Thursday, December 23, 2010

हिन्दी साहित्य में उच्च षिक्षा के क्षेत्र में बढ़ते तकनीकी प्रयोग

जया सिंह

उच्चा षिक्षा तकनीक के द्वारा आज का व्यक्ति जागरूक हो चुका है। दुसरी बात यह कि बी०ए० और एम०ए० के छात्रों को ÷प्रयोजनमूलक हिन्दी' जो पूरा पेपर ही तकनीक का है, का षिक्षण दिया जा रहा है। ऐसी उच्च षिक्षा प्रहण करने के बाद व्यक्ति हिन्दी को कम्प्यूटर से दूर नहीं रख सकता है। कम्प्यूटर, इन्टरनेट, ई-मेल के द्वारा सूचना तुरन्त पहुँचती है जिससे हमें पुस्तकें मंगवाने, जानकारी लेने में सुविधा होती है। इस तकनीक के माध्यम से पठन-पाठन का कार्य सरल और जल्दी हो गया है। अब हम घर बैठे-बैठे ही पुस्तकों, पत्रिकाओं का आर्डर कर सकते हैं, पत्र-व्यवहार कर सकते हैं, पुस्तकें और पत्रिकायें पढ़ सकते हैं, नयी पुस्तकों के विशय में जानकारी ले सकते हैं। इन्टरनेट की लोकप्रियता दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। इन्टरनेट कनेक्षन धारक व्यक्ति किसी भी समय, किसी भी विशय पर तत्काल इच्छित जानकारी प्राप्त कर सकता है। छात्र, षिक्षक, वैज्ञानिक, व्यापारी, खिलाड़ी मनोरंजन इच्छुक तथा सरकारी विभाग इन्टरनेट से अपनी आवष्यकता और रूचि के अनुसार सूचनाएँ पा रहे हैं। साथ ही हिन्दी के क्षेत्र में नए सॉटवेयर बन रहे हैं तथा इन्टरनेट पर भी हिन्दी वर्तमान समय में उपलब्ध है। इस समय लगभग ३०,००० पाठक हिन्दी के साथ इन्टरनेट पर उपलब्ध हैं तथा इस क्षेत्र में काफी विकास हो रहा है। जैसे-जैसे भारत विष्व बाज्+ाार का नया पड़ाव बनता गया, इन्टरनेट पर हिन्दी की आवष्यकता को महसूस किया जाने लगा। हिन्दी के प्रमुख समाचार पत्र दैनिक जागरण, नई दुनिया, वेब इुनिया, इंडिया इंफो, अमर उजाला, नवभारत टाइम्स, मिलाप और अनेक पत्रिकाऐं व इनके संस्करण नेट पर भी उपलब्ध होते हैं।

आज कम्प्यूटर उच्च षिक्षा और मानव-जीवन के हर क्षेत्र का अपरिहार्य अंग बनता जा रही हैं। षिक्षा के क्षेत्र में, अनुसंधान के क्षेत्र में, विषाल और जटिल यंत्रों के संचालन तथा उनके रख-रखाव के क्षेत्र में, मौसम सम्बन्धी जानकारी, भूगर्भ के रहस्य जानने, अस्त्र-षस्त्रों के निर्माण और परीक्षण तथा अन्तरिक्षयानों के संचालन तथा निर्देषन, यात्राओं के आरक्षण आदि के क्षेत्रों में कम्प्यूटर का अखण्ड स्थापित हो चुका है। अब तो कम्प्यूटर ने ज्योतिशी और पण्डित का भी कार्य संभाल लिया है। वह जन्म-कुण्डली निर्माण और विवाह-सम्बन्ध कराने का भी कार्य करने लगा है। साथ ही विदेषों में रह रहे भारतीय व विदेषी लोग इन्टरनेट के माध्यम से विभिन्न पूजा - पाठों, मंत्रों व यज्ञों को सम्पन्न करा रहे हैं, जो भारतीयों के निए एक नये बाजार के रूप में सामने आ रहा है इलेक्ट्रानिक यानी ÷ई' कॉमर्स के आ जाने और ÷ई' प्रषासन के होने से पुराने डाक - तार और कॉपीराइट कानूनों, दस्तावेज और प्रमाण कानूनों , बैंकिंग कानूनों आदि में बहुत परिवर्तन हो गया है। इलेक्ट्रानिक दुनिया ने भौगोलिक रूपाकार वाली है। तेज सूचना की वजह से समाज की दषा और दिषा बदल गई है। सूचना तकनीक की क्रान्ति से एक नयी ÷जीवन दषा' बन गई है। आज समाज को यह स्वीकार करना ही पड़ेगा। इसे स्वीकार किये बिना कोई देष-समाज आगे नहीं जा सकता। चिंतन एवं कुछ न कुछ नया कर गुजरने की तमन्ना ने आजादी के ५० वर्श के बाद भी हमारे देष को कम्प्यूटर के क्षेत्र में विष्व स्तर पर मान्यता प्राप्त देषों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया है। वैष्विम जरूरतों, भूमण्डलीकरण एवं आर्थिक उदारीकरण के कारण आज कम्प्यूटर, इनटरनेट को आषा भरी नजरों से देखा जा सकता है। अब इनटरनेट पर हिन्दी का काफी विकास होता जा रहा है। दिन-प्रतिदिन के हम आंकड़े देखें तो हजारों की संख्या में इन्टरनेट का इस्तेमाल करने वाले ग्राहक बढ़ते जा रहे हैं। निष्चित तौर पर यह कहा जा सकता है, कि आने वाला समय भारत में ऐसा होगा, कि लोग इन्टरनेट पर हिन्दी के प्रयोग को बढ़ावा देंगे तथा इसी का इस्तेमाल करेंगें। इन्टरनेट पर हिन्दी का स्वरूप प्रसार पा रहा है। इन सबके बावजूद निरन्तर प्रयास की गति सुखद भविश्य का संकेत दे रही है। विष्व मानव की हिन्दी चेतना के प्रति जागरूकता व हिन्दी की अन्तर्राश्ट्रीय स्थिति को बेहतर बनाने के लिए हिन्दी का सुर, मानवीकृत रूप, लिपिगत, व्याकरणगत, उच्चारणगत, वर्तनीगत, और तकनीक स्तर पर केन्द्रित, एकीकृत करने की अति आवष्यकता है सॉटवेयर बनाने वाली कम्पनियाँ एक प्रतिमान भाशा कोड का उपयोग नहीं करती । अतः भारत जैसे देष में जहाँ १८ राजकीय भाशाएँ है, स्थानीय भाशा-कोडों का प्रतिमान तैयार करना होगाा। कम्प्यूटर से जुुड़ा कार्य ७० प्रतिषत कार्य अंग्रेजी में ही हो रहा है, जिसका नतीजा यह निकल रहा है कि धीरे-धीरे लोगों का रूझान अंग्रेजी की तरफ होता जा रहा है। लोग अंग्रेजी की तरफ खिंचते चले जा रहे हैं, जो कि इस क्षेत्र में एक बहुत बड़ी चुुनौती है। हिन्दी के लिए यह एक मुख्य समस्या है। इस समस्या को रोकना होगा, इसे रोकने व इसके समाधान हेतु इन्टरनेट चलाने वालों को हिन्दी के प्रति जागरूक करना होगा। तभी हम अपनी राश्ट्रभाशा हिन्दी के प्रति सम्मान को प्रकट कर सकते हैं। जो हम भारतीयों को एकता के सूत्र में बोंधने का कार्य कर रही है और करती रहेगी।



जय हिन्दी, जय भारत,

वन्दे मातरम्।



सन्दर्भ :-

१. सुधीष पचौरी - उत्तर आधुनिक समाज और संस्कृति - प्रथम संस्करण, २००६

२. सुधीष पचौरी - भूमण्डलीय समाज और मीडिया - प्रथम संस्करण, २००६

३. दीप्ति मिश्रा - ÷नव-निकश पत्रिका', अंक-६, दिसम्बर-२००७, पृ.सं.-३१-३३

४. डॉ० अचलानन्द जखभोला - ÷नव-निकश पत्रिका', अंक-६, दिसम्बर-२००७, पृ.सं ४०-४३





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