Friday, April 10, 2009

जीवनी

डा. महेंद्र भटनागर

चित्र जो
अतीत धुन्ध में
समा गया —
उसे
पुनः-पुनः
उरेहना।
.
जो बिखर गया
जगह-जगह
व्यतीत राह पर —
उसे
विचार कर
समेटना।
.
जो समाप्त-प्राय —
बार-बार
चाह कर
उसे
सहेजना।
.
रीति-नीति
काव्य की नहीं !
.
जीवनी :
विगत प्रवाह,
जी चुके।
काव्य:
वर्तमान
वेगवान
जी रहे।

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