Friday, May 2, 2008

वाजिद साँई

मेराज अहमद
उनकी मौत की कुल तफ्सील यह थी कि, भोर में तीन बजे अच्छे-भले उठे। सेहरी खायी। रोजा तो खैर पिछले कई वर्षों से पाबन्दी के साथ रखना शुरू कर दिया था, मगर इस बार उसी पाबन्दी के साथ नमाज भी पढ़ रहे थे इसलिए अजान के इन्तेजार में दोहला खाकर बैठे थे कि, पँड़िया तुरा गयी। उठे, खूँटे से बाँधते-बाँधते गिर पड़े। चक्कर आया या कुछ और हुआ? या तो उन्हें पता रहा होगा या फिर उनके खुदा को। क्यों? इसलिए कि गिरे तो फिर उठे नहीं? बेहोश। चार दिन चारपायी पर पड़े रहे। ग्लूकोज पर ग्लूकोज की बोतलें चढ़ाई जाती रहीं। डाक्टर राम अजोर से लेकर डाक्टर फुरदिल और डाक्टर तारिक की समझ में जितना आया उतना इलाज भी किया मगर उनके बदन में कोई हलचल नहीं पैदा कर पाये। अन्त में उन लोगों को कहना ही पड़ा कि ब्रेन हैमरेज हो गया है, कोमा में चले गये। बस, जब तक साँसे चल रही हैं तभी तक जिन्दा हैं! कुछ एक ने राय दी कि आगे लेकर भागा जाये। फैजाबाद या लखनऊ, मगर जानकारों का कहना था कि उम्र भी अच्छी खासी सत्तर-पचहत्तर के लपेटे में हैं। भागदौड़ का कोई खास नतीजा आने से रहा।
कहना लोगों का सही ही साबित हुआ। पाँचवें दिन ऐन सत्ताईसवीं की रात में दुनियां से चल पडे वाजिद अली शाह! यही नाम दिया था उनके बाप जुनाब सांई ने अपने इकलौते बेटे का, मगर लोग उन्हें जानते और कहते भी थे वाजिद साँई! खुदा ने क्या मौत बख्शी? एक तो रमजान मुबारक का महीना ऊपर से सत्ताईसवीं की रात! कुछ एक बुजुर्ग गाँव में जो कब्रों में पैर लटकाए मौत का इन्तेजार करने में लगे थे वह उनकी मौत से रश्क कर रहे थे। मुमकिन था कि जलन भी हो रही हो। या फिर अल्लाह के इंसाफ पर भी शायद मन में कुछ सवाल खडे हो रहे हों? इतनी मुकद्दस मौत! खुदा की खुदायी का राज खुदा ही जाने। बड़ी अजब है साहब! कइयों को तो शक था कि रोजे से भी थे या नहीं! हर समय मुँह में दोहले की सुपारी भरे पगुराते रहते। कहते कि मुँह खाली हुआ नहीं कि चक्कर आना शुरू! ऐसे में भला खाक रोजे से रहते रहे होंगे! अल्लाह और उसके घर, यानी की मस्जिद से उनका सम्बन्ध भी आमतौर से हफ्ते में एक बार का होता था। बस जुमेरात के जुमेरात के दिन, जात का फकीर होने के कारण मस्जिद की साफ-सफाई परम्परानुसार उन्हीं के परिवार की जिम्मेदारी थी। रोज-की-रोज की जाने वाली साफ-सफाई तो कब की छूट गयी थी मगर जुमे की नमाज के लिए जो तैयारी होती उसके तहत की जाने वाली साफ-सफाई उन्होंने नहीं छोड़ी। हालांकि अब इसके लिए भी लड़के बड़बड़ाते, मगर जब उन्होंने किसी बात की परवाह नहीं की तो भला इसके लिए क्यों परवाह करते? ठीक है रोज-रोज का काम नहीं सधता था तो छोड़ दिया। मगर जब तक दम है तब तक इतना तो कतान नहीं छोड़ सकता।
जुमेरात के जुमेरात कुछ एक घरों से थोड़ा-थोड़ा नाम के लिए ही सही खाना मिलता था। उसे लेना बन्दकर देने के लिए जब लड़के मना करते तो उखड़ने-पखड़ने लगते और बात जब ज्यादा बढ़ जाती तो लगते बच्चों को मोटी-मोटी गालियाँ देने और जब-तब उलझकर उनकी मरजी के खिलाफ कुछ न करने की कसमें खाते, तौबा करते, दो एक दिन के लिए जो कुछ थोड़ी बहुत घरेलू जिम्मेदारियाँ ले रखी थीं, कुछ एक काम जिम्मे थे, उन्हें भी छोड़ देते।
वैसे भी काम के नाम पर उन्होंने किया ही कब था जिन्दगी में व्यवस्थित ढंग से कोई काम, कि उनके कामों को छोड़ देने से किसी को कोई दुश्वारी होती। उनके बारे में घर से लेकर बाहर तक के लोगों की बस एक राय यही थी।
पहले बाबा ने कमाकर खिलाया फिर पालने से पाँव निकालते ही हम लोगों को दाल रोटी के जुगाड़ में लगा दिया। सबसे बड़े अब्दुल से लेकर छोटे बादुल तक उनकी पाँचों औलादों को बस यही एक दर्द था कि किसी ने जाना ही नहीं कि लड़कपन क्या होता है और जवानी कब आती है।
''बाबू! सुनो तो हराम के जनों की!'' अक्सर जब उनकी बच्चों से तू-तू, मैं-मैं होती तो राह चलते गाँव वालों को पकड़-पकड़कर माँ और अंग विशेष से जुड़ी गाली देकर एक ही तफ्सील बार-बार देते, ''अब्दुलवा है! लड़के बच्चे जवान होने वाले हैं फिर भी बीबी की गाँड़ के पीछे-पीछे लगा रहता है और कहता है जवानी देखी नहीं बुढ़ापा आ गया। सब्दुलवा! खुले साँड़ माफिक इस चमरौटी उस चमरौटी मुँह मारता फिरता है कहता है कि जिन्दगी नरक बना दी मैंने, रब्बुल मियाँ! ना काम के न काज के दुश्मन अनाज के! बगुले की तरह चिकने बने घूमते हैं। साहबजादे हक्कुल! जो मैंने आजादी न दी होती तो क्या ऐसा काम भला सीख सकते थे कि एक महीना जाकर काम करें और तीन महीना मकलॉय। बादुला तो बैल है। मेहनत मजदूरी तो करता है मगर घुड़कियाने में नम्बर वन। बाबू!'' बाबू उनके मुँह से गुस्से के बावजूद ऐसे निकलता मानो मुँह में भरी शहद से गोते लगाकर फिसलता बाहर आया हो।
''चाचा! बिल्कुल सही। आप का कहना सोलहो आने सच। सब ससुरे एक से बढ़कर एक कमीने और हरामखोर हैं। बुढौती आ गयी है न इसलिए जो चाहे कहें-सुने।'' जब कोई कह देता तो उनका कलेजा ठंडा हो जाता। अगर जानू की दुकान के आस-पास होते तो तुरन्त चाह का आडर देते दोहले का बटुआ खुल जाता। और ऐसे मौकों पर अगर चौराहे पर होते तो सौ-पचास ग्राम नमकीन भी आ जाता। लाख मना करने के बावजूद दुकान में या बाहर जहाँ होते जमीन पर उकरूँ बैठकर ही चाय पीते।
जेब में हर समय सौ-पचास का पत्ता चाहिए और यदि है तो उसमें से दस-बीस रोज खर्च। मंहगाई के इस दौर में बाल बच्चों का पेट पल जाये बस! मगर उनको बुढौती में मस्ती सूझती है। सभी बच्चे उनके खर्चों को लेकर की जाने वाली किच-किच से ऊबकर कहते।
''भैया! सबके लेहड़बटोर लड़के बच्चे हैं।'' अब्दुल ने घर के बगल में छप्पर डालकर अपनी अलग गृहस्थी बसा ली थी। जब भी काम से फुरसत में होते तो अपनी ढेरों औलादों में से दो-तीन छोटों को आगे पीछे लिए लेमनचूस, बिस्कुट या सूखी पावरोटी खिलाते कहते, ''पहले बच्चों का खर्च सध जाये फिर इनकी जबान के लिए सोचे।''
''जिभचटोंर! खुद तो खुद, बच्चों को भी बना रखा है। कहता मुझे है।'' उसका जवाब देते कहते, ''मंसूर खाँ के यहाँ रहकर कुछ डिलेवरी मिस्तिरियाना सीख गया नहीं तो क्या खाके पेट पाल लेता हरामखोर? कितना चाहा कि खाना ढंग से बनाना सीख ले मगर उसमें हेठी जो होती है। उसी की ही नहीं घर के सभी लोगों की। और! जब एक बोगचा खाना बाँधकर आता है तो ऐसे टूट पड़ते हैं जैसे मुरदार पर गिद्ध। बदुला साला तो चाहता है कि एक रोटी भी घर से बाहर न जाय। मगर साहब मुहल्ले पड़ोस का हक तो बाकायदा हदीस कुरान में बयान किया गया है।'' फिर बयान की तामील में बिना देर किए पूरे महल्ले में खाना बाँटता। अगर रोटियाँ ज्यादा होती तो चार-छः ही सही चुपके से मंसूर खाँ के यहाँ भी पहुँचवा देते।
''बस! हक-हकूक, रवायत-रवादारी इज्जत-बात न जाने क्या-क्या अकबक करते रहते हो जी घर जाय चूल्हीभार में दुनियाँ की फिक्र के अलावा कुछ और भी सूझता है?'' उनकी बड़बड़ से ऊबकर सैंयायिन भी कभी-कभार उखड़ जाती, वैसे ज्यादातर वह कम ही बोलती जब वह आपे से बाहर होते। बल्कि उनके साथ वह भी बच्चों को दो-चार गाली दे देतीं। उन दोनों लोगों की जोड़ी जुगुल जोड़ी के नाम से मशहूर थी। इतनी उम्र साथ-साथ कट जाने के बावजूद जब तक घर और आस-पास रहते साये की तरह साथ लगी रहतीं। जब वह द्वार पर चारपाई पर बैठे आते-जाते किसी गाँव वाले से दोहला खाने के लिए मान-मनुहार कर रहे होते तो वह रे! ते! के साथ लताड़ती फटकारती उसे स्नेह के रस से सरोबार करती रहतीं। वह ऐसे भव्य व्यक्तित्व की महिला थीं कि, लोग-बाग कहते अगर उनका साथ न होता तो वाजिद साईं क्या खाकर गुजार लेते जैसी बेफिक्री की जिन्दगी गुजार ली।
धीरे-धीरे बहुओं के आने के साथ-साथ जैसे-जैसे घर के अन्दर की जिम्मेदारियाँ कम होती जा रही थीं दोनों लोगों के साथ का समय बढ़ता ही जा रहा था। भैंस के लिए चाहे चारा लेने जाना हो या बेटों द्वारा बटायी पर लिए खेतों में निरायी का काम हो, दोनों एक दूसरे के आगे पीछे रहते। बाग में अधिया पर आमों की रखवाली में फजिर से मगरिब तक साथ दोनों लोग एक साथ गुजारते।
पिछली गर्मियों में कई वर्शों बाद देशी आमों के पेड़ों में बौर आये। अव्वल तो लकड़कट्टों ने अधिकतर बाग खत्म ही कर दिए थे, जो पेड़ बचे थे उनके बौरों को देखकर भी लोगों को यकीन नहीं आ रहा था कि फल आएँगे इसलिए पहले दो-एक लोगों के बाग के बचे खुचे पेड़ों की रखवाली की जगह इस बार उन्होंने दो-एक लोगों को छोड़कर सभी के पेड़ों की जिम्मेदारी ले ली। और खूब-खूब फल आये, इतने कि सूखी डालियाँ भी टिकोरों से भर गयीं। कुछ ही दिनों बाद फल की बढ़ान शुरू हुई तो कितनी डालें बोझ से अरराकर धम्म से जमीन पर आ गिरीं और कितनी डालियों को थक्का-थूनी लगाकर रोका और बच्चों से बचाया वाजिद साँईं ने। क्या मजाल कि कोई बच्चा एक ढेला फेंक दे। मटर के दानों के बराबर के टिकोरे हुए, तभी से चौबीसों घन्टे का बाग में डेरा जमा लिया। इत्तेफाक से गाँव में शादियाँ कम हुई उन गर्मियों में। वैसे अब गाँव में भी लोग शादी-ब्याह के लिए बजाय गर्मियों के, सर्दी के चढ़ते या उतरते दिनों को ही पसंद करने लगे थे इसलिए उनकी व्यस्तता कम रहती। आस-पड़ोस में कहीं गये भी तो मालकिन की ड्यूटी लगा जाते।
आमों के पकने की शुरूआत के साथ ही सभी मालिकान के पेड़ों के आमों को अलग-अलग बीन कर इकट्ठा करते। आधे मालिक के यहाँ पहुँचवाते, जो आधे बचे घर जाने चाहिए थे, उन्हें कभी भी पूरा घर नहीं भेजा। पूरे गाँव में बिना बाग-बीरों वाला शायद ही ऐसा कोई बचा हो जिसके यहाँ एकाध-दो बार आम न पहुँचाया हो। घर के बच्चों को दिन में गिरे आमों को खाते-बहाते देखकर बोलते- बिगड़ते। यहाँ तक कि जब कभी मालिकान के बच्चे अपने संगी-साथियों के साथ आकर फल तोड़ने के लिए पेड़ों पर ढेले डंडों की बारिश करना चाहते तो उन्हें भी बिना किसी वाज-खाम के लपेटे में ले लेते।
अच्छायी यह थी कि उनकी उखड़ने-बिगड़ने की आदत से सभी परिचित थे। कोई बुरा नहीं मानता था। अक्सर इसी के लिए बोली-कुबोली भी बोल देता और वह थे कि लानत-मलामत के साथ तम्बीहें देना शुरू कर देते, ''देखो बाबू साहब! राजा भैया! ठीक है, जमीन तुम्हारी पेड़ तुम्हारे, मगर फल? उसका मालिक तो अल्ला! और मैं अल्ला का बन्दा। बन्दा खुदा का गुलाम। जो उसकी मरजी वही गुलाम की मरजी। यह उसकी ही मरजी है कि सालों बाद उसने यह नेमत लौटायी है, वह भी इतनी कसरत से। मुझे उसकी जिम्मेदारी सौंपी गयी है।'' उनके स्वर में इतना आत्म विश्वास होता मानो खुद ऊपरवाले ने बाकायदा उनके पास आकर ही यह जिम्मेदारी सौंपी हो।
उन्हें अपने पुरखों से एक जिम्मेदारी और मिली थी, वह थी कब्रें खोदना। एक जमाना था कि गाँव में इधर साँस की डोर टूटी नहीं, चाहे जिसकी हो वह, उधर फकिराने के हर घर से एक-एक आदमी कुदाल और फावड़ा लेकर कब्रिस्तान में हाजिर। तब फकिराने के लोग इसे अपना फर्ज समझते थे, मगर धीरे-धीरे एक-एक करके कुछ एक घराने से तो लोगों ने बिल्कुल ही इस काम से अपना हाथ खींच लिया। लेकिन उनके पैरूख में जब तक कुदाल-फावड़ा चलाने का दम रहा, क्या मजाल कि मौत वाले घर से किसी को उनके यहाँ आना पड़ा हो, वह घर चाहे किसी हेला या धुनियाँ का रहा हो या गाँव के खाँ साहेबान का। मगर जब पैरूख ने जवाब दे दिया तो अक्सर कब्र खोदने के लिए लोगों को सोहनी करते देख उनका रोआं-रोआं कलपने लगता। खुद उन्हीं के बेटे कब्र खोदने के काम की सबसे अधिक मुखालफत करते। हक्कुल कहते, ''शहर में इस काम के दो-चार सौ रुपये भी कम हैं, मगर यहाँ क्या मिलता है? मुरदे की फटी-पुरानी कथरी-गुदरी सड़ी रजाई! वह जमाना और था जब ये चीजें नियामत थीं!''
''बच्चा! तुम लोगों को हिसाब-किताब के अलावा और भी कुछ सूझता है? पाँच-पाँच हो फिर भी नहीं अँटता। मैंने भी यही किया होता तो हो गयी होती दो-दो बेटियों की शादी सब पल गये होते। जवानी उबलती!''
रब्बुल धीरे से टुपुकता, ''मजबूरी थी तुम्हारी सबकी लँड़चटायी।''
अगर रब्बुल की बात सुन लेते तो आग बगूला हुए समझो। ''जैसे खुद हो हरामी'' गरजते ''मेरे लिए जैसे मंसूर खाँ के बाप हाजी हुजूर वैसे भुल्लन धुनियाँ। बाल बराबर का फर्क नहीं किया उनके घर की घी चभोड़ी रोटी रही हो या उनके घर की भूसी की, मैंने एक समझा। सलीम बाबू के सामने अच्छे-अच्छे बोलने से पहले हगास जाते हैं, मेरे लिए वह वैसे ही हैं जैसे ललई चमार।''
उनकी यह अकड़ सच्चायी पर आधारित थी और किसी की भी बोलती बन्द कर देने के लिए काफी थी। ख्वाह कोई कितना बड़ा हो या अदना से अदना खरी-खरी और साफ-साफ कहने में न तब हिचकिचाए जब जवान थे, न अब। उनके बड़बड़ाने और फहियाने पर चाहे जो कुछ कहे, मगर उनकी हकीकत बयानी के सभी कायल थे। जुमेरात में गाँव से खाना लेते हैं तो लेते हैं। यह रवायत है तो जरूर इसके पीछे कोई-न-कोई बेहतरी है। मस्जिद और ईदगाह की साफ-सफाई का जिम्मा हमारे खानदान में आद से है। यह ऊपरवाले की मेहरबानी है। करम है।
दुनियाँ कहाँ पहुँच गयी है? खुद गाँव में ही बिरादरी से हाफिज मास्टर हो गये। कार-व्यापार में लोग कहाँ-से-कहाँ पहुँच गये? इनकी धुन वहीं की वहीं! इनका यही रवैया रहा तो बाल-बच्चों की शादी-ब्याह में मुश्किल आयेगी। बच्चे इज्जत-बात का वास्ता देते, मगर उनके तर्कों के सामने ठहरना आसान नहीं होता था, यह बात और थी कि बुढ़ा गये या सठिया गये कहकर उन्हें दरकिनार करने की कोशिश की जाती।
वाजिद साईं बुढ़ा जरूर गए थे, मगर बुढ़ापा उन पर अभी प्रभावी नहीं हुआ था। खिचड़ी बाल-चेहरे पर छोटी-छोटी बिरल दाढ़ी। शरीर इकहरा था। उचकते हुए सीधे खडे होकर चलते थे। घर-बाहर सभी जगह कमीज लुंगी का उनका पहनावा था। एक पीढ़ी जो पैदा होने के बाद जवान हो गयी थी उनको इसी रूप में देखा था। कोई तब्दीली नहीं। उनकी तजेर् जिन्दगी भी कमोवेश वैसी-की-वैसी शुरू से अन्त तक रही। ये सच था कि उन्होंने कभी मुस्तकिल एक काम नहीं किया। हालांकि ऐसा नहीं था कि कोशिश नहीं की, जब तक गाँव में हथकरघे का चलन था, उनके यहाँ भी करघा था। छोड़-पकड़ कुछ दिन चलाया, लेकिन जैसे चलन उठा उन्होंने काम बन्द किया तो मुस्तकिल तौर से कोई काम नहीं किया, कहीं मन ही नहीं लगा।
उनका मन अगर लगा तो सिर्फ एक काम में, वह था शादी-ब्याह का खाना बनाना। कब और कैसे इस फन में माहिर हो गये किसी को क्या शायद उन्हें भी पता नहीं था। गाँव-पड़ोस में शादी-ब्याह के अवसर पर उनके रहते किसी बाहरी बावर्ची की जरूरत नहीं पड़ी। अमीर हो या गरीब हर जगह हर घर में काम-कजियाँ के समय उनकी उपस्थिति अनिवार्य थी। खाना बहुत उम्दा नहीं बनाते थे तो खराब भी नहीं बनाते थे, बस कभी-कभार बनाते समय लोग बेजा दखल देने लगते तो मीठे चावल की देग में गोश्त का मसाला और फीरनी में चीनी की जगह पिसा नमक डाल देते। उनकी इन कारगुजारियों के किस्से ज्यादा थे हकीकत कम।
कुछ एक सुलझे दिमाग वाले उनको उलवाने वालों से कहते भी कि घर की मुर्गी है न इसलिए दाल बराबर है। बाहर से बावर्ची आता तो चार लोग हाथ बाँधे आगे-पीछे जो करते सो करते ही, गाँठ से भी एक नरी सूत लगता तब पता चलता। सौ-सौ के नोट गिनने पड़ते।
जहाँ तक पैसे रुपये की बात थी, उनके लेने की कौन बात कहे सोचते भी नहीं थे। कफ्गीर-कलछे की मरम्मत खुद के पैसे से करवाते। लोग खाना जरूर देते, मगर शादी अगर लड़की की हो तो उनकी कोशिश यही होती कि कम-से-कम लें।
बीतते समय के साथ आबादी बढ़ी तो गाँव में शादी-ब्याह की तादाद में भी बढ़ोत्तरी हुई, उनका काम बढ़ा और साथ में सफाई आती गयी। हाजी हुजूर की पोती की शादी में बारातियों का खाना बनाने के लिए शहर से बावर्ची आया, मगर घरातियों का खाना उन्हीं के जिम्मे था, जिन लोगों ने दोनों लोगों के बनाए खाने को चखा, उन्हीं के खाने को बेहतर बताया। फिर क्या था? लोगों ने भरना शुरू कर दिया, ''चाचा एक गड्डी रुपया लेकर गया बाहर का बावर्ची मगर खाना! आपके बनाये खाने के आगे कुछ भी नहीं। फिर आप क्यों नहीं लेते दाम?''
ऐसी बात जब बाहरी लोग कहते तो वह दिल खोल कर हंसते कहने वाले की बात हँसी में उड़ा देते। मगर एक दिन ऐसा आया कि यही बात उनके बेटे भी करने लगे, हक्कुल कहते, ''न कोई इज्जत न बात। कजिया किसी एक के घर, उलवावैं सारे गाँव वाले! मुफ्त में बनाते हैं तो यही होगा।''
सब्दुल तो लड़ने भी खडे हो जाते, ''बिना साई-सट्टे के कहीं गये अब्बा तो हम लोगों से बुरा कोई नहीं होगा।''
''देखो तो बाबू! दिमाग फिर गया है हरामखोर का। मैं अब इस काम का रुपया लूँगा?'' वह जो भी सामने पड़ता उससे सवाल करते हुए उसी के सामने कहने वाले बेटे को चार गारी दे देते।
''अब क्या कहें इनको भैया!'' सब्दुल भी अपना दुखड़ा रोते, ''ले न तो न सही, ऊपर से गाँड़ पर बोझ और लाद देते हैं।
जात के फकीर थे ही, खाना भी बनाते थे तो गाँव में एकाध घर छोड़ जहाँ भी शादी-ब्याह का आयोजन होता उन्हें सपरिवार बुलाया जाता, मगर वह थे कि अब्दुल की शादी से लेकर दोनों लड़कियों की शादी तक में उन सभी परिवारों को सपरिवार दावतें दी जिन लोगों ने उन्हें बुलाया, भैंसे का गोश्त मोटा महीन चावल जो कुछ सपरा चला दिया इसके बावजूद पहली शादी का कर्ज दूसरी शादी तक चलता ही रहता, अब्दुल अलग हुए। हक्कुल भी कसमसाने लगे। बात जब उनकी अन्तिम औलाद बादुल के शादी की आयी तो फिर सारे बेटों ने मिलकर तै किया कि बस अब शादी में इतना बड़ा भीड़ भड़क्का नहीं करना है कि सधे न। गाँव के दूसरे कुछ लोगों ने भी बेटों की बात का समर्थन किया, मगर यह बात उनके सामने रखकर कोई भी अपनी फजीहत के लिए तैयार नहीं हुआ।
उनकी फजीहत भी अजीब होती, ''हम तो खैर गरीब हैं ही, तुम तो लगता है बाबू राजा बहुत अमीर और पैसे वाले हो गये। अमीरी-गरीबों को ही दिखाई जाती है।''
'हाँ।' भला कोई कैसे इस सच को स्वीकार कर लेता।
''हाजी हजूर! अब्दुलवा की पैदाइश में दरवाजे पर आये और घरी भर बैठे। शरबत पिया जुनाब शाह के दरवाजे। वाजिद तो हो गये फकीर! भला कहाँ साँईं और कहाँ शेख पठान और शेख मंसूरी! क्यों खायेगा कोई? मगर हमारी मरते दम तक कोशिश यही रहेगी कि मैं साँईं फकीर के साथ चाचा बाबा भी बना रहूँ।'' उनकी बातें लोगों की बोलती बन्द कर देतीं।
बादुल की शादी तो तै उन्होंने ही की मगर जैसे-जैसे दिन करीब रहा था एक-एक करके सभी बेटों ने अपने-अपने हाथ खड़े करने शुरू कर दिये। सब्दुल ने साफ-साफ कह भी दिया, अब वश की बात नहीं कि आगे भी शादी के बाद कर्ज निपटाते रहें।
दूसरे भाईयों ने भी उनकी हाँ में हाँ मिलायी। यही नहीं, बल्कि शुरूआत के लिए उन्हीं के मातहती में काम करने वाले इसाक साँईं से तेल मसाला लिखवाया। बीपत से कड़ाई के साथ कहा कि अब्बा जितने गोश्त के लिए कहें उतने ही की साई की बात उनसे बताएँ। बच्चों की योजना के मुताबिक ही सब कुछ हुआ। उन्हें सारी बातें तब पता चली जब शादी का दिन आ गया। चिड़िया तो हाथ से उड़ चुकी थी। पहली बार शादी में उतने लोग ही शामिल हुए जितने दूसरे फकीरों के यहाँ शामिल होते थे। न भीड़-भाड़ न चिल्ल-पों। कजिया बड़ी शांति के साथ निपट गयी।
इधर काम निपटा उधर रोजा आ गया। रोजा तुरन्त आ गया बड़ा अच्छा हुआ घर में सबकी एक राय थी। शादी में खुद बादुल की चिरौरी मिन्नत से बड़ी मुश्किल से बारात गये न कायदे से खाया न पीया। न उनके बाद। खामोश हो गये। ये खामोशी कब तक? यह डर सबको सता रहा था, मगर सबका डर झूठा साबित हुआ। रोजा रहते, न रहतें, रोजे में हमेशा शांत रहते। चलो! पाक परवर दिगार का रहम है। उनकी बीबी तक खुश थीं कि सब उनके जिस अकच की आशंका से भयभीत थे वह नहीं किया उन्होंने।
बीतते रोजों के साथ-साथ पूरा परिवार और मुहल्ले पड़ोस तक के लोग निश्चिन्त हो गये कि सब ठीक-ठाक है। ऐसे में भला किसी को क्या पता था कि बस यूँ ही गिर जायेंगे तो फिर कभी नहीं उठेंगे। न कोई बात न चीत, न बीमारी न अजारी, सब खुदा की मर्जी! उसकी मर्जी जो है सो है! अच्छे खासे चलते-फिरते तन्दुरूस्त थे। हाँ बुढ़ापा तो था ही। एक तरह से यह ठीक ही हुआ। कि चलते-फिरते पैरूख के साथ उठा लिया। चार दिन भी बमुश्किल बिस्तर पर रहे, बच्चों ने जितना बन पड़ा किया। अब मौत आनी थी तो आनी थी। वाजिद साँईं की भी आ गयी ऐन जिस दिन लिखी थी। पूरे गाँव और आस-पास के गाँव में जिसने सुना मौत की खबर भागा आया और मिट्टी के बाद इतनी अच्छी सीधी-साधी मौत के लिए खुदा का शुक्रिया अदा करते लौटा।
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