ‘फूटनोट’ नहीं है । आलोचक शब्दों की आत्मा में झाँकता है, क्योंकि साहित्य में शब्दों का प्रयोग नहीं होता, बल्कि शब्द प्रतीक बन जाते हैं । इसलिए साहित्य को समझने के लिए उसकी प्रतीक-भाषा से परिचित होना ज़रूरी है ।

इस भूमिका की ज़रूरत इसलिए पड़ी कि मैं इस समय जिस रास्ते पर चलने का प्रयत्न कर रहा हूँ, वह तलवार से ज़्यादा तेज़ और बाल से ज़्यादा बारीक़ है । बात यह है कि मैं अगर किसी ‘मीर’ या ‘ग़ालिब’, किसी ‘जायसी’ या ‘टैगोर’ की बात करनेवाला होता, तो डर न लगता परंतु मैं बात करने जा रहा हूँ मीर, अनीस और तुलसीदास की । और इनके बारे में भी यह कह रहा हूँ कि इनके काव्य का सामाजिक आधार है । मैं यह कहने जा रहा हूँ कि अनीस के मरसियों और तुलसीदास के ‘रामचरित मानस’ का राजनीतिक आधार भी है । और यदि ये रचनाएँ सामाजिक व राजनीतिक आधारविहीन होतीं तो इतनी बड़ी न होतीं । डर इसलिए लग रहा है कि ये दोनों ही कवि धार्मिक समझ लिए गए हैं । परंतु कविता धार्मिक या अधार्मिक नहीं होती । केवल मज़हब कभी कला का आधार नहीं हो सकता ।

अनीस के हुसैन लखनऊ या भारत के प्रतीक हैं । तुलसी के राम और लक्ष्मण भी प्रतीक ही हैं, क्योंकि साहित्य प्रतीक भाषा का प्रयोग करता है । तो तुलसी के राम काहे का प्रतीक हैं ? यानी मैं यह देखने का प्रयत्न कर रहा हूँ कि क्या ‘रामचरित मानस’ का कोई सामाजिक आधार है परंतु ‘रामचरित मानस’ की बातें करने से पहले कुछ बातों को साफ़ कर लिया जाए, तो अच्छा है ।

‘रामचिरत मानस’ भक्तिकाल की एक रचना है । क्या आप मेरी इस बात से सहमत हैं कि भक्तिकाल का काव्य-साहित्य बुनियादी तौर पर विरह का साहित्य है ? ‘राम की बहुरिया’ से रसखान तक विरह का एक बियावान फैला हुआ है । कहीं सूर की गोपियाँ बिलख रही हैं और कहीं मीरा । कहीं जायसी की नागमती व्याकुल है और कहीं तुलसी की सीता । ‘पद्मावत’ का सबसे ख़ूबसूरत हिस्सा उसकी नायिका या उसके नायक के हाल में ही नहीं है, बल्कि नागमती के हाल में है । क्या यह केवल इत्तिफ़ाक है ? और क्या यह भी केवल इत्तिफ़ाक है कि अकबरी की जीवन-रेखा को पार करते ही भक्तिकाल ऋंगार की सीमा में प्रवेश करने लगता है ? और क्या यह भी इत्तिफ़ाक हैकि महाभारत का ‘हीरो’ कृष्ण भक्तिकाल के कवियों को नहीं भाया ? उन्हें तो कृष्ण का बालरूप पसंद आया, जब वे मक्खन चुरा रहे थे और माँ की डाँटें सुन रहे थे । इन बातों पर विचार करने की ज़रूरत है, क्योंकि साहित्य में कोई बात इत्तिफ़ाक से नहीं हो जाती ।

यह भक्तिकाल की शायरी किस की तलाश में है ? कौन खो गया है, जिसके लिए यह काल बिलख रहा है ? बात शायरों की नहीं, बल्कि युगबोध की है । और फिर कौन मिल गया कि विरह की आग बुझ गई और काव्य में ऋंगार का रस आ गया ? यह खो जानेवाली चीज़ ऐसी है, जिसके लिए हिंदू सूरदास और मुसलमान कुतुबन दोनों ही रो रहे हैं । और फिर वह क्या चीज़ है कि जिसके मिलते ही सबके सब ऋंगार का रस पीकर झूमने लगे ? भक्तिकाल को समझने के लिए यह देखना पड़ेगा कि हिंदुस्तानी जीवन या हिंदुस्तानी समाज में कौन-सी नयी चीज़ शामिल हुई, या कौन-सी चीज़ निकल गई ।

हम देखते यह हैं कि जब हिंदूस्तान पर ताबड़तोड़ हमले हो रहे थे और लड़ाई के मैदान में हमारी हार हो रही थी, तो हमारे कवियों ने वीरगाथाएँ सुनाईं । यह लड़ाइयों का युग है । हार-जीत का फैसला नहीं हुआ है । परंतु जब रणभूमि की कहानी समाप्त हुई, तो एकदम वीरगाथाएँ लड़खड़ाने लगीं और भक्ति का संगीत उभरा । इस्लाम और मुसलमान बादशाह – हमारे जीवन में ये दो नयी चीज़े शामिल हो गईं । मुसलमान हमलावर, मुसलमान बादशाह दो चीज़ें हैं और इन्हें गड्डमड्ड नहीं करना चाहिए । और इस्लाम एक बिलकुल तीसरी चीज़ है और इन हमलावरों और बादशाहों से बिलकुल अलग है । इन मुसलमान बादशाहों ने हिंदू बादशाहों की तरह पगड़ी के ताज पहने ! और उन्हीं दिनों यह आवाज़ सुनी गई कि राम कहो कि रहीम कहो........ यानी भक्तिकाल हिंदूस्तानी नयी आत्मा की तलाश का युग है । अकबर तक आते-आते भक्तिकाव्य अपने उत्कर्ष पर आ जाता है । उधर दीने-इलाही शुरू होनेवाला है, इधर सूर, तुलसी और जायसी की आवाज़ आ रही है । कौन यह कह सकता है कि ताज़ मीरा से घटिया कृष्ण भक्त है ? कौन यह कह सकता है कि रसखान की आवाज़ में भक्ति का जो रस है, वह हल्का है ? – यानी वह आत्मा मिल गई, जो ग्यारहवीं-बारहवीं सदी से ढूंढ़ी जा रही थी । बाहर से आनेवाली आत्मा देश की आत्मा में घुल गई । जैसे गंगा से जमुना घुल गई है । इस बात को जाहिर करने के लिए महाभारत के कृष्ण की ज़रूरत नहीं थी । यह बात तो नटखट माखनचोर के जरिये ही कही जा सकती थी । क्योंकि महाभारत के कृष्ण के साथ तो भीम आते अपनी गदा सँभाले हुए । और अर्जुन आते अपनी कमान लिये हुए और फिर रम होता परंतु देश की आत्मा तो शांति की तलाश में थी, इसलिए गोकुल में बालकृष्ण आया- बंसी बजाता हुआ, गाएँ चराता हुआ, बड़े भाई की शिकायत करता हुआ, मक्खन चुराता हुआ, गोपियों को परेशान करता हुआ- इस वातावरण से शांति की सुगंध आती है । इन गीतों में गाँव बसे हुए हैं । बच्चे खेल रहे हैं । माताएँ मक्खन बिलो रही हैं । लड़ाई-वड़ाई तो ख़त्म हो चुकी है । लड़ाई ख़त्म न हो चुकी होती तो कृष्ण ताज़ के घर में मक्खन चुराने कैसे चले जाते ? ये बाल कृष्ण प्रतीक हैं इस अभिलाषा के कि जिन बदनों पर लड़ाई के निशान हैं, वे तो शायद लड़ाई को भूल न पाएँ लेकिन जब आज के बच्चे जवान होंगे, तो उन्हें ये लड़ाइयाँ क्यों याद आएँगी ?

परंतु तुलसीदास की आवाज़ भक्तिकाल के तमाम कवियों की आवाज़ से अलग है । इसलिए मैं तुलसीदास की बात भी अलग से ही करना चाहता हूं । तुलसीदास को इस नयी आत्मा की तलाश नहीं है, जिसे सारा भक्तिकाल तलाश रहा था, बल्कि उन्हें उसी पुरानी आत्मा की तलाश थी, जो मुसलमान हमलावरों से जूझ गई थी । और शायद यही वजह है कि सूरदास और जायसी से कमतर रसमय होते हुए भी, वे दोनों से ज़्यादा लोकप्रिय हुए ! तुलसीदास के लिए लड़ाई ख़त्म नहीं हुई थी । इसीलिए उन्होंने किसी आशिक़ को अपना कथानायक नहीं बनाया, बल्कि उन्होंने एक योद्धा को चुना । राम और रावण की लड़ाई सीता के परिचय से पहले ही उस तपोवन में शुरू हो गई थी, जहाँ अयोध्या के दो राजकुमार कंधे से कमाने लटकाए उसकी पवित्र शांति की हिफ़ाजत कर रहे थे । यानी यह बात हमें पहले ही बता दी जाती है कि इस कहानी का नायय एक वीर सिपाही है । यह बात भी महत्वपूर्म है कि तुलसीदास का नायक भी सूरदास के नायक की तरह बच्चा है । यानी तुलसीदास भी सूरदास की ही तरह नयी पीढ़ी से आशा बाँध रहे हैं । परंतु इन दोनों की आशाओं में बड़ा फ़र्क़ है । सूर शांति का ख़्वाब देख रहे हैं और तुलसी लड़ाई का । यानी ‘रामचरित मानस’वास्तव में भक्तिकाव्य के सिलसिले की कड़ी नहीं है, बल्कि वीरगाथा काल का एक अँग है ।
महाकाव्य की परंपरा के अनुसार तुलसीदास ने राजा का कसीदा नहीं लिखा है । ऐसा क्यों है ? ऐसा इसलिए है कि तुलसीदास किसी मुसलमान को राजा मान ही नहीं सकते थे । मुझे दरअसल इसी कसीदे की कमी ने चौंकाया था । इस कसीदे का न होना एक बुनियादी इशारा है और इसी के सहारे हम तुलसीदास की प्रतीक-भाषा को समझने की कोशिश कर सकते हैं ।

मेरे ख़्याल में रावण मुसलमान बादशाह है । सीता हमारी आज़ादी, हमारी सभ्यता और हमारी आत्मा है, जिसे रावण हर ले गया है । परशुराम की कमान राम के हाथ में है । यानी ब्राह्मणों से धर्म की रक्षा नहीं हो सकती है । क्षत्रिय ? मगर सारे राजा-महाराजा तो मुगल दरबार में हैं । तुलसीदास ऊँची जाति के हिंदुओं से मायूस हैं, क्योंकि ऊँची जाति के हिंदू तो मुगल से मिले बैठं हैं । मगर वे किसी अछूत की नायक नहीं बना सकते थे । इसीलिए उन्होंने एक देवता नायक बनाया । (यह बात बहुत महत्वपूर्ण है कि आर्यपुत्र राम ने भीलनी के जूठे बेर खाये ।) राम की सेना में लक्ष्मण के सिवा ऊँची जाति का एक आदमी भी नहीं है । इन दोनों भाइयों के सिवा राम की सेना में केवल बंदर हैं – नीची जाति के लोग । यानी ऊँची जाति के लोगों से मायूस होकर तुलसीदास ने अछूतों या नीची जाति के हिंदुओं को धर्म की रक्षा के लिए आवाज़ दी ।

लड़ाई हुई । रावण हार गया । सीता मिल गई परंतु नतीजा क्या हुआ ? तुलसी ने देखा कि यह सीता वह नहीं है । इसलिए तुलसी की बसाई हुई अयोध्या ने उस सीता को कुबूल नहीं किया – अग्निपरीक्षा के बाद बी कुबूल नहीं किया, परंतु उसी सीता के बच्चों ने यज्ञ के घोड़े की लगाम पर हाथ डाल दिया । बात फिर बच्चों ही तक आई।

यों हम यह देखते हैं कि धार्मिक साहित्य भी एक सामाजिक आधार होता है ।

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