Saturday, May 17, 2008

नई सदी के रंग में ढलकर हम याराना भूल गए

देवमणि पाण्डेय


नई सदी के रंग में ढलकर हम याराना भूल गए
सबने ढूंढे अपने रस्ते साथ निभाना भूल गये

शाम ढले इक रोशन चेहरा क्या देखा इन आंखों ने
दिल में जागीं नई उमंगें दर्द पुराना भूल गए

ईद, दशहरा, दीवाली का रंग है फीका फीका सा
त्योहारों में इक दूजे को गले लगाना भूल गए

वो भी कैसे दीवाने थे ख़ून से चिट्ठी लिखते थे
आज के आशिक़ राहे वफ़ा में जान लुटाना भूल गए

बचपन में हम जिन गलियों की धूल को चंदन कहते थे
बड़े हुए तो उन गलियों में आना जाना भूल गए

शहर में आकर हमकॊ इतने ख़ुशियों के सामान मिले
घर - आंगन, पीपल, पगडंडी , गांव सुहाना भूल गए
द्वारा - चाँद शुक्ला हदियाबादी www.radiosabrang.com
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2 comments:

mahendra mishra said...

बहुत बढ़िया धन्यवाद

junaid iqbal said...

very nice...ab yahi maujooda soorat-e-haal hai!