Saturday, May 10, 2008

ग़ज़ल

चाँद शुक्ला हदियाबादी
मैं जानता हूँ तुझे क्या मिला है अन बन मैं
तू मुझको ढूँढता रहता है दिल के दर्पण में

तू जा रहा है तो सुन जा सदा फकीरों की
किसी के प्यार में भटकेगा तू भी बन बन में

तुम्हे ख़बर हो के न हो यह लोग कहते हैं
तुम्ही ने आग लगाई है मेरे तन मन में

मेरे चमन में सभी रंग रूप के हैं फूल
न पूछ मुझसे क्यों कांटे हैं तेरे गुलशन में

वो मेरे हाथ लगाते ही मुझसे टूट गया
मिला था मुझको खिलौना जो मेरे बचपन में

"चाँद" जब था तो गगन रौशनी से था भरपूर
आज अँधेरा पनपता है तेरे आँगन में
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