Sunday, May 25, 2008

साक्षात्कार की भूमिका

डॉ० मेराज अहमद
बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में सूचना-क्रान्ति ने जनसंचार के क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन उपस्थित किया है। समाज में संचार माध्यम के स्वरूप और महत्त्व की जैसी वैविध्यपूर्ण और प्रभावशाली समाज में भूमिका वर्तमान सन्दर्भों में दिखायी देती है वह कभी-कभी आश्चर्य चकित-सा करने लगती है। यद्यपि संचार माध्यमों की उपस्थिति, प्रयोग और उपयोगिता अत्यन्त प्राचीन है। सदियों से संचार माध्यमों की उपस्थिति भिन्न-भिन्न रूपों में और भिन्न-भिन्न समाजों में रही है, परन्तु वर्तमान में इसका जो बहुआयामी स्वरूप और शक्तिशाली प्रभाव दृष्टिगत हो रहा है, वह निश्चित रूप से अपने पूर्ववर्ती युग से अतुलनीय है।
प्राचीन सभ्यताओं में मिलने वाले भित्ति-चित्राों, शिला-खण्डों, स्तम्भों और मन्दिरों में उत्कीर्ण राजकीय घोषणाओं, नगाड़ों और तुरूही की ध्वनियों में निहित युद्ध घोष के सकेतों एवं वाकया नवीसों द्वारा हस्तलिखित खबरों के द्वारा आरम्भ संचार प्रणाली कबूतरों द्वारा संदेश प्रसारण की यात्राा करते हुए सन्‌ १४५० में जर्मनी के नगर जोहाँसवर्ग में मुद्रण कला के आरम्भ द्वारा रफ्तार पाती बेव पत्रकारिता के उस दौर में पहुँच गयी है जो आश्चर्य उत्पन्न करने के साथ-साथ स्तब्ध भी करती है।
आधुनिक संचार-संसाधनों में सूचना एवं समाचार सम्प्रेषण के जो विविध रूप या विधाएँ प्रभावशाली ढंग से उभरकर आयी हैं, उनमें ‘साक्षात्कार' का उपयोग प्रिंट और इलैक्ट्रॉनिक दोनों माध्यमों में समान रूप से किया जा रहा है। साक्षात्कार कदाचित सूचना एवं समाचार प्रेषण का सबसे प्रामाणिक रूप है। इसका सम्बन्ध सीधे मूल स्रोत से होता है, इसलिए इसकी प्रामाणिकता लगभग असंदिग्ध होती है।
साक्षात्कार शब्द अंग्रेजी भाषा के शब्द ‘इन्टरव्यू' के पर्याय के रूप में ग्रहण किया गया है। ‘हिन्दी विश्वकोश' के भाग २३ में इसका अर्थ भेंट, मुलाकात मिलन१ दिया गया।
विशिष्ट सन्दर्भों में इसका अर्थ भीतर झाँकना या देखना है। वास्तव में साक्षात्कार सत्य के अन्वेक्षण का एक माध्यम है। सत्य समाज का सत्य होता है। समाज की व्यक्तिगत अथवा सामाजिक इकाई के सत्य के गहन अन्वेषण के बाद जब समाचार प्रस्तुत किया जाता है तो, उसमें प्रमाणिकता का वह गुण स्वयं ही आ जाता है जो साक्षात्कार को जीवन्त और प्रभावशाली बनाता है।
साक्षात्कार के लिए बहुत सारे पयार्य का प्रयोग होता है। बातचीत, भेंट, भेटवार्ता, वार्ता, मुलाकात, आमने-सामने और गुफ्तगू इत्यादि शब्द विषय व्यक्ति समाज एवं प्रयोजन आदि की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर संचार के विविध माध्यमों में प्रयुक्त होते हैं, परन्तु इनमें दो पर्याय ही अधिक प्रचलित हैं। ‘इन्टरव्यू' और ‘साक्षात्कार' यद्यपि कुछ लोग हिन्दी में भी ‘इन्टरव्यू' शब्द का प्रयोग करते हैं, परन्तु ‘साक्षात्कार' शब्द हिन्दी भाषा की शब्दावली का है, इसलिए साहित्यिक सन्दर्भ में साक्षात्कार शब्द लगभग स्थापित हो चुका है। यही समीचीन भी है।
माध्यम की बहुलता और विषय-विस्तार के कारण साक्षात्कार को किसी निश्चित परिभाषा में आबद्ध करना आसान नहीं, इसके बावजूद साहित्य मनीषियों और मीडिया विशेषज्ञों ने अपने अनुभव और अध्ययन के आधार पर इसे परिभाषित करने का प्रयास किया है। प्रो० रमेश चन्द्र जैन की पुस्तक ‘प्रिन्ट मीडिया लेखन' में उद्धृत कतिपय परिभाषाएं द्रष्टव्य हैं-२
‘‘इन्टरव्यू से अभिप्राय उस रचना से है, जिसमें लेखक व्यक्ति विशेष से साक्षात्कार करने के बाद प्रायः किसी निश्चित प्रश्नमाला के आधार पर उसके व्यक्तित्व और कृतित्व के सम्बन्ध में प्रामाणिक जानकारी प्राप्त करता है और फिर अपने मन पर पड़े प्रभाव को लिपिबद्ध करता है।'' डॉ० नगेन्द्र
‘‘साक्षात्कार में किसी व्यक्ति से मिलकर किसी विशेष दृष्टि से प्रश्न पूछे जाते हैं।'' डॉ० सत्येन्द्र
‘‘साक्षात्कार में दो व्यक्तियों की रगड़ व टकराहट हो तभी सर्वोत्तम रहता है। प्रश्नकर्ता का निर्जीव व खुशामदी होना अथवा उत्तरदाता का अहंकारी एवं स्वागोपी होना घातक होता है। दोनों व्यक्तियों में अन्तर्व्यथा हो तो दोनों संभोग-सा रस पाते है।'' वीरेन्द्र कुमार गुप्त
उक्त परिभाषाएँ स्पष्ट रूप से साक्षात्कार का स्वरूप निर्दिष्ट करने में सक्षम नहीं हैं। एक में इसके तकनीकी पहलू को अनदेखा किया गया है, दूसरी परिभाषा में दृष्टि सीमित है। अन्य में साक्षात्कारकर्ता और दाता के गुणों के प्रभाव पर विचार किया गया है।
प्रो० रमेश जैन की पुस्तक में ही अर्थाधारित परिभाषाएँ भी प्रस्तुत की गयी है। देखिए-
‘‘श्याम सुन्दरदास द्वारा सम्पादित ‘हिन्दी शब्द सागर' में इन्टरव्यू का अर्थ व्यक्तियों का आपस में मिलना, एक दूसरे का मिलाप, भेंट, मुलाकात, साक्षात, वार्तालाप आपस में विचारों का आदान-प्रदान कहा गया है।''
‘‘मानक हिन्दी अंग्रेज+ी कोश'' में ‘इंटरव्यू' शब्द का अर्थ कुछ इस प्रकार स्पष्ट किया गया है - ‘विचार विनिमय के उद्देश्य से प्रत्यक्ष दर्शन या मिलन, समाचार पत्रके संवाददाता और किसी ऐसे व्यक्ति से भेंट या मुलाकात जिसमें वह वक्तव्य प्राप्त करने के लिए मिलता है। इसमें प्रत्यक्ष लाभ, अभिमुख-संवाद किसी से उसके वक्तव्यों को प्रकाशित करने के विचार से मिला जाता है।'
‘‘प्रमुख कोशकार डॉ० रघुवीर इंटरव्यू के सन्दर्भ में लिखते हैं कि इसका तात्पर्य समक्षकार, समक्ष भेंट, वार्तालाप आपस में मिलना है।''
‘‘आक्सफोर्ड डिक्शनरी (लंदन)'' में किसी बिन्दु विशेष को औपचारिक विचार-विनिमय हेतु प्रत्यक्ष भेंट करने, परस्पर मिलने या विमर्श करने किसी समाचार पत्रप्रतिनिधि द्वारा प्रकाशन हेतु वक्तव्य लेने के लिए किसी से भेंट करके को साक्षात्कार कहा गया है।
अर्थपरक प्रस्तुत अभिव्यक्तियाँ भी वैविध्यपूर्ण हैं, कहीं ध्येय मात्रअर्थाभिव्यक्ति है तो कहीं लक्ष्य का संकेत है। यद्यपि स्वरूप भी निर्दिष्ट हुआ है परन्तु इन समस्त परिभाषाओं और अर्थों से साक्षात्कार का एक निश्चित पारिभाषित स्वरूप उभरकर नहीं आता है।
उपर्युक्त तथ्यों के प्रकाश में कहा जा सकता है कि साक्षात्कार आमने-सामने होकर विचार विनिमय का उद्देश्यपूर्ण साधन है। उद्देश्य का सम्बन्ध बहु आयामी है। इसे रेखांकित अथवा चिन्हित करना विशेष रूप से संचार माध्यम के साक्षात्कार के उपयोग से तो बड़ा दुष्कर है। यही स्थिति साहित्य से जुड़े व्यक्ति के साक्षात्कार के सम्बन्ध में भी सामने आती है।
‘साक्षात्कार' शब्द के विधात्मक स्वरूप के सन्दर्भ में ‘हिन्दी साहित्य का वृहत इतिहास', चतुर्दश भाग में रेखांकित इसकी व्याख्या बड़ी अहम्‌ है। यथा, ‘‘इस शब्द से ऐसी विशिष्ट कोटि की साहित्यिक विधा का बोध होता, जिसमें एक जिज्ञासु व्यक्ति जीवन के किसी क्षेत्र में विद्यमान किसी विशिष्ट व्यक्ति से मिलकर उसके विषय में सीधी जानकारी प्राप्त करता है।''३ लेकिन संचार माध्यम की बढ़ती संख्या और सूचना तकनीकि दिन पर दिन होती उन्नति ने साक्षात्कार सम्बन्धी स्थापित प्राचीन मापदण्डों को बदल दिया है। समाचार प्रेषण की दृष्टि से अब कभी-कभी अति साधारण विशिष्ट की श्रेणी में आ जाते हैं। व्यक्ति के बजाय घटनाएँ महत्त्वपूर्ण होकर विशिष्टता को निर्धारित करती हैं। इस तरह व्यक्ति की विशिष्टता के मायने बदल गये हैं। तकनीकि पहलू का दखल और उसके विस्तार के कारण साक्षात्कार के लिए साक्षात्कारकर्ता और दाता को आमने-सामने रहने की बाध्यता समाप्त हो गयी है।
पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति में व्यक्ति स्वातंत्रय को प्राप्त हुई महत्ता के समानान्तर ‘साक्षात्कार' विधा का उद्भव उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में पश्चिमी देशों में हुआ। साहित्य की अन्य आधुनिक विधाओं की भाँति साक्षात्कार विधा भी हिन्दी-भाषा साहित्य में पाश्चात्य सभ्यता और साहित्य के प्रभाव स्वरूप आयी। इसको प्रतिष्ठा स्वतंत्राता के बाद ही प्राप्त हुई, यद्यपि आरम्भ के सन्दर्भ में पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी द्वारा ‘विशाल भारत' में सन्‌ १९३१ में प्रस्तुत ‘रत्नाकर जी से बातचीत' शीर्षक से माना जाता है। पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी द्वारा किया गया दूसरा साक्षात्कार सन्‌ १९३२ में प्रकाशित हुआ इसका शीर्षक था, ‘प्रेमचन्द जी के साथ दो दिन।४
हिन्दी भाषा साहित्य में साक्षात्कार को विधा के रूप में स्थापित करने में पत्रा-पत्रिकाओं की बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है, यद्यपि कई एक साक्षात्कार पुस्तकाकार रूप में भी उपलब्ध हैं। साक्षात्कार सम्बन्धी अधिकांश पुस्तकें साक्षात्कारों का संकलन हैं। इसमें कुछ अलग-अलग व्यक्तियों के अलग-अलग लोगों द्वारा लिए गये साक्षात्कारों पर आधारित हैं, तो कुछ अलग-अलग लोगों द्वारा एक ही व्यक्ति के साक्षात्कारों पर आधारित संकलन हैं। कतिपय संकलन में एक व्यक्ति द्वारा अलग-अलग लोगों के साक्षात्कार प्रस्तुत किए गये हैं। कुछ एक पुस्तकें एक व्यक्ति द्वारा एक ही व्यक्ति के साक्षात्कार की वृहत प्रस्तुति के रूप में भी मिलती हैं।
साक्षात्कार की भूमिका प्रस्तुत करते समय साहित्यिक विधा के रूप में साक्षात्कार के अन्तर्सम्बन्धों का विवेचन विश्लेषण भी आवश्यक है। आधुनिक हिन्दी साहित्य में नाटक, उपन्यास, कहानी, निबन्ध जैसी व्यापक धरातल पर प्रतिष्ठित विधाओं के साथ-साथ संस्मरण, रेखाचित्रा, जीवनी और आत्मकथा, साक्षात्कार, फीचर, रिपोर्ताज और कोलाज इत्यादि अन्य विधाओं का भी समय-समय पर प्रवेश हुआ। इसमें संस्मरण, रेखाचित्रा, जीवनी और आत्मकथा ने अपनी विशिष्ट स्थिति बना ली, जबकि फीचर, रिपोर्ताज कोलाज की पैठ बहुत प्रभावशाली ढंग से नहीं बन पायी। इन विधाओं की महत्ता समाचार और सूचना के सन्दर्भ में ही अधिक प्रभावशाली प्रतीत होती है। साक्षात्कार की स्थिति दोनों वर्ग की विधाओं से भिन्न हैं। अपने जन्मकाल से वर्तमान तक संख्या की दृष्टि से इसकी स्थिति दूसरे वर्ग की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली है और क्षेत्र विस्तार भी तीव्र है। बड़े प्रकाशन समूह इस पर यथेष्ट ध्यान दे रहे हैं और इधर काफी संकलन आ रहे हैं। छोटी-बड़ी, सभी साहित्यिक पत्रिकाओं में लगभग नियमित रूप से साक्षात्कार प्रकाशित किये जाते हैं। गौरतलब यह भी है कि सूचना सम्प्रेषण की दृष्टि से सक्रिय न केवल प्रिन्ट माध्यम बल्कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम में भी साक्षात्कार का एक प्रमुख औज+ार के रूप में अत्याधिक मात्राा में प्रयोग किया जा रहा है इसलिए साक्षात्कार को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। प्रश्न अभी कदाचित अनुत्तरित ही है कि साक्षात्कार की मुख्य भूमिका को किस रूप में देखा जाय? साहित्य की स्वतंत्रविधा के रूप में अथवा समाचार प्रेषण के माध्यम के रूप में सूचना देने के लिए संचार की विशिष्ट संरचना के तौर पर?
वस्तुतः इस संदर्भ में सर्वप्रथम साहित्य और समाचार के अन्तर को देखना होगा। यद्यपि विज्ञान विषय की भाँति मानविकी से सम्बन्धित विषय को परिभाषित करना और सीमाबद्ध रूप से व्याख्यायित करना मुश्किल काम है, दरअसल यही तो इसका महत्त्वपूर्ण गुण है, फिर भी समाचार के समानान्तर रखकर खींच-तानकर कहा जा सकता है कि साहित्य का सम्बन्ध समझ से होता है, जबकि समाचार का ज्ञान से। बड़ी अहम्‌ बात यह है कि साहित्य का प्रभाव स्थायी होता है। समाचार का तात्कालिक। जब तक समाचार केवल प्रिन्ट मीडिया का प्रस्तुतीकरण था तब तक स्थायित्व की दृष्टि से उसकी स्थिति फिर भी बेहतर थी, परन्तु इलेक्ट्रॉनिक माध्यम ने इसे उत्तेजना और ‘सनसनी' फैलाने के कारक के रूप में तब्दील कर दिया है। यह सच्चायी सर्व विदित है।
स्पष्ट है कि जब साक्षात्कार समाचार सूचना प्रेषण की भूमिका में होता है तो साहित्यक विधा के रूप में उसकी गणना नहीं की जा सकती है, परन्तु सूचना और सम्प्रेषण के दूसरी संरचना की अपेक्षा इसका व्यापक फलक विशुद्ध सूचना प्रेषण का माध्यम होने से बचाता है। यही व्यापकता इसे साहित्य की विधा के निकट ला देती है। बातचीत में नाटकीयता निहित होती है। जब साक्षात्कारकर्ता साक्षात्कार के स्थान, वातावरण और उसकी बाह्यकृति का वर्णन करता है तो यह निबन्धात्मक हो जाता है। साक्षात्कारदाता के व्यक्तित्व का वर्णन और साक्षात्कार के समय की साक्षात्कर्ता की अनुभूमि के आधार पर उसका चित्राांकन साक्षात्कार में रेखाचित्रका रंग भर देता है। साक्षात्कारदाता जब नेस्टॉल्जिक होकर अपने अतीत में पहुँच जाता है, ऐसे क्षणों में उसकी स्वीकारोक्तियाँ और उद्गार संस्मरण का आभास कराते हैं। अपने बारे में साक्षात्कारदाता का दिया बयान साक्षात्कार को आत्मकथा और जीवनी के तत्त्वों के निकट ले जाता है। विशेष रूप से साहित्यिक व्यक्ति के साक्षात्कार में साक्षात्कारदाता एवं कर्ता दोनों तरफ से व्यक्ति कृति और कृत्य की आलोचना न हो ऐसा लगभग असंभव है।५
इधर जब से विश्वविद्यालयी स्तर पर पत्रकारिता के अध्ययन-अध्यापन का महत्त्व बढ़ा है, साथ में संचार माध्यमों का द्रुत गति से विस्तार हुआ है, साक्षात्कार के विभिन्न रूप और प्रविधि पर काफी विचार हो रहा है। ‘हिन्दी साहित्य का वृहत इतिहास' में इसके तीन भिन्न स्वरूप का उल्लेख किया गया है। पहले स्वरूप के अन्तर्गत प्रसिद्ध लेखकों के पास प्रश्नावली भेजकर उसका उत्तर लिया जाता है। जिससे साक्षात्कार लेना है उससे मिलकर बातचीत के माध्यम से उसके विचार और मान्यताएँ प्राप्त करने को दूसरे प्रकार के साक्षात्कार के रूप में रेखांकित किया गया है। काल्पनिक साक्षात्कार का उल्लेख तीसरे स्वरूप के सन्दर्भ में किया गया है।६ कमोवेश तीनों प्रकार के साक्षात्कार वर्तमान में भी अपनी उपस्थित बनाए हुए हैं, परन्तु तकनीकी विकास ने साक्षात्कार को विभिन्न रूपों के धरातल पर भी काफी हद तक प्रभावित किया है। पत्रके माध्यम से प्रश्नावली भेजकर साक्षात्कार की प्रविधि यद्यपि अभी विद्यमान है, लेकिन इसके कई और विकल्प भी सामने आये हैं। टेलीफोन के माध्यम से दूरस्थ व्यक्ति का साक्षात्कार सहजता से किया जा सकता है। इसमें रिकार्डिंग की सुविधा के कारण इसे कागज पर उतारने में भी सहजता होती है। नेट पर चैटिंग के माध्यम से लिए गये साक्षात्कार की परम्परा आरम्भ हो गयी। आमने-सामने होकर साक्षात्कार सम्पन्न करने की प्रविधि अपनी महत्ता की दृष्टि से भूत और वर्तमान दोनों में ही समान है। यही सबसे अधिक प्रचलित भी है परन्तु तकनीकी के विकास ने इसे और भी सहज बना दिया है। प्रश्नकर्ता द्वारा उत्तर कागज पर नोट करने के बजाय अब टेपरिकार्डर में रिकार्ड करके सुविधानुसार संक्षिप्त और संशोधित करके प्रस्तुत किया जाता है। इसमें साक्षात्कर्ता को तो आसानी होती ही है, साक्षात्कारदाता भी अपनी बात को नोट किये जाते समय बार-बार खड़े होने वाले व्यवधान से बच जाता है। मूवी कैमरे के सामने प्रस्तुत साक्षात्कार भी तकनीकी विकास का ही परिणाम है।
तीसरे स्वरूप में कोई विशिष्ट परिवर्तन नहीं हुआ है। दरअसल यह साक्षात्कार के व्यावहारिक स्वरूप से सम्बन्धित नहीं। इस प्रकार का साक्षात्कार वस्तुतः शैली के लिए प्रयुक्त होता है। इसे माध्यम बनाकर किसी रचनाकार को प्रेषणीय बनाया जाता है। आलोचना प्रस्तुत की जाती है। वर्तमान में कुछ एक साक्षात्कार ऐसे आये हैं जिनके माध्यम से जीवनी प्रस्तुत की गयी है। तकनीकी विषय के सन्दर्भ में विशेषज्ञों की प्रस्तुति के लिए भी इसे माध्यम के लिए प्रयोग में लाया जा रहा है। पुन्य प्रसून वाजपेयी की पुस्तक ‘ब्रेकिंग न्यूज+' और असगर वजाहत की ‘पटकथा लेखन' से सम्बन्धित एवं डॉ. भरत सिंह की रामविलास शर्मा पर आधारित ‘गोदारण' पुस्तक इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय है।
साक्षात्कार को समय-समय पर वर्गीकृत किया जाता रहा है विशेष रूप से जनसंचार एवं सूचना तकनीकी कि लिए शुरू हुए पाठ्यक्रम को आधार बनाकर लिखी जाने वाली पुस्तकों में विद्वानों ने इसे तरह-तरह से वर्गीकृत करने का प्रयास किया है। साक्षात्कार विधा के प्रमुख विद्वान विष्णु पंकज ने जन संचार माध्यमों के परिप्रेक्ष्य में साक्षात्कार के विषय, स्वरूप शैली साक्षात्कारकर्ता, बात...सम्पर्क इत्यादि को आधार बनाकर इसे वर्गीकृत किया है। ‘हिन्दी साहित्य का वृहत इतिहास' में वास्तविक और काल्पनिक साक्षात्कार कहा गया है।
साक्षात्कार की प्रविधि पर चर्चा करने से पहले आवश्यक यह कि स्पष्ट कर दिया जाय कि साक्षात्कार चाहे साहित्यिक हो या व्यावसायिक, कमोवेश एक जैसी प्रविधि ही प्रयुक्त होती है। थोड़ा-बहुत अन्तर यदि दृष्टिगत होता है तो उसका कारण उद्देश्य में अन्तर होता है।
साक्षात्कारकर्ता और साक्षात्कारदाता के मध्य परस्पर अन्तरवैयक्तिक सम्बन्ध स्थापित हो जाता है, इसलिए साक्षात्कारकर्ता का व्यक्तित्व अध्ययन बड़ा अहम्‌ होता है। जिस किसी का साक्षात्कार लेना है, तैयारी के रूप में जितना संभव हो सके दाता के व्यक्तित्व एवं उसके सृजन की जानकारी हासिल करके ही उसके सामने जाना चाहिए। साक्षात्कारकर्ता में दूरदर्शिता का गुण उत्तरदाता के मन को समझने में सहायता पहुंचाने के साथ-साथ पूरक-प्रश्न करने में भी सहायक होता है। संवेदनशीलता भी ऐसा गुण है जो साक्षात्कारकर्ता में यदि है तो साक्षात्कार की प्रक्रिया सहज हो जाती है। संवेदनशील व्यक्तित्व के कारण साक्षात्कर्ता दाता की कायिक भाषा को समझकर उसके शब्दों को सम्पूर्णता में ग्रहण करने क्षमता हो जाती है। साक्षात्कारकर्ता का साधारण व्यवहार साक्षात्कार के समय महत्त्वपूर्ण होता है। मुखाकृति तनाव रहित हो। साक्षात्कारदाता की बातों को आत्मीयता के भाव से सुनते हुए उसमें रुचि प्रदर्शित करे, बहस-मुबाहसे बचे तो निश्चित रूप से साक्षात्कर्ता को अपना लक्ष्य प्राप्त करने में आसानी होती है।
साक्षात्कार के लिए पहले से यदि प्रश्नावली तैयार कर ली जाय तो साक्षात्कार लेना सुविधाजनक हो जाता है। तिथि एवं समय का निर्धारण साक्षात्कार के लिए महत्त्वपूर्ण होता है। स्वीकृति मिल जाने के बाद भी साक्षात्कारकर्ता को चाहिए कि वह तिथि और समय सुनिश्चित कर ले साथ ही जाने से पहले टेपरिकार्ड की अच्छी तरह जाँच-परख कर ली जाय तो यान्त्रिाक अवरोध की संभावना नहीं होती है। उल्लेखनीय यह है कि कभी-कभी भावुकतावश या किसी विशिष्ट प्रसंग में साक्षात्कारदाता ऐसी बात कर सकता है, प्रत्यक्ष में जिसकी स्वीकृति में उसे हिचकिचाहट हो सकती है, ऐसी बातों को ‘ऑफ द रिकार्ड' मानकर उसे लोगों तक पहुँचाते समय साक्षात्कार में शामिल नहीं करना चाहिए। यदि उसे सार्वजनिक करने की आवश्यकता होती है तो चाहिए कि दाता की सहमति लेकर ही उसे लोगों तक पहुँचाए साक्षात्कारकर्ता को चाहिए कि वह साक्षात्कार के समय तटस्थ होकर विचार विनिमय का प्रयत्न करे। ऐसे में वह साक्षात्कर्ता मनचाही जानकारी ले सकता है।
साक्षात्कार की प्रविधि पर भी, जैसा कि पहले ही संकेत किया जा चुका है कि इधर काफी विस्तार से चर्चा की जा रही है, यहां यह भी कहना आवश्यक है कि संचार माध्यमों में समाचार एवं सूचना प्रेषण की दृष्टि से साक्षात्कार दूसरे रूपों की अपेक्षा प्रामाणिकता के लिहाज से अधिक विश्वसनीय माध्यम है, तो ऐसे में नित्य-प्रतिदिन इसमें नयी-नयी तकनीकी का प्रयोग होता ही रहता है, इस संदर्भ में होने वाले हर प्रयोग को संज्ञान में लेकर समय-समय पर उसका उल्लेख विद्वान करते भी रहते हैं। उपर्युक्त तथ्यों को ध्यान रखते हुए किसी का भी साक्षात्कार प्रस्तुत किया जा सकता है।

सन्दर्भ -
१. हिन्दी विश्वकोश, सं० श्री नगेन्द्रनाथ वसु, बी०आर० पब्लिशिंग कॉर्पोरेशन, दिल्ली, सन्‌ १९८६, पृ० ७३६
२. प्रिन्टमीडिया लेखन, प्रो. रमेश कुमार जैन, मंगलदीप पब्लिकेशन्स, जयपुर, सन्‌ २००४, पृ० ८३
३. हिन्दी साहित्य का बृहत इतिहास (त्रयोदश भाग) सं० लक्ष्मीनारायण सुधाशु, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, संवत्‌ २०२२ वि० पृ० १२९
४. वही, पृ० १२९
५. प्रिण्ट मीडिया, प्रो. रमेश जैन, पृ० ८८
६. हिन्दी साहित्य का वृहत इतिहास (त्रायोदश भाग) सं० लक्ष्मी नारायण सुधांशु, पृ० १२९

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