Tuesday, May 13, 2008

ग़ज़ल

देवमणि पाण्डेय

सावन आया धूल उड़ाता रिमझिम की सौग़ात कहां
ये धरती अब तक प्यासी है पहले सी बरसात कहां.


मौसम ने अगवानी की तो मुस्काए कुछ फूल मगर
मन में धूम मचाने वाली ख़ुशबू की बारात कहां.


खोल के खिड़की दरवाज़ों को रोशन कर लो घर आंगन
चांद सितारे लेकर यारो फिर आएगी रात कहां.


भूल गये हम हीर की तानें क़िस्से लैला मजनूं के
दिल में प्यार जगाने वाले वो दिलकश नग़्मात कहां.


इक चेहरे का अक्स सभी में ढूंढ रहा हूं बरसों से
लाखों चेहरे देखे लेकिन उस चेहरे सी बात कहां.


ख़्वाबों की तस्वीरों में अब आओ भर लें रंग नया

चांद, समंदर, कश्ती, हमतुम,ये जलवे इक साथ कहां.

ना पहले से तौर तरीके ना पहले जैसे आदाब

अपने दौर के इन बच्चौं में पहले जैसी बात कहां.
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द्वारा - चाँद शुक्ला हदियाबादीwww.radiosabrang.com

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