Monday, May 5, 2008

खाये पिये लोग

हबीब क़ैफ़ी
देखने में ये लोग खूबसूरत थे। आकर्षक भी। इनके रहने के लिए ख़ास इलाक़ा था। इसे पॉश कॉलोनी कहा जाता है। यह मख़सूस कॉलोनी योजनाबद्ध तरीके से बसी हुई थी। यहाँ भव्य इमारतें थी। अतिरिक्त ऑक्सीजन, सजावट और खूबसूरती के लिए इनके आगे बग़ीचे थे। दूब थी। रिहाइशगाहों के अन्दर की सजावटें आकर्षक और आँखों को भली लगने वाली थीं। ठंडक पहुँचाने वाली भी।
इन ख़ास लोगों की जीवन शैली भी कुछ ख़ास क़िस्म की थी। यह कहने में भी कोई मुजायक़ा नहीं कि पहनने ओढ़ने और खानपान के पैमाने इनकी जीवन शैली से ही निर्धारित किए गए थे। ये लोग उच्च शिक्षा प्राप्त शालीन, सुसभ्य और संस्कारवान थे। धनवान तो ये थे ही। इन्हें जीवन का आनन्द उठाना आता था।
यहाँ रहने वाले लोगों में जिस्मानी ताक़त कुछ ख़ास नहीं थी। ज्यादातर लोग विटामिनों की गोलियाँ कैप्सूल और तरह-तरह के टॉनिक इस्तेमाल करते थे। लेकिन इन लोगों के दिमाग़ ग़जब के थे। दिमाग़ के बूते पर ही इन लोगों के ठाठ थे। इसी के बल पर इन्होंने बहुत कुछ नियंत्रित और संचालित कर रखा था। ज्यादातर फैक्ट्रियों, ख़दानों, चूने के बड़े-बड़े भट्टों और जरूरत की हर चीज पर इन्हीं लोगों का कंट्रोल था। लगभग तमाम तरह के ट्रस्ट, धार्मिक संस्थाएँ, राहत शिविर और उपकार योजनाएँ इन्हीं के इशारों पर चलतीं थीं। राजनीति के तमाम संचालन सूत्र भी इन्हीं लोगों से मिलते थे। हद तो यह कि टीवी के विभिन्न चैनलों पर दिखाए जाने वाले धारावाहिकों के कथानक इन्हीं की जीवन शैली और राग द्वेश आदि को दर्शाते थे। अधिसंख्य लोगों को लुभाने और ललचाने वाले विज्ञापनों में दिखाई जाने वाली महंगी और आकर्षक चीजों के अस्ल खरीदार यही लोग थे।
इन लोगों के शौक़ आला दर्जे के और नफ़ीस थे। क्रिकेट इन का प्रिय खेल था। फुटबॉल और टेनिस से भी इन्हें लगाव था। इनडोर गेम्स में भी इन की ख़ासी दिलचस्पी थी। मार्लिन मुनरो, मौहम्मद अली क्ले, माइकल जैक्शन, पिकासो, फैज अहसद फैज, फोंडा, ओशो, कुन्दन लाल सहगल, तेंदुलकर, जेम्स हेडली, चेईज, नाना पाटेकर, नुसरत फतेह अली खाँ और ऐसी ही दीगर शख्सियतें इनकी पसंद के दायरे में आती थीं।
यहाँ की सफाई और रोशनी व्यवस्था का कहीं जवाब नहीं था। जिन्दगी की तमाम सुविधाएँ यहाँ मौजूद थी।
इस पॉश कॉलोनी में ग़जब की ख़ूबसूरती थी। बच्चे बड़े तंदरुस्त और गुलाब के फूलों की मानिन्द थे। इधर के किसी भी बच्चे, बूढ़े या जवान स्त्री-पुरुष को मेकअप के बिना ही दूरदर्शन के विज्ञापनों में दिखाया जा सकता था। इस कॉलोनी के किशोर-किशोरियों का सज-धज कर बसों और ऑटो रिक्शा में स्कूल आना-जाना बड़ा ही मनभावन था। इधर के जवान हो चले बच्चे स्थानीय कॉलेजों से लेकर समंदर पार तक ऊँची तालीम हासिल कर रहे थे। ज्यादातर आला अफ़सर और इनसाफ़ करने वाले इन्हीं में से बनते थे।
थोड़े में अगर कहा जाए तो ये खाये पिये लोग थे।
खाये पिये इन लोगों के पास कई तरह की सम्पत्तियाँ थीं। अपार धन था। देश-विदेश में इनके बैंक खाते थे। इसी से ये सम्पन्न कहलाते थे।
इन सम्पन्न लोगों के बड़े-बड़े फार्म हाऊस थे जहाँ बढ़िया क़िस्म के अनाज के अलावा फल-फूल और सब्जियों की पैदावार होती थी। कहने वाले यह भी कहते हैं कि यहाँ बहुत कुछ स्याह-सफ़ेद होता रहता था। ये फ़ार्म हाऊस इनके स्वास्थ्य सुधार के साथ-साथ मौज मस्ती जुटाने के काम भी आते थे।
कृषि वैज्ञानिकों के प्रयोग सफल हो जाने के सबब इस वर्ष यहाँ पैदावार के मामले में चमत्कार देखने में आया। अनाज की रिकार्ड पैदावार हुई। पैदावार भी ऐसी कि अनाज रखने के लिए जगह का टोटा पड़ने लगा। यही हाल फलों की पैदावार का था। फूलों का भी। अधिक पैदावार की यह तरकीब और तकनीक अभी कुछ ख़ास फ़ार्म हाऊसों तक ही सीमित थी।
इफ़रात से पैदावार की बात से खाये पिये लोगों को खुश होना था। लेकिन ये खुश नहीं हुए। इसकी वजह थी, पैदावार को ठिकाने लगाने की समस्या और फिर फल-फूलों के स्टॉक का तो सवाल ही नहीं था। तब क्या किया जाए? समस्या को सुलझाने के लिए इन लोगों ने एक मीटिंग बुलाई। हंसी-खुशी के माहौल में इन लोगों ने आख़िर पैदावार की इफ़रात का हल निकाल ही लिया। तय पाया कि बाजार भाव को नीचे न आने देने के लिए अतिरिक्त पैदावार ठिकाने लगा दी जाए।
तयशुदा प्रोग्राम के तहत अतिरिक्त पैदावार को लॉरियों और ट्रकों में लाद दिया गया। इस तरह एक क़ाफ़िला बन गया। अभी यह क़ाफ़िला गंतव्य स्थल की ओर रवाना भी नहीं हुआ था कि एक अजीब मंजर पैदा हो गया। वहाँ भीड़ जमा हो गई।
यह भीड़ अधनंगे और काले-कलूटे तथा सांवले लोगों की थी। इनके पेट पसलियों से चिपके हुए थे। आँखें अंदर को धंसी हुई और निस्तेज थीं। इनके साथ वाले नंगधड़ंग बच्चों के पेट फूले हुए थे और आँखों में कीचड़ था। इन सबके बदन और साँसों से बदबू के भभके उठ रहे थे। भीड़ में हर उम्र के स्त्री-पुरुष शरीक थे।
पता चला कि नंगे-भूखों की यह भीड़ अतिरिक्त पैदावार की भीख से पेट का दोजख़ भर लेने की आस लिए यहाँ जमा हुई थी।
खाये पिये लोग भीड़ की भूख़ का फैसला करने के लिए वहाँ मौजूद न थे। ऐसी सूरत में तयशुदा प्रोग्राम के तहत ट्रकों और लारियों का क़ाफ़िला गंतव्य स्थल के लिए रवाना हो गया। भीड़ ने हालांकि इस क़ाफिले को रोकने के भरसक प्रयास किये, लेकिन कामयाबी हासिल न हो सकी। इस दौरान नंगे-भूखों में से कुछ जख्मी भी हो गए।
लेकिन अभी यह क़ाफिला कुछ किलोमीटर ही आगे बढ़ा था कि सड़क के ऐन बीच में ऐसी ही एक और भीड़ दिखाई दे गई। छोटी मोटी तब्दीली के साथ यहाँ भी पिछली भीड़ जैसे लोग ही थे-भूखे और नंगे-अधनंगे। सड़क पर अवरोध देखकर क़ाफ़िले को मजबूरन रूकना पड़ा। इस भीड़ के लोग जरा जिद्दी और जुझारू किस्म के थे। इन पर इसरार था कि बरबाद करने की बजाए अतिरिक्त पैदावार उन्हें दे दी जाए। लेकिन अपने मालिकों के आदेश-निर्देश के बिना क़ाफिले वाले ऐसा करने में असमर्थता जाहिर कर रहे थे। ऐसे में टकराव की सूरत पैदा हो गई। लेकिन यह टकराव लगभग शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गया। गरीबी और भूख से लाग़िर लोग जल्दी ही पस्त हो गए और अतिरिक्त पैदावार के साथ अपने पीछे धूल-धुआँ छोड़ता हुआ क़ाफ़िला आगे बढ़ गया। पिछली बार की तरह इस दफ़ा भी भीड़ में से कुछ लोग जख्मी और लहूलुहान हुए। दो-तीन तो ट्रकों की चपेट में आने से बाल-बाल बचे भी।
होते-होते यह हुआ कि क़ाफिले के लोग ऐसे अवरोधों के आदी हो गए और उन्हें इससे निपटना भी आ गया। क़ाफ़िला इस तरह आगे ही आगे बढ़ता गया। ऐसा नहीं कि इसके लिए इन्हें हर दफ़ा मशक्कत ही करना पड़ी हो। बल्कि इसके बरख़िलाफ कुछ एक जगह पर तो इनके लिए दिलचस्पी की सूरतें भी पैदा हो चली थीं।
एक मुकाम पर तो इनका अच्छा खासा मनोरंजन भी हो गया। हुआ यह कि अवरोध के रूप में मिली ऐसी भीड़ में कुछ नाचने-गाने वाले भी थे। क़ाफ़िले वालों को जब इस बात का पता चला कि वे बड़े खु+श हुए और अपनी दिलबस्तगी के लिए उन्होंने नाच दिखाने और गाना सुनने का इरादा जाहिर कर दिया। फिर क्या था। आन की आन में नाच-गाना शुरू हो गया। इस तरह जंगल में मंगल का समां पैदा हो गया। नंगे-भूखे लोग बड़े ही मनोयोग से क़ाफिले वालों को मनोरंजन करने लगे। इसकी वजह साफ़ थी। उन्हें पक्का यक़ीन था कि खुश होकर क़ाफ़िले वाले अतिरिक्त पैदावार में से काफी कुछ दे डालेंगे।
ट्रकों और लॉरियों वाले इधर खुश हुए जा रहे थे और उधर नंगे-भूखे चक्कर घिन्नी खाने और गले में ख़राशें पड़ने की सीमा तक नाच-गा रहे थे। इस दौरान दो-एक तो चकरा कर वहीं गिरे और बुरी तरह से हाँफने लगे। क़ाफ़िले वालों ने इसे भी उन लोगों की एक अदा जाना और हँस-हँसकर लोटपोट होने लगे। इनमें से ज्यादातर लोगों के हाथों में इस वक्त बोतलें और गिलास देखने में आये। आख़िर इस सबसे इनका जी भर गया तो फट चले बोरों से बाहर आया अनाज और गिनती के कुचले हुए या अध खाए फल भीड़ की तरफ फेंककर ये लोग आगे बढ़ गए। क़ाफ़िले को यहाँ से आगे बढ़ने में असुविधा इसलिए नहीं हुई कि भीड़ के लोग अनाज के दानों और फेंके गए फलों को क़ब्जे+ में ले लेने के लिए एक दूसरे पर टूट पड़ रहे थे। क़ाफिले वालों के लिए यह दृश्य भी बड़ा मनोरंजक था और वे हँसते हुए निर्द्वन्द्व आगे बढ़ गए।
लेकिन अगले पड़ाव या कहना चाहिए कि ठहराव पर इन लोगों को बड़े ही मुश्किल हालात का सामना करना पड़ा। इनके लिए यह बात एक त्रासदी साबित हुई। हुआ यह कि इस मुक़ाम पर भी भीड़ ने क़ाफिले के लिए अवरोध पैदा किया। थोड़ी बहुत समझाइश की बात चली। इसके बाद मनोरंजन की सूरत बनी। अतिरिक्त पैदावार के रखवालों ने दारू की चुस्कियाँ लेते हुए इस दफ़ा नाच-गाने के साथ-साथ कुछ करतब भी देखे। सभी कुछ सामान्य और अपेक्षित ही चल रहा था कि इसी मुक़ाम पर असामान्य स्थिति पैदा हो गई। यह सब अचानक ही हुआ था।
नाच-गाना करने वालों से अलग जो करतब दिखा रहे थे, इन्हीं में वह लड़की शरीक थी। कई तरह के करतब दिखाने के बाद यौवन की दहलीज+ पर क़दम रख चुकी लड़की अब अपने स्थान पर लगातार फिरकी की तरह धूम रही थी। इस दौरान फटे कपड़ों से उसकी सांवली देह का जोबन कुछ ज्यादा ही जाहिर होने लगा। क़ाफ़िले के तमाम लोग इस स्थिति का लुत्फ उठा रहे थे। दारू की चुस्कियों ने उनका नशा भी दोबाला कर दिया था। लेकिन अधेड़ उम्र के एक व्यक्ति पर यह लड़की कुछ ऐसी सवार हुई कि दीवानावार बढ़कर उसने उसका पकड़ लिया। इसके साथ ही एकाएक भीड़ का नाच-गाना और करतब दिखाना, यहाँ तक कि हिलना-डुलना तक थम गया। भीड़ गोया फ्रीज हो कर रह गई। लेकिन क़ाफ़िले वालों की हंसी और कहकहों में इजाफ़ा हो गया।
उतरती शाम के वक्त इस जंगल में क़ाफिले वालों के हंसी ठट्टे और भीड़ का फ्रीज हो जाना विपरीत स्थितियाँ थीं। लेकिन ये हालात ज्यादा देर तक क़ायम नहीं रहे। हल्की हंफनी के साथ लड़की ने अपने लोगों की तरफ़ देखने के बाद हाथ पकड़ने वाले की तरफ़ देख कर मुस्करा दिया। लड़की की मुस्कान ने उसे उत्साहित किया और वह उसे मुख्य सड़क से दूर झाड़ियों की तरफ़ ले गया। लड़की यंत्रचालित-सी उसके साथ चली गई।
क़ाफिले वाले अभी इस सारी स्थिति की पृष्ठभूमि में कई तरह की कल्पनाएँ करते हुए आनंद उठाते कि एक हौलनाक चीखा ने वहाँ सन्नाटा बिछा दिया। भीड़ के लोग तो पहले ही ख़ामोश थे। अब क़ाफ़िले वाले भी चुप हो रहे। उनकी हँसी और क़हक़हे ग़ायब हो चले थे। इसके बाद जो मंजर उभरकर सामने आया उसे देखकर क़ाफ़िले वाले सकते में आ गये। रक्तरंजित कपड़ों के साथ लड़की दौड़ती हुई आई और अपनों में शामिल हो गई। इसके बाद वह अधेड़ लड़खड़ाता-सा झाड़ियों के पीछे से नमूदार हुआ। वह पूरी तरह लहूलुहान था। उसके सिर से खून की धार बह रही थी। यह देख कर क़ाफ़िले वालों में से अधिकांश उस की तरफ लपके।
लहूलुहान अधेड़ को पक्की सड़क के किनारे पेड़ के नीचे लिटाने के साथ ही उसके उपचार के उपाय किये जाने लगे। लेकिन यह सब निष्फल रहा। चंद लम्हों में ही उसकी गरदन एक ओर लुढ़क गई और जिस्म बेदम हो गया।
अपने एक साथी को इस तरह बेमौत मरा देखकर क़ाफ़िले वाले चिन्तित और भयभीत हो गए। भीड़ का कोई भरोसा न था। इसीलिए वे बदले की कोई कार्रवाई करने की स्थिति में भी नहीं थे।
भीड़ ने इधर आँखों-आँखों में बातें कीं और आम सहमति से कार्रवाई शुरू कर दी। अनाज और दालों के बोरे उतारकर वे लोग दूर तक ले गए। फलों के टोकरों और दीगर सामान भी इन लोगों ने हाथ साफ़ किये। आख़िर जब अपने हिसाब से इनके पास काफ़ी कुछ हो गया तो वे वहाँ से गायब हो गए।
क़ाफ़िले वाले इधर बुत की सूरत यह सारी कार्रवाई देखते रहे। हालांकि इनके पास कई तरह के हथियार और देशी कट्टे तक थे पर अपनी जगह से इन्हें हिलने तक का यारा नहीं था। भीड़ के ग़ायब होने के काफ़ी समय बाद इन लोगों को सुध आई तो अपने साथी की लाश को लेकर वे वहाँ से फ़ौरन आगे बढ़ गए। उनके पास इस वक्त भी अतिरिक्त पैदावार का बहुत बड़ा हिस्सा था। भीड़ द्वारा बलात्‌ ली गई वस्तुएँ तो जैसे समंदर में से एक बूँद का निकाला जाना था।
बहुत दूर तक निकल आने पर एक निर्जन स्थान पर अपने मृत साथी का अंतिम संस्कार करने के बाद अतिरिक्त पैदावार के क़ाफ़िले वालों ने आगे के लिए रवाना होने से पहले कुछ ठोस निर्णय लिए। इन्हीं में एक अहम फैसला यह था कि भविश्य में किसी भी तरह की भीड़ की तरफ ध्यान दिये बगैर अपने लक्ष्य की ओर सीधे ही सीधे बढ़ते चले जाना है और दम उस वक्त ही लेना है जब अपने काम में फ़राग़त हासिल हो जाए।
आदमी हजार तरह की बातें सोचता है लेकिन पूरी नहीं होती जिन्हें होना होता है। विधि का विधान अपना काम करता है। क़ाफ़िले वाले हालांकि अपने फैसले पर क़ायम थे। लेकिन आगे चलकर इनके रवैये में नरमी आ गई। पहले-पहले ये लोग रास्ते में आई भीड़ को देखकर सख्त रूख़ अपना लेते या नंगे-भूखों को कुछ दे दिलाकर पीछा छुड़ाते, वहीं ये सब अपनी इच्छा से इन लोगों को कुछ न कुछ दे देते और नाच-गाने-करतब वगैरह से अपना मनोरंजन भी कर लेते। लेकिन पिछले कटु अनुभव के तौर पर अपने एक साथी को असमय ही खो देने की बात को जेहन में रखते हुए एक-एक को संयमित रहने की सख्त ताकीद थी। ऐसे समय में दारू पीने पर तो इन्होंने अपने तौर पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी थी।
चलते-चलते क़ाफ़िले वालों ने सड़क के किनारे एक मुक़ाम पर पेड़ तले एक स्त्री और पुरुष को देखा। पहली नजर में उन्हें देखकर पहचाना जा सकता था कि ये दोनों नंगे-भूखों की भीड़ से बिछुड़कर यहाँ आए हैं। दया के तौर पर कुछ फल उनकी तरफ़ फेंककर क़ाफ़िला अभी आगे बढ़ ही रहा था कि इन्हीं में से एक ने रुकने की गुहार की और ट्रक के रूकते न रूकते कूदकर पेड़ के नीचे खडे स्त्री-पुरुष की तरफ़ दौड़ पड़ा। उसने उन दोनों के चरण छुए और फिर हाथ जोड़कर सीधा खड़ा हो गया। पेड़ के नीचे खड़े फटेहाल व्यक्ति ने बढ़कर चरण छूने वाले को गले लगाया। क़ाफ़िले वालों को यह मंजर अजीब-सा लगा। लेकिन वे खामोश रहे। इन लोगों को उन तीनों का वार्तालाप तो सुनाई नहीं दिया, अलबत्ता आँखों से बहते आँसुओं को इन्होंने जरूर देखा।
देर होते देखकर इधर दो-तीन दफ़ा हॉर्न बजाए गए तो क़ाफ़िले वाला व्यक्ति दौड़ा-दौड़ा इधर आया और बूतेभर अनाज तथा फल वगैरह उन्हें देकर चरण छुए और लौटकर ट्रक में सवार हो गया।
क़ाफ़िला रवाना हुआ तो लगभग तमाम लोगों ने उधर पेड़ के नीचे खड़े फटेहाल और लाग़िर स्त्री-पुरुष को देखा। दोनों ही दयनीय और उपकृत लग रहे थे।
अपने साथ वाले से ये लोग दया के पात्र स्त्री-पुरुष से उसके रिश्ते के विषय में पूछते, लेकिन उसे अत्यन्त ही गंभीर, उदास और खामोश देख कर इस सिलसिले में किसी ने कोई सवाल नहीं किया। वे लोग अपने तौर पर ही तरह-तरह के अनुमान लगाकर रह गए।
चलते-चलते आख़िर क़ाफ़िले वालों की मंजिलें-मक़सूद आ ही गई। यह एक बहुत बड़ा मैदान था। मैदान के पार समंदर था जिस पर झुकते चले जा रहे सूरज के गोले को लपकने के लिए लहरें तैयार लग रही थीं। वहाँ एक तरफ़ बहुत बड़ा गड्डा भी था।
मैदान में लोगों का हुजूम देखने में आया। इन्हें देखकर ऐसा लग रहा था कि तमाम जगहों के नंगे-भूखों की भीड़ यहाँ जमा हो चली है। लेकिन क़ाफ़िले वाले अब निश्चिंत थे। पहली बात तो यह कि यह उनका आख़िरी पड़ाव था। दूसरे उनके हौंसले इस बात से भी बुलन्द थे कि मालिकान में से काफ़ी लोग यहाँ पहले ही मौजूद थे। इस तरह उनके लिए किसी तरह का सिर दर्द नहीं था। अतिरिक्त पैदावार के बारे में अब इस सूरत में कोई आख़िरी फैसला इन्हीं को लेना था।
वक्त कम था। सूरज गुरूब होने जा रहा था। शाम घिर रही थी। मालिकान, यानी खाये पिये लोगों को वक्त बहुत ज्यादा कीमती था। आख़िर इन लोगों ने फैसला तो ले ही लिया। इसके मुताबिक हुजूम पर बड़ी मेहरबानी की गई थी। तय यह हुआ कि वहाँ जमा हुए लोग पेट भरकर खाने के अलावा जिस क़दर चाहे अपने साथ ले जा सकते हैं। लेकिन इसके लिए भी व्यक्ति को किसी भी तरह के यातायात के साधन के इस्तेमाल की इजाजत नहीं थी।
फैसला सुनाने के बाद खाये पिये लोग अपने क़ीमती वाहनों में सवार होकर वहाँ से कूच कर गए। इसके साथ ही लोगों का हुजूम अतिरिक्त पैदावार पर टूट पड़ा। नंगे-भूखे लोग फलों पर पिल पड़े। धक्का-मुक्की करते हुए वे पेट की आग बुझाने लगे। इसके साथ ही वे अपने चिथड़े-से कपड़ों और मैली साड़ियों से अनाज की पोटलियां बांधने लगे। अफ़रा-तफ़री और हड़बड़ाहट के सबब वहाँ एक अजीब-सा मंजर पैदा हो चला था।
और जब सूरत का गोला समन्दर के क्षितिज पर टिककर आसमान में लालिमा फैलाने लगा तो तयशुदा कार्यक्रम के तहत फलों के ट्रक और लारियां गड्डे में खाली कर डालीं। इसके अलावा मैदान में पड़ी अतिरिक्त पैदावार के बेशुमार बोरों को आग दिखा दी। देखते ही देखते पैदावार जलने लगी और नंगे-भूखे लोगों में से कुछ को आग से खेलकर भी अनाज हासिल कर लेने की कोशिशों में लगे देखा गया।
क़ाफ़िले वाले जलती हुई आग और अफ़रा-तफ़री मचाए लोगों के हुजूम को पीछे छोड़कर वाहनों के साथ वहाँ से लौट पड़े।
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