Saturday, May 10, 2008

ग़ज़ल

नीरज गोस्वामी
घर अपना है ये जग सारा
बिन दीवारें बिन चोबारा

मन उसने ही तोडा अक्सर
जिस पर अपना सब कुछ वारा

सच का परचम थामो देखो
कैसे होती है पौ बारा

दुश्मन दिल से सच्चा हो तो
वो भी लगता हमको प्यारा

भूखा जब भी मांगे रोटी
मिलता उसको थोथा नारा

सूखी है भागा दौड़ी में
सबके जीवन की रस धारा

सुख में दुःख में आ जाता क्यों
इन आंखों से पानी खारा

दिल में चाहत हो तो 'नीरज'
दिन में दिखता चन्दा तारा

द्वारा - चाँद शुक्ला हदियाबादी www.radiosabrang.com

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