Tuesday, May 13, 2008

ना हंसते हैं ना रोते हैं

देवमणि पाण्डेय

ना हंसते हैं ना रोते हैं
ऐसे भी इंसां होते हैं.
वक्त बुरा दिन दिखलाए तो
अपने भी दुश्मन होते हैं.
दुख में रातें कितनी तन्हा
दिन कितने मुश्किल होते हैं.
खुद्दारी से जीने वाले
अपने बोझ को खुद ढोते हैं.
दिल की धरती है वो धरती
हम जिसमें आंसू बोते हैं.
बात बात में डरने वाले
गहरी नींद में में कम सोते हैं.
सपने हैं उन आंखों में भी

फुटपाथों पर जो सोते हैं
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द्वारा - चाँद शुक्ला हदियाबादीwww.radiosabrang.com