Sunday, May 11, 2008

ग़ज़ल

नीरज गोस्वामी
इंसानियत के वाक़ये दुशवार हो गये
ज़ज्बात ही दिल से जुदा सरकार हो गए
कब तक रखेंगे हम भला इनको सहेज कर
रिश्ते हमारे शाम का अखबार हो गये
हमने किये जो काम उन्हें फ़र्ज़ कह दिया
तुमने किये तो यार वो उपकार हो गये
कांटे मिलें या फूल हमें पथ में क्या पता
जब साथ चलने को कहा तैय्यार हो गए
ढूँढा जिसे था वो कहीं हमको नहीं मिला
आँखे करी जो बंद तो दीदार हो गये
रोंदा जिसे भी दिल किया जब थे गुरूर में
बदला समय तो देखिये लाचार हो गये
कल तक लुटाते जान थे हम जिस उसूल पर
लगने लगा है आज वो बेकार हो गये
नीरज करी जो प्यार की बातें कभी कहीं
सोचा सभी ने हाय हम बीमार हो गये
द्वारा - चाँद शुक्ला हदियाबादी
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