Thursday, May 8, 2008

ग़ज़ल

द्विजेंद्र द्विज

हर क़दम पर खौफ़ की सरदारियाँ रहने लगें
क़ाफ़िलों में जब कभी ग़द्दारियाँ रहने लगें

नीयतें बद और कुछ बदकारियाँ रहने लगें
सरहदों पर क्यों न गोलाबारियाँ रहने लगें

हर तरफ़ लाचारियाँ,दुशवारियाँ रहने लगें
सरपरस्ती में जहाँ मक्कारियाँ रहने लगें

हर तरफ़ ऐसे हक़ीमों की अजब—सी भीड़ है
चाहते हैं जो यहाँ बीमारियाँ रहने लगें

फिर खुराफ़त के जंगल क्यों न उग आएँ वहाँ
जेह्न में अकसर जहाँ बेकारियाँ रहने लगें

क्यों न सच आकर हलक में अटक जाए कहो
गरदनों पर जब हमेशा आरियाँ रहने लगें

उनकी बातों में है जितना झूठ सब जल जाएगा
आपकी आँखों में गर चिंगारियाँ रहने लगें

है महक मुमकिन तभी सारे ज़माने के लिए
सोच में ‘द्विज’! कुछ अगर फुलवारियाँ रहने लगें.
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1 comment:

Devi Nangrani said...

Bahut Hi nayab Ghazal. Shabdon ki bunawat aur kasawat tewaron ko bakhoobi zahir kar rahe hain