Tuesday, October 7, 2008

ऐसे हिज्र के मौसम अब कब आते हैं

शहरयार

ऐसे हिज्र के मौसम अब कब आते हैं
तेरे अलावा याद हमें सब आते हैं

जज़्ब करे क्यों रेत हमारे अश्कों को
तेरा दामन तर करने अब आते हैं

अब वो सफ़र की ताब नहीं बाक़ी वरना
हम को बुलावे दश्त से जब तब आते हैं

जागती आँखों से भी देखो दुनिया को
ख़्वाबों का क्या है वो हर शब आते हैं

काग़ज़ की कश्ती में दरिया पार किया
देखो हम को क्या क्या करतब आते हैं

1 comment:

योगेन्द्र मौदगिल said...

काग़ज़ की कश्ती में दरिया पार किया
देखो हम को क्या क्या करतब आते हैं

Bhai Wah
shaharyar saheb ka koi jawaab nahi

Firoj ji Aapki is prastuti ko salaam