. जल्लाद  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद in

राशिद हुसैन
फ़िलीस्तीनी कवि
अनुवादक अनिल जनविजय
मुझे एक रस्सा दो
एक हथौड़ा
और एक लोहे का सरिया
ताकि मैं बना सकूँ फाँसी का तख़्ता

मेरे लोगों में
शेष है अभी एक समूह
उदास चेहरे लिए घूमता है जो
लज्जित करता है हमें
आओ! उनकी गरदनें कस दें

हम अपने बीच
कैसे रख सकते हैं उन्हें
जो चाटते हैं हथेली
हर उस किसी की
जिससे भी वे मिलते हैं
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This entry was posted on Tuesday, May 13, 2008 at 3:04 PM and is filed under . You can follow any responses to this entry through the comments feed .

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