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धर्म का हव्वा और यूनिवर्सिटिया - राही मासूम रजा


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डो. फीरोज इस प्रस्तुति का आभार। दुर्लभ आलेख है। रज़ा वास्तव में उस धर्मनिर्पेक्षता के प्रहरी थे जिसके मायने राष्ट्र भूल चुका है।
इस बात को छद्म-धर्म-निरपेक्षियों को समझने की जरूरत है. इसके बाद शायद मुसलमान भी इस बात को समझें तो देश का भला होगा.