Saturday, May 3, 2008

भोर

रवींद्र मोहन पाण्डेय
तुम्हारे
सांसों की महक
बसी है
अब भी
मेरी रूह में
हथेलियों पर
तम्हारे स्पशॅ
प्यार भरे छुअन की गमॉहट
है अब भी बरकरार
प्रियदर्शिनी
सद्य स्नान
तुम्हारे भीगे घुघराले बालों का गीलापन
और खुशबू आज भी
ब्रह्म मुहूतॅ बेला में
मुझे देती हैं जगा ।
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