Friday, May 16, 2008

कब ऐसा सोचा था मैंने मौसम भी छल जाएगा

देवमणि पाण्डेय

कब ऐसा सोचा था मैंने मौसम भी छल जाएगा
सावन भादों की बारिश में घर मेरा जल जाएगा

रंजो ग़म की लम्बी रातों इतना मत इतराओ तुम
निकलेगा कल सुख का सूरज अंधियारा टल जाएगा

अक्सर बातें करता था जो दुनिया में तब्दीली की
किसे ख़बर थी वो दुनिया के रंगों में ढल जाएगा

नफ़रत की पागल चिंगारी कितनों के घर फूंक चुकी
अगर न बरसा प्यार का बादल सारा शहर जल जाएगा

दुख की इस नगरी में आख़िर रैन बसेरा है सबका
आज रवाना होगा कोई और कोई कल जाएगा
द्वारा - चाँद शुक्ला हदियाबादीwww.radiosabrang.com
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