Wednesday, May 14, 2008

ग़ज़ल

देवमणि पाण्डेय

छ्म छ्म करती गाती शाम
चांद से मिलने निकली शाम.

उड़ती फिरती है फूलों में
रंग बिरंगी तितली शाम.

आंखों में सौ रंग भरे
आज की निखरी निखरी शाम.

यादों के साहिल पर आकर
पल दो पल को उतरी शाम.

ऒढ के सिंदूरी आंचल
हंसती है शर्मीली शाम.

दिन का परदा उतर गया
बड़ी अकेली लगती शाम.

अलग अलग हैं सबके ख़्वाब
सबकी अपनी अपनी शाम.
द्वारा - चाँद शुक्ला हदियाबादीwww.radiosabrang.com

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