Thursday, May 15, 2008

ग़ज़ल

देवमणि पाण्डेय

बसेरा हर तरफ़ है तीरगी का
कहीं दिखता नहीं चेहरा ख़ुशी का.

अभी तक ये भरम टूटा नहीं है
समंदर साथ देगा तिश्नगी का.

किसी का साथ छूटा तो ये जाना
यहां होता नहीं कोई किसी का.

वो किस उम्मीद पर ज़िंदा रहेगा
अगर हर ख़्वाब टूटे आदमी का.

न जाने कब छुड़ा ले हाथ अपना
भरोसा क्या करें हम ज़िंदगी का.

लबों से मुस्कराहट छिन गई है
ये है अंजाम अपनी सादगी का.
द्वारा - चाँद शुक्ला हदियाबादी
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