Tuesday, May 20, 2008

हमारे समय में ‘नचिकेता का साहस'

दिनेश श्रीनेत
साहित्य में साक्षात्कार की परंपरा को अगर हम तलाशना शुरू करें तो इसका आरंभ प्राचीनकाल से ही दिखाई देने लगता है। साक्षात्कार अपने प्राचीनतम रूप में दो लोगों के बीच संवाद के रूप में देखा जा सकता है। आमतौर पर इस संवाद का इस्तेमाल ज्ञान मीमांसा के लिए होता था। प्राचीन ग्रीक दर्शन से लेकर भारतीय पौराणिक साहित्य तक में इसे देखा जा सकता है। प्राचीनकाल में इस तरह के संवाद के कई रूप आज भी मौजूद हैं। प्लेटो की एक पूरी किताब ही सुकरात से किए गए सवालों पर आधारित है। इसी तरह से ‘कठोपनिषद्' में यम-नचिकेता के संवाद में जीवन-मृत्यु से संबंधित कई प्रश्नों को टटोला गया है, जहां नचिकेता पूछता है, ‘हे यमराज! एक सीमा दो, एक नियम दो - इस अराजक अंधकार को। अवसर दो कि पूछ सकूं साक्षातकाल से, क्या है जीवन? क्या है मृत्यु? क्या है अमरत्व?' भारत में पंचतंत्रभी प्रश्नोत्तर शैली का इस्तेमाल करते हुए कथा को आगे बढ़ाता है। यहां हर कहानी एक प्रश्न को जन्म देती है और हर प्रश्न के जवाब में ही एक दूसरी कहानी की शुरुआत होती है। यहां तक कि बाद की ‘बेताल पच्चीसी', ‘सिंहासन बत्तीसी' और ‘कथा सरित्सागर' में भी संवाद अहम्‌ है और कथा उसके माध्यम से आगे बढ़ती है। आधुनिक दार्शनिकों ने भी साक्षात्कार की विधा को एक ठोस आयाम दिया है। बर्कले जैसे दार्शनिकों की भी पूरी एक किताब साक्षात्कार शैली में है। इतिहासकार अर्नाल्ड टायनबी तथा दार्शनिक ज्यां पॉल सात्रके साक्षात्कार भी काफी लोकप्रिय रहे हैं। इन सबके अलावा भारतीय दर्शन की सबसे लोकप्रिय किताब ‘गीता' से बेहतर उदाहरण क्या हो सकता है, जहां पूरी ‘गीता' कुछ और नहीं सिर्फ कृष्ण और अर्जुन के बीच संवाद है।
प्रिंट मीडिया के विकास ने इसे एक दूसरा आयाम दिया। इसने साक्षात्कार को दुनिया की चर्चित हस्तियों को जानने-समझने, उनकी जवाबदेही तय करने और कई बार उन्हें कटघरे में खड़ा करने वाली विधा में बदल दिया। पश्चिमी देशों की कुछ पत्रिकाएं सिर्फ अपने साक्षात्कारों की बदौलत ही लोकप्रिय हैं। इसके विपरीत पश्चिम के मुकाबले भारत में अभी भी इंटरव्यू के मामले में प्रिंट मीडिया काफी पीछे दिखाई देता है। यहां प्रिंट मीडिया का शुरुआती विकास वैचारिक तथा अवधारणात्मक किस्म के आलेखों से हुआ। इसमें इंटरव्यू जैसे ‘लाइव' माध्यम की ज्यादा गुंजाइश नहीं थी। ‘दिनमान' और ‘धर्मयुग' तक में अधिक जोर वैचारिक तथा विश्लेषणात्मक लेखों का था। शायद यही वजह रही है कि साहित्यिक विधा के रूप में भी इसे अधिक गंभीरता से नहीं लिया गया और आज भी हमें जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद, निराला या महादेवी के बहुत अच्छे इंटरव्यू नहीं मिलते। यदि कभी ऐसे साक्षात्कार लिए भी गए हों तो कम से कम वे आज शोधार्थियों के लिए सुलभ नहीं हैं। संभवतः ‘रविवार' ने जब घटनाओं की सीधे रिपोर्टिंग करके पत्रकारिता के एक नए तेवर से हिन्दी के पाठकों को अवगत कराया तो साक्षात्कार की अहमियत खुद-ब-खुद सामने आ गई। इंटरव्यू ने पत्रकारिता को तेवर देने के साथ-साथ यथातथ्यता और प्रामाणिकता को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
हिंदी में साक्षात्कार की विधा का सही विकास इसके बाद से ही देखने को मिलता है। साक्षात्कार को एक सुंदर और साहित्यिक रूप पद्मा सचदेव ने दिया और व्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत किया अशोक वाजपेई ने। पद्मा सचदेव ने अपने नितांत आत्मीय स्वर में की गई बातचीत से लोगों की चिरपरिचित शख्सियत को ही एक नए रूप में सामने रखा। डोगरी में कविताएं लिखने वाली पद्मा को हिंदी में बड़ी पहचान उनके इन साक्षात्कारों की वजह से ही मिली। कृष्णा सोबती ने भी ‘हम हशमत' में कई दिलचस्प साक्षात्कार लिए - इस पुस्तक में उनके साक्षात्कार आमतौर से सिर्फ बातचीत न बनकर लेखिका की सामने वाले से उसके पूरे वातावरण के बीच एक ‘मुठभेड़' बनता था। अपने शुरुआती दौर में ‘पूर्वग्रह' ने भी साक्षात्कार विधा को काफी संजीदगी से लिया। अशोक वाजपेई ने उसमें कई महत्त्वपूर्ण साक्षात्कार प्रकाशित किए। इस साक्षात्कारों का आयोजन भी आमतौर पर ‘पूर्वग्रह' ही करता था। उन्होंने हिंदी में साक्षात्कार विधा को जकड़बंदी से निकालकर उसे साहित्यकारों के अलावा चित्रकारों, संगीतकारों तथा फिल्मकारों पर भी एकाग्र किया। उन्होंने अपने संपादन में ‘पूर्वग्रह' के साक्षात्कार की दो किताबें भी निकालीं - ‘साहित्य विनोद' और ‘कला विनोद'। यह पूर्वग्रह की शैली थी कि किसी एक रचनाकार या कलाकार का दो या तीन लोग मिलकर इंटरव्यू करते थे। बाद के दौर में ‘बहुवचन' और ‘समास' जैसी पत्रिकाओं ने भी कई महत्त्वपूर्ण इंटरव्यू प्रकाशित किए, जिनमें आशीष नंदी जैसे समाजशास्त्री, कृष्ण कुमार जैसे शिक्षाशास्त्री, ज्ञानेंद्र पांडेय जैसे इतिहासकार और मणि कौल जैसे फिल्म निर्देशक भी शामिल थे। इन दिनों साक्षात्कार को एक गंभीर रचनात्मक आयोजन में बदलने वाली एक और अहम्‌ पत्रिका ‘पहल' है। ‘उद्भावना' पत्रिका ने तो सिनेमा पर गंभीर विमर्श को भी साक्षात्कार शैली में प्रस्तुत कर दिया।
हिंदी पत्रकारिता ने साक्षात्कार की विधा को देर से पहचाना और बाद में उसमें तेजी से परिवर्तन भी कर डाले। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के असर से प्रिंट मीडिया में भी इंटरव्यू का ताप और तेवर तय हुआ। लंबे साक्षात्कारों और सोच-विचारकर किए गए सवालों की जगह छोटे इंटरव्यू और पहले से तय प्रश्न दिखने लगे। फिल्मी हस्तियों, मॉडल, खिलाड़ी तथा अन्य ग्लैमर वर्ल्ड की हस्तियों के छोटे साक्षात्कार प्रकाशित होने लगे। इनके सवाल बहुत छोटे और तात्कालिक होते हैं। यह भी दरअसल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की चलते-फिरते इंटरव्यू करने की शैली का ही एक रूप है। जहां बहुत गंभीर या ठहर कर सोचने-विचारने वाले सवालों की गुंजाइश नहीं रहती। ऐसी स्थिति में ‘आपकी फेवरेट डिश' या फिर ‘लाइफ में सबसे इंपार्टेंट' जैसे सवाल ही रह जाते हैं। यानी सवाल ऐसे हों कि सिर्फ एक लाइन में जवाब दिया जा सके। यह शैली बाद के दौर में हिंदी वालों ने खूब और बिना सोचे-समझे इस्तेमाल की और अचरज की बात नहीं कि जावेद अख्तर, गुलजार और एम.एफ. हुसैन से भी इस तरह के इंटरव्यू मिल जाएं। अधकचरे किस्म के क्षेत्रीय पत्रकारों ने कामकाज संभालने वाले डी.एम. और ‘मिस शाहजहांपुर' से भी ऐसे सवाल पूछने शुरू कर दिए। कुल मिलाकर संवाद से विमर्श को खत्म कर दिया गया।
इससे उलट इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने ‘संवाद' के साथ दिलचस्प प्रयोग किए। प्रीतीश नंदी, सिमी ग्रेवाल, प्रभु चावला, विनोद दुआ और पूजा बेदी ने इंटरव्यू की शैली को ज्यादा आक्रामक बनाया। सामने वाले को निरुत्तर कर देने की हद तक चुभते सवाल पूछे और टेलीविजन पर लाखों दर्शकों ने जानी-मानी हस्तियों को इन्हीं सवालों के सामने भावुक होते और आंसू पोंछते भी देखा। इसी दौर के कुछ बेहतरीन कार्यक्रमों में साक्षात्कार को ज्+यादा से ज्यादा अनौपचारिक बनाया गया और राजनीतिक या ग्लैमर वर्ल्ड की हस्तियों को उनके अपने माहौल के बीच रिकॉर्ड किया गया। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इस विधा के साथ ज्यादा ‘तोड़फोड़' की। विधा में की गई इस तोड़फोड़ के नतीजे कभी बहुत अच्छे होकर सामने आए तो कभी उबाऊ और कभी एकदम अर्थहीन, लेकिन कुल मिलाकर प्रिंट मीडिया के मुकाबले इसने सृजनात्मकता और उसके तेवर को कायम रखा।
दिलचस्प बात यह है कि दुनिया के स्तर पर प्रिंट मीडिया ने अपनी गंभीरता बरकरार रखी। ‘टाइम' और ‘द इकोनामिस्ट' जैसी पत्रिकाओं ने अपना कलेवर या शैली इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से आक्रांत होकर नहीं बदली। नोम चोमस्की, हैरॉल्ड पिंटर, उम्बर्तो इको और गैब्रिएल गार्सिया मारक्वेज जैसे विद्वानों तथा रचनाकारों के पास अभी भी अपनी बात रखने के लिए साक्षात्कार एक बेहतर विकल्प था। यही वजह है कि इनके बहुत अच्छे साक्षात्कार उपलब्ध हैं, जिनमें अपने वक्त की घटनाओं पर उनकी सटीक टिप्पणी तथा विश्लेषणात्मक रुख देखने को मिलता है। इसके विपरीत हम हिंदी तो दूर अपनी भारतीय भाषाओं तक में महाश्वेता देवी, अरुंधति राय, अमिताव घोष या नामवर सिंह के लंबे और गंभीर इंटरव्यू नहीं पाते। लिखे हुए शब्दों का विचार से यह ‘पलायन' अपने-आप में किसी समाजशास्त्रीय विमर्श का दिलचस्प विषय है।
हमेशा से माध्यमों में आए बदलावों से विधागत परिवर्तन हुए हैं और कई बार ‘विधाओं' ने अपनी मौलिकता को बरकरार रखते हुए माध्यमों का आंतरिक ताना-बाना बदला है। इस लिहाज से इंटरनेट की साक्षात्कार विधा में एक अलग भूमिका उभरकर सामने आ रही है। इंटरनेट इस दौर में तेजी से विचारों के ‘दस्तावेजीकरण' तथा उनकी ‘उपलब्धता' सुनिश्चित करने का माध्यम बना है, बेवसाइटों को खंगालें तो लगभग सभी अहम्‌ विचारकों के साक्षात्कार मिल जायेंगे। यहां आमतौर पर बड़े और लंबे इंटरव्यू ही उपलब्ध हैं। इतना ही नहीं इनमें से बहुत से साक्षात्कारों के वीडियो तथा ऑडियो फारमेट भी उपलब्ध हैं, जिन्हें उसी रूप में देखा या सुना जा सकता है। एडवर्ड सईद, नोम चोमस्की तथा ऐजाज अहमद जैसे विद्वानों के कई महत्त्वपूर्ण इंटरव्यू तथा पूरी-पूरी किताबें इंटरनेट की साइटों पर मौजूद हैं। यह उदाहरण हमें यह भी बताता है कि ‘विचार' किस तरह से माध्यमों में अपना दखल बनाते हैं। समय बदला है मगर अपने ‘समय से संवाद' लगातार जारी है। ‘कठोपनिषद्' में नचिकेता के सवालों के जवाब में यमराज कहते हैं, ‘हे नचिकेता, तूने साहस किया है! बहुत बड़ा साहस! तूने साक्षात्‌ मृत्यु से प्रश्न किया है और वह भी उसी के साम्राज्य में प्रवेश करके। स्वागत है तुम्हारे इस साहस का!' साक्षात्कार अपने सर्वाधिक सार्थक रूप में इसी ‘साहस' से जन्म लेता है। नचिकेता की प्रश्नाकुलता अब ‘साइबर स्पेस' में तैर रही है।


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