Tuesday, May 13, 2008

दिल के ज़ख्मों को क्या सीना

देवमणि पाण्डेय

दिल के ज़ख्मों को क्या सीना
दर्द नहीं तो फिर क्या जीना


प्यार नहीं तो बेमानी हैं
काबा , काशी और मदीना .


महलों वालों क्या समझेंगे
क्या मेहनत,क्या धूल पसीना .


मैं तो दरिया पार हुआ
बीच भंवर में रहा सफ़ीना .


दूनी हो गई दिल की क़ीमत
इसे मिला है इश्क़ नगीना .


तुम बिन तनहा है हर लम्हा

रीता रीता , साल - महीना
द्वारा - चाँद शुक्ला हदियाबादीwww.radiosabrang.com

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