Monday, April 13, 2009

अनभिव्यक्त

डा. महेंद्र भटनागर


व्यक्ति —
अपनी अकल्पित हर व्यथा की
सर्व-परिचित परिधि !
.
किंचित् अनाकृत अतिक्रमण
अपने-पराये के लिए रे
अतिकथा,
अरुचिकर अतिकथा !
.
अनुभूत जीवन-वेदना
बस
बाँध रक्खो
पूर्व निर्धारित परिधि में,
व्यक्ति के परिवेश में,
अवचेतना के देश में।

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