Saturday, May 3, 2008

सौत-सम्वाद

कवि अनातोली पारपरा (रूसी भाषा –कवि)

अनुवाद अनिल जनविजय


एक लोकगीत को सुनकर

ओ झड़बेरी, ओ झड़बेरी
मैं तुझे कहूँ व्यथा मेरी

सुन मेरी बात, री झड़बेरी
आता जो तेरे पास अहेरी

वह मेरा बालम सांवरिया
न कर उससे, यारी गहरी

वह छलिया, ठग है जादूगर
करता फुसला कर रति-लहरी

न कुपित हो तू, बहना, मुझ पे
बहुत आकुल हूँ, कातर गहरी
******************************

No comments: