Sunday, October 12, 2008

धर्म का हव्वा और यूनिवर्सिटिया - राही मासूम रजा


चित्र पर किलिक करें और पढे.

2 comments:

राजीव रंजन प्रसाद said...

डो. फीरोज इस प्रस्तुति का आभार। दुर्लभ आलेख है। रज़ा वास्तव में उस धर्मनिर्पेक्षता के प्रहरी थे जिसके मायने राष्ट्र भूल चुका है।

Satyajeetprakash said...

इस बात को छद्म-धर्म-निरपेक्षियों को समझने की जरूरत है. इसके बाद शायद मुसलमान भी इस बात को समझें तो देश का भला होगा.