नासिरा शर्मा  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद




नासिरा शर्मा विशेषांक उपलब्ध मूल्य 100/ (डाक खचॅ अलग) पृष्ट 330
अनुक्रम

सम्पादकीय
नासिरा शर्मा : मेरे जीवन पर किसी का हस्ताक्षर नहीं
डॉ. सुदेश बत्रा : नासिरा शर्मा - जितना मैंने जाना
ललित मंडोरा अद्भुत जीवट की महिला नासिरा शर्मा
अशोक तिवारी : तनी हुई मुट्ठी में बेहतर दुनिया के सपने
शीबा असलम फहमी : नासिरा शर्मा के बहान
अर्चना बंसल : अतीत और भविष्य का दस्तावेज : कुइयाँजान
फजल इमाम : जीरो रोड में दुनिया की छवियां
अमरीक सिंह दीप : ईरान की खूनी क्रान्ति से सबक़
सुरेश पंडित : रास्ता इधर से भी जाता है
वेद प्रकाश : स्त्री-मुक्ति का समावेशी रूप
डॉ. नगमा जावेद : जिन्दा, जीते-जागते दर्द का एक दरिया हैः जिन्दा मुहावरे
डॉ. आदित्य : भारतीय संस्कृति का कथानक जीवंत अभिलेखः अक्षयवट
एम. हनीफ़ मदार : जल की व्यथा-कथा कुइयांजान के सन्दर्भ में
बन्धु कुशावर्ती : जीरो रोड का सिद्धार्थ
प्रो. अली अहमद फातमी - एक नई कर्बला
सगीर अशरफ : नासिरा शर्मा का कहानी संसार - एक दृष्टिकोण
प्रत्यक्षा सिंहा : संवेदनायें मील का पत्थर हैं
डॉ. ज्योति सिंह : इब्ने मरियम : इंसानी मोहब्बत का पैग़ाम देती कहानियाँ
डॉ. अवध बिहारी : इंसानियत के पक्ष में खड़ी इबारत - शामी काग़ज
डॉ. संजय श्रीवास्तव : मुल्क़ की असली तस्वीर यहाँ है
हसन जमाल : खुदा की वापसी : मुस्लिम-क़िरदारों की वापसी
प्रताप दीक्षित : बुतखाना : नासिरा शर्मा की पच्चीस वर्षों की कथायात्रा का पहला पड़ाव
प्रो. वीरेन्द्र मोहन : मानवीय संवेदना और साझा संस्कृति की दुनियाः इंसानी नस्ल
प्रो. रोहिताश्व : रोमांटिक अवसाद और शिल्प की जटिलता
मूलचंद सोकर : बुजकशी का मैदान- एक महान देश की अभिशप्त गाथा
प्रो. रामकली सराफ : स्त्रीवादी नकार के पीछे इंसानी स्वरः औरत के लिए औरत
इकरार अहमद : राष्ट्रीय एकता का यथार्थ : राष्ट्र और मुसलमान
सिद्धेश्वर सिंह : इस दुनिया के मकतलगाह में फूलों की बात
आलोक सिंह : नासिरा शर्मा का आलोचनात्मक प्रज्ञा-पराक्रम
डॉ. मेराज अहमद : नासिरा शर्मा का बाल साहित्य : परिचयात्मक फलक
नासिरा शर्मा प्रेमकुमार की बातचीत
नासिरा शर्मा मेराज अहमद और फीरोज अहमद की बातचीत
सम्पादक: वाङ्मय (त्रैमासिक हिन्दी पत्रिका) बी-4,लिबटी होम्स ,अलीगढ, उत्तरप्रदेश(भारत),202002, मोब: +91 941 227 7331

वैषम्य  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद

महेंद्र भटनागर

हर व्यक्ति का जीवन
नहीं है राजपथ —
उपवन सजा
वृक्षों लदा
विस्तृत
अबाधित
स्वच्छ
समतल
स्निग्ध !
.
सम्भव नहीं
हर व्यक्ति को
उपलब्ध हो
ऐसी सुगमता,
इतनी सुकरता।
सम दिशा
सम भूमि पर
आवास सबके हैं नहीं प्रस्थित,
एक ही गन्तव्य
सबका है नहीं
जब अभिलषित।
.
कुछ को
पार करनी ही पड़ेंगी
तंग-सँकरी
कण्ट-कँकरीली
घुमावोंदार
ऊँची और नीची
जन-बहुल
अंधारमय
पगडण्डियाँ — गलियाँ
पसीने-धूल से अभिषिक्त,
प्रति पग पंक से लथपथ।
.
नहीं,
हर व्यक्ति का जीवन
सकल सुविधा सहित
आलोक जगमग
राजपथ !
.
जब भूमि बदलेगी,
मार्ग बदलेगा !
.
 

जीवन-संदर्भ  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद

महेंद्र भटनागर

आओ
जीवन की गीता को
अभिनव संदर्भ प्रदान करें !
बदला
जब परिवेश मनुज का
आओ
नयी ऋचाओं का निर्माण करें !
.
नव मूल्यों को स्थापित कर
जीवन-धर्मी कविता के
अन्तर-बाह्य स्वरूपों को
अभिनव रचना दे !
जीवन्त नये आदर्शों की आभा दें !
जगमग स्वर्णिम गहने पहना दें !
.
जीवन की प्रतिमा को
नयी गठन
नव भाव-भंगिमा से सज्जित कर;
मानव को
चिर-इच्छित
संबंधों की गरिमा से
सम्पूरित कर
युग को महिमावान करें !
आओ
नव राहों के अन्वेषी बन
नूतन क्षितिजों की ओर
प्रवह प्रयाण करें !
.

ऊहापोह  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद

महेंद्र भटनागर

प्रश्न —
अविकल स्थिर
अपनी जगह पर।
पंगु
सारी तर्कना,
विखण्डित
कल्पना !
अनिश्चित की शिलाओं तले
रोपित प्रश्न !
.
सूत्राभाव
पूर्व...उत्तर...सर्वत्र
ठहराव !
.
यह कश-म-कश
और कब तक ?
विवश मनःस्थिति
और कब तक ?
और कब तक
ओढ़े रहोगे प्रश्न ?
उलझी ऊबट सतह पर।
.
सब पूर्ववत्
अपनी जगह पर।

वात्याचक्र  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद

महेंद्र भटनागर

अंधड़
आ रहा सम्मुख
उमड़ता
सनसनाता
वेगवाही
धूलि-धूसर !
.
कुछ क्षणों में
घेर लेगा बढ़
तुम्हारा भी गगन !
जागो उठो
दृढ़ साहसिक मन
हो सचेत-सतर्क !
थपेड़े झेलने का प्रण
अभी
तत्काल
निश्चय आत्मगत कर।
.
अंधड़ों की शक्ति
तुमको तौलनी है,
संकटों पर
आत्मबल सन्नद्ध हो
जय बोलनी है,
प्राण की सोयी हुई
अज्ञात-मेधा को सचेतन कर !
.
हिमालय-सम
सुदृढ़ व्यक्तित्व के सम्मुख
गरजता क्रूर अंधड़
राह बदलेगा !
मरण का तीव्र धावन
तिमिर अंधड़
राह बदलेगा !

परिवेश के प्रति  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद

महेंद्र भटनागर

कितनी तीखी ऊमस से
परिपूर्ण गगन,
लहराती अग्नि-शिखाओं से
कितना परितप्त भुवन !
कितना क्षोभ-युक्त
भाराक्रांत
दमित
मानव-मन !
जीवन का
वातावरण समस्त
थका-हारा,
काराबद्ध !
.
आओ
इसको बदलें,
गतिमान करें,
मल्लार-राग से भर दें
जलवाह !
पवन-संघातों से
निःशेष करें
दिग्दाह !