Friday, May 23, 2008

ग़ज़ल

सतपाल ख्याल

इतने टुकड़ों में बंट गया हूं मैं
मैं खुद का कितना हूं सोचता हूं मैं.

ये हुनर आते आते आया है
अब तो ग़ज़लों में ढल रहा हूं मैं.

हो असर या न हो किसे परवाह
काम सजदा मेरा दुआ हूं मैं.

कैसे बाजार में गुजर होगी
बस यही सोचकर बिका हूं मैं

2 comments:

सतपाल said...

firoz ji,
bahut shukria naacheez ko blog par samman dene ka.
Thanks
satpal khyaal.

Rajeev Bharol said...

बहुत सुंदर ग़ज़ल!