Sunday, May 4, 2008

बीच सागर में

कवि अनातोली पारपरा
रूसी कविता
अनुवाद अनिल जनविजय



इस तन्हाई में फकीरे
दिन बीते धीरे-धीरे
यहाँ सागर की राहों में

कभी नभ में छाते बादल
बजते ज्यूँ बजता मादल
मन हर्षित होते घटाओं के

सागर का खारा पानी
धूप से हो जाता धानी
रंग लहके पीत छटाओं के

जब याद घर की आती
मन को बेहद भरमाती
स्वर आकुल होते चाहों के

बस श्वेत-सलेटी पाखी
जब उड़ दे जाते झाँकी
मलहम लगती कुछ आहों पे
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