Friday, May 30, 2008

गजल

रचना गौड़ भारती

जज्बात और महक जो काबू में आ जाते
इंसान भी फ़रिश्तें की गिनती में आ जाते

खत्म होगई थी रोशनाई लिखते लिखते
वरना जज्बात हमारे भी कागज पे आ जाते

पहले ही क्या कम थे यहां सागर खारे
काबू कर न पाते तो आंख में आंसू आ जाते

हर जख्म भरता नहीं बिना मरहम के
कुछ शब्द ही होते जो इसके काम आ जाते

शब्द स्पर्श से बड़े हैं हम भी ये बताते
कुछ तो शब्द कहते हम और करीब आ जाते

1 comment:

seema gupta said...

पहले ही क्या कम थे यहां सागर खारे
काबू कर न पाते तो आंख में आंसू आ जाते

"very touching one"