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ग़ज़ल

सतपाल ख्याल

इतने टुकड़ों में बंट गया हूं मैं
मैं खुद का कितना हूं सोचता हूं मैं.

ये हुनर आते आते आया है
अब तो ग़ज़लों में ढल रहा हूं मैं.

हो असर या न हो किसे परवाह
काम सजदा मेरा दुआ हूं मैं.

कैसे बाजार में गुजर होगी
बस यही सोचकर बिका हूं मैं

Comments

सतपाल said…
firoz ji,
bahut shukria naacheez ko blog par samman dene ka.
Thanks
satpal khyaal.
Rajeev Bharol said…
बहुत सुंदर ग़ज़ल!

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