Sunday, April 12, 2009

अपेक्षित

डा. महेंद्र भटनागर
सरस अधरों पर
प्रफुल्लित कंज-सी
मुसकान हो !
या
उमंगों से भरा
मधु-गान हो !
.
मुसकान की
मधु-गान की
अभिशप्त इस युग में
कमी है !
अत्यधिक अनवधि
कमी है !
मात्र —
नीरव नील होठों पर
बड़ी गहरी परत
हिम की जमी है !
.
प्रत्येक उर में
वेदना की खड़खड़ाती है फ़सल,
आह्लाद-बीजों का नहीं अस्तित्व,
केवल
झनझनाते अंग,
मानव
चित्र-रेखा-वत्
खोजता सतरंग !

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