Tuesday, December 28, 2010

राही मासूम रजा के सम्यक् मूल्यांकन का एक सार्थक प्रयास

डॉ. शिवचन्द प्रसाद



डॉ. एम. फीरोज+ खान द्वारा सम्पादित ग्रन्थ- ÷राही मासूमः कृतित्व एवं उपलब्धियाँ' प्राख्यात आँचलिक कथाकार, साझी संस्कृति प्रबल उद्गाता, राष्ट्रवाद और अपनी माँटी के सच्चे प्रेमी राही मासूम रज+ा को हर कोण से मूल्यांकित करने का एक सार्थक और यथोचित प्रयास है जिसमें, सम्पादक काफी हद तक सफल भी रहा हैं। जहाँ अब तक समीक्षाएँ आँचलिक, आँचलिकता के घिसे-पिटे सतही मुहावरे तक ही सीमित रही हैं या श्लीलता-अश्लीलता के विवाद को ही सुलझाने में अपनी इतिश्री समझती रही हैं, वहीं यह पुस्तक राही की विश्व दृष्टि और वैचारिकता का सामना करती हुई उनके विभिन्न अन्तरंग पहलूओं को भी प्रकाश में लाती है। इस कार्य में पुस्तक में सम्पादित साक्षात्कार अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सहायक की भूमिका निभाते हैं, जिन से यह सिद्ध होता है कि राही का जीवन दुःखों का महाकाव्य और संघर्षों की वीरगाथा है। इस संदर्भ में डॉ. प्रेमकुमार के द्वारा नैयर रज+ा राही, गोपालदास नीरज, शहरयार और क़ाज+ी अब्दुल सत्तार से लिए गये साक्षातकार विशेष उल्लेखनीय है। यद्यपि जिस प्रेमकुमार पर डॉ. नामवर सिंह मुहर लगा चुके हों, उन पर अब कुछ कहना ÷छोटे मुँह बड़ी बात' होगी पर मुहर लगाने और बयान बदलने के अलावें नामवर जी किया ही क्या है? बहरहाल प्रेमकुमार के द्वारा लिए गये साक्षात्कारों में काव्यात्मक सरसता एवं कथात्मक रोचकता के दर्शन होते हैं। उनके साक्षातकार इण्टरव्यू के घिसे-पिटे ऊबाऊ सेटअप (कब लिखा? कैसे लिखा? कितनी प्रेमिकाएँ थीं? आपकी पसन्द आलू या भूर्ता) को तोड़ते हैं और पाठक को विधा-बोध से विभुक्त करते हैं। एक साथ कविता, कहानी, उपन्यास, संस्मरण और साक्षात्कार का आनन्द लेना हो तो प्रेम कुमार के साक्षात्मकार पढ़े जाने चाहिए।

प्रायः साक्षात्कार लेने वाले बन्धु जल्दबाजी में रहते हैं। वे जल्दी-जल्दी निपटने में लगे रहते है, जैसे उनके सिर पर भारी बोझ हो जिसे वे उतार फेंकना चाहते हों अथवा भीग रहे हों और टायफाइड होने का भय हो। इसके विपरीत प्रेमकुमार में काफी धैर्य और समय है और वाक् चातुरी ऐसी कि सामने वाले से सब कुछ उगलवाले और उसे पता भी न चले कि वह कहाँ से कहाँ तक कह गया। पे्रम की इसी कुशलता पर तो कुर्बान होने का मन करता है। प्रेमकुमार द्वारा विभिन्न लोगों से लिए गये साक्षातकारों के साथ विश्वनाथ द्वारा राही से की गयी बातचीत को भी शामिल कर लिया जाय तो राही की मुक्मल तस्वीर उभर कर सामने आती है ओर ऐसा प्रतीत होने लगता है कि राही को नापने के लिए अपना पैमाना बढ़ाना पड़ेगा। जहाँ नैयर रज+ा राही के मकान पर राही मासूम रज+ा और ले. कर्नल मोहम्मद खान (नैयर रज+ा के पूर्व पति) दोनों की नेम प्लेट लगी तो और अन्दर दोनों के फोटो टँगे हों, ऐसी स्थिति को दुनियाबी मनोवृत्ति के पैमाने से भला कैसे नाप सकते हैं? इसके लिए तो विराट मानसिक चेतना चाहिए जो राही जैसे लोगों के ही अन्दर हुआ करती है।

डॉ. मेराज अहमद और मोहम्मद आसिफ खान दोनों ही राही मासूम रज+ा के पड़ोसी हैं और उनके आलेखों से प्रतीत होता है कि ये लोग राही को अत्यन्त निकट से जानते हैं। राही की पारिवारिक पृष्ठभूमि और ÷गंगौली-गंगा-प्रेम' की वस्तुगत जानकारी के लिए इनके आलेख पठनीय हैं। इसी प्रकार उनके फिल्मी सफर के संदर्भ में इस संग्रह में सम्पादित सिनेमा पर सारिका में पूर्व प्रकाशित राही के ÷यथार्थ लेकिन संसार दिलीप कुमार....फिल्मकार में सामाजिक चेतना नहीं है और ÷फिल्म की भाषा; के साथ यूनुस खान तथा सिद्धेश्वर सिंह के निबन्ध उल्लेखनीय हैं।

कला के साहित्य के क्षेत्रा में अश्लीलता एक ऐसा हथियार प्रतिक्रियावादियों को मिल गया है। जिसे जब चाहे जिस पर चला दें। इसके शिकार राही मासूम रज+ा भी हुए। ÷आधा गाँव' की गालियों को लेकर बड़ा हो हल्ला मचा, नामवर जी की भी धोती ढीली पड़ गयी और जोधपुर विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से ÷आधा गाँव' का नाम स्वयं वापस लेना पड़ा। इसकी विस्तृत चर्चा इस ग्रन्थ में मूलचन्द सोनकर ने ÷राही मासूम रज+ा की अश्लीलता' आलेख में की है, जहाँ विभिन्न पक्ष-प्रतिपक्ष दृष्टिगोचर होते हैं। जहाँ रामविलास जी का मानना है कि ÷आधा गाँव साम्प्रदायिकता तो नहीं है, पर अश्लील है।' वही अब्दुल बिस्मिल्लाह और अमृतलाल नागर को राही की गालियों में स्वाभाविकता के दर्शन होते हैं। उधर इस आलेख के लेखक मूलचन्द सोनकर को लगता है कि ÷आधा गाँव' की इस पराजय में नामवर जी के व्यक्तित्व में ÷जुझारूपन का अभाव और पंगा न लेने की प्रवृत्ति है। -(पृ. ५४) इस क्रम में सम्पूर्ण भारतीय वाङ्मय के आलोक सिद्ध किया है कि वहाँ दो आख्यान-यौनावार और सुर-असुर संग्राम महत्त्वपूर्ण हैं। वहाँ के निर्लज्ज और अनावृत्त चित्राणों के आगे राही की गालियाँ शर्म से सिर भी नहीं उठा सकती और उन्हें अपने गाली कहे जाने पर ग्लानि लगेगी। प्रमाण के लिए उन्होंने वेदों, उपनिषदो, संस्कृत साहित्य आदि से पर्याप्त तथ्य भी दिये हैं, लेकिन उनके यह सब सिद्ध करने के पीछे यह कदापि नहीं है कि ÷वहाँ' ऐसा कुछ है तो ÷यहाँ' क्यों नहीं है? वे गालियों की वकालत नहीं करते हैं अपितु अब्दुल बिस्मिल्लाह के इस कथन से सहमत प्रतीत होते हैं कि ÷÷गाली शब्द में नहीं नीयत में होती हैं अगर आप किसी शब्द का प्रयोग इस नीयत से कर रहे हैं कि किसी को चोट पहुँचे तो वह गाली है, लेकिन किसी शब्द का प्रयोग सिर्फ एक्सप्रेसन के लिए करते हैं तो गाली नहीं है। शब्द गाली नहीं होते, गाली नीयत में होती है।'' (पृ. ६४) यही तथ्य ÷आधा गाँव' पर भी लागू होता है। यदि ÷गंगौली' के लोग भोजपुरी उर्दू मिश्रित भाषा और गालियों में ही वार्तालाप करते हैं तो उस स्वाभाविक अभिव्यक्ति को गाली कैसे कह सकते हैं? यदि ÷शेखर : एक जीवनी' और ÷नदी के द्वीप' एक कुशल प्रशासक बना सकते हैं- काम-कुण्ठा परोस कर तो ÷आधा गाँव' एक स्वस्थ नागरिक क्यों नहीं बना सकता? गंगौली के गालीबाजों में देश और अपनी माँटी के प्रति कितना लगाव है, यह कोई तथाकथित शिष्ट रामनामीवाल ÷आधा गाँव' के ÷गंगौली' से सीखें गंगौली और वहाँ के लोगों से नफरत और ईर्ष्या करने वाले वे ही लोग हैं जो यह कहते फिरते हैं कि- ÷एक मुसलमान होते हुए भी राही..... अर्थात् ÷हाय हुसैन हम रहे।' अर्थात् अंगूर खट्टे हैं यानी ÷खेलब न खेलाइबे खेलि बिगाडब भाव यह कि मुझे खेलने तो आता नहीं, चलो खेल बिगाड़ देता हूँ परन्तु खिसियानी बिल्ली कभी खम्भा नोच पाई है क्या? राही उस राह का पथिक है जिसका पथ काँटों भरे बीहड़ों से होकर गुजरता है। ऐसे में इन छोटे-मोटे रोड़ों की उसे क्या परवाह?

इस सम्पादित ग्रन्थ में संग्रहीत शिवकुमार मिश्र, कुरबान अली, हसन जमाल, डॉ. बाकर ज+ैदी, प्रोफेसर ज+ोहरा अफ़जल और संदीप कुमार के आलेखों के सारांश से राही की प्रमुख तीन विशेषताएँ उभरकर सामने आती है- साम्प्रदायिक सद्भाव, देश और अपनी माँटी के प्रति प्रेम और सामाजिक असमानताओं के प्रति विक्षोभ। यही कारण है कि प्रो. ज+ोहरा अफ़जल को राही साम्प्रदायिकता के विर+द्ध एक आदर्शवादी उपन्यासकार की भूमिका में नज+र आते हैं।' इसके लिए उन्होंने फुन्नन मियाँ को ÷आँधा गाँव' से उद्धृत किया है, जिनकी धारणा ÷हिन्दू-मुस्लिम' की संकीर्ण मानसिकता के सर्वथा विपरीत है- ÷÷हाँ-हाँ, त हुए बा। तू तो ऐसा हिन्दू कहि रहियो जैसे हिन्दु सब भुकाऊ है कि काट लीयन। आरे ठाकुर कुँवरपाल सिंह त हिन्दू रहे। झगुरियो हिन्दू है। ऐ भाई ओ परसरमुवा हिन्दुए न है कि जब शहर में सुन्नी लोग हरमज+दगी कीहन कि हम हज+रत अली का ताबूत नहीं उठने देंगे, काहे को कि ऊ शिया लोग और तबर्रा पढ़त हैं, त परसरमुवा ऊधम मचा दीहन कि ई ताबूत उठी और ऊ ताबूत उटठा। तेरे जिन्ना साहब हमारे ताबूत उठाये न आये।'' यह मिसाल है गंगौली के आपसी भाई-चारे की जहाँ सब को विदित है कि दंगे-फसाद पढ़े-लिखे सियासतबाजों का काम है, आम आदमी की इसमें कोई र+चि नहीं है। राही मासूम रज+ा के अनुसार- ÷÷हिन्दू नाम एक राष्ट्रीयता का है।..इस देश के वासी हिन्दू मुसलमान, सिख, ईसाई आदि न होकर मुसलमान हिन्दू, ईसाई हिन्दू, सिख हिन्दू, जैन हिन्दू आदि होने चाहिए, बखेड़े इतिहास की पुस्तकों में है।''(पृ. ९१)

गंगा, गंगौली और हिन्दुस्तान से राही को अगाध प्रेम है और उतना ही प्रेम ही देश की भाषा और संस्कृति से जिसके चलते वे उर्दू को देवनागरी लिपि में लिखे जाने की वकालत करते हैं। देश में व्याप्त सामाजिक विषमताओं के प्रति छटपटाहट राही के कथा साहित्य में देखी जा सकती है। ÷आधा गाँव', ÷टोपी शुक्ला', ÷ओस की बूँद', ÷हिम्मत जौनपुरी', ÷असंतोष के दिन', ÷कटरा बी आर्जू' और ÷दिल एक सादा कागज+' आदि किसी न किसी रूप में समाज में व्याप्त असमानताओं और जटिलताओं से टकराते नज+र आते हैं।

राही के संदर्भ में ऐसी चर्चाएँ तो पहले हुई थी और अब भी हो रही है परन्तु केवल राही ही नहीं अपितु समस्त आँचलिक कथाकारों की अतीत-ग्रस्तता पर अभी तक किसी ने भी चर्चा नहीं की है जिसे बहस का विषय बनाया जा सकता है। आखिर क्या कारण था कि गाँव और शहर का परम्परागत भारतीय सम्बन्ध तथा देशी पूँजीवाद की कुंठित दशा के कारण बीसवीं शताब्दी में जब कि दुनिया के प्रतिरोध आंदोलन भविष्य के सपनों से शक्ति पा रहे थे, भारतीय प्रतिरोध का मुख्य स्वर अतीतोन्मुखी बना रहा। यह बात कथा के क्षेत्रा में भी दिखाई देती है। जब कलाकार की कलात्मक प्रतिबद्धता का केन्द्र सामाजिक अन्तर्वस्तु से पीछे रह जाता है तो उसका स्वाभाविक अन्त अतीत जीवी होने में ही होता है। यही कारण है कि ग्रामांचल कथाकारों की लोक सम्पृक्तता अतीत ग्रस्तता का रूप ले लेती है।

इस अतीत ग्रसता के कई रूप हैं। डॉ. शिवप्रसाद सिंह को गाँव में एक ÷अवरूद्ध वर्तमान' दिखाई देता है जिसमें किसी भी तरह के भविष्य के परिस्फुटित होने की कोई उम्मीद नहीं है-÷÷यहाँ के रहते हैं जो रहना नहीं चाहते।'' (÷अलग-अलग वैतरणी') यही कारण है कि विपिन कर्त्तव्य- बोध घुटन और विक्षोम में पड़कर गाँव छोड़ देता है। इस तरह गाँव का यह अंधा वर्तमान अतीत की स्वाभाविक वकालत बन जाता है।

फणीश्वरनाथ रेणु में सामंती अतीत और वर्तमान दोनों सुरक्षित हैं। आजादी के बाद गाँवों में गुजरने वाले समय की सम्पूर्ण कहानी रेणु में मिलती है। समय के साथ भारतीय सामंतवाद ने अपने को कैसे पुनर्जीवित किया, एक नाटकीय आस्था के मोले प्रहरी ÷बावनदास अपने ही चक्के के नीचे कैसे पिस गये, स्वतः र्स्फूत प्रतिरोधों का समाज सुधारकों की उपस्थिति में ही किस प्रकार हास्यास्पद अन्त हुआ, इन सबका चित्रा रेणु के दो उपन्यासों ÷मैला आँचल' और ÷परती परिकथा' में मिलता है। दोनों उपन्यास एक ही कहानी कहते हैं। एक जहाँ समाप्त होता है, दूसरा वहीं से शुरू होता है। दोनों ही उपन्यासों में रेणु हवेली के प्रति अपनी प्रतिबद्धता में पूरी तहर जागरूक हैं। रेणु की आँखें ग्रामोद्धार के लिए पुनर्जीवित भारतीय सामंतवाद के समाजवादी प्रहरियों पर टिकी हैं। यही से रेणु के ÷÷रोमैंटिक इल्युजन' की शुर+आत होती है और इसी कारण वे यथार्थवादी परम्परा से दूर जा पड़ते हैं। सामन्ती जमीन पर खड़े होकर टॉल स्टाय और बाल्जाक ने भी समाज का सर्वेक्षण किया है लेकिन अपने वर्ग की भोगलिप्सा और पतनशीलता के प्रति उनकी जेनुइन घृणा उन्हें लेखकों की अगली कतार में ला खड़ा करती है। लेकिन रेणु सामंती शानोशौकत से अभिभूत लोक चेतना के उस हिस्से के प्रतिरूप लगते हैं जो परिवर्तन रहित भारतीय ग्राम व्यवस्था के लिए अति आतुर थे, जिनकी दृष्टि राजकुमारों की दिग्विजयों स्त्राी-विजय और राज-पाट से सम्मोहित थी।

रेणु की तरह अतीत का सम्मोहन मार्कण्डेय में भी है परन्तु वे विभाजित चेतना के कथाकार हैं। उनमें अतीत के प्रति सम्मोहन के साथ-साथ वर्तमान का भी दबाव है। वे गाँव की सीमा पर खड़े शहरी मार्क्सवादी कथाकार हैं। अपने प्रथम कहानी संग्रह ÷पान फूल' (१९५४) में दो मार्कण्डेय दिखाई देते हैं-÷गुलरा के बाबा' और ÷कहानी के लिए नारी पात्रा चाहिए' के मार्कण्डेय। दोनों एक दूसरे से भिन्न हैं। इन दोनों कहानियों की चार पंक्तियों से बात साफ हो जायेगी-

÷÷कवन है रे सरपत काट रहा है। बाबा ने आमिलहवा के नीचे खड़े होकर कंधे से लाठी उतारते हुए कहा। आवाज+ सारे गुलरा में गूंज गयी। बड़ी गम्भीर और बलुन्द आवाज+ थी वह अनजान आदमी तो एक बार डर जाय और चिरई चुरमुन भी पेड़ों से उड़ गये।'' (गुलरा के बाबा)

÷÷चाची को मेरी कहानी के स्त्राी पात्रा पसन्द नहीं। उनका कहना कहानियों में जिन स्त्राी पात्राों को मैं चित्रिात करता हूँ वे उच्छृंखल, सीना जोर और मुँह फट होती हैं। उनके प्रेम में मौन का स्थान नहीं होता। वे मुहब्बत का इज+हार करती फिरती है-(÷कहानी के लिए स्त्राी पात्रा चाहिए')

मार्कण्डेय की द्विविभाजित रचनात्मक चेतना के तत्कालीन द्वेध बिन्दुओं का प्रतिफलन हैं। वे बिन्दु हैं- प्रेमचन्द की परम्परा और नयी कहानी की आधुनिकता। अतीत ग्रस्तता मार्कण्डेय के यहाँ भी है-÷÷पहले यही घर थे कि काम करने का खेत मिलते थे आम के पेड़ मिलते थे, शादी-ब्याह पर लकड़ी, कपड़ा फाटा, गहरा मिलता था, हरजी-गरजी को अनाज-पानी मिलता था। मालिक लोग तनी-तनी बात पर मुँह जोहते थे।'' (÷हंसा जाइ अकेला')

सामन्ती अतीत की यह वकालत राही मासूम रज+ा के ÷आधा गाँव' में भी देखने को मिलती है। स्वयं राही स्वीकार करते हैं कि ÷सामन्तवादिता' उनमें है- सामन्तवाद के विघटन से वे दुःखी भी हैं साम्प्रदायिकता और अस्वाभाविक बँटवारे के खिलाफ लेखक की संवेदनात्मक स्तर पर कलात्मक प्रतिबद्धता उपन्यास में भावात्मकता का सृजन करती है लेकिन अपनी सम्पूर्ण प्रभावान्विति में एक शानदार रागात्मक अतीत की तस्वीर बन कर रह जाती है। जिसमें दोस्त अपनी दोस्ती के प्रति वफ़ादार है, रखैल और गुलाम अपने मालिक के ख्वाहिशमन्द हैं और मालिक इनकी तरफ से मुतमइन हैं। सच पूछा जाय तो इस उपन्यास का नाम ÷आधा गाँव' न रखकर ÷फ्रीडम ऑफ गंगौली' रखा जाना चाहिए। कर्नल टाड के राजपूताने के राजाओं की तरह राही ने गंगौली के सैयदों को ग्लोरीफाई किया है। उपन्यास में सबसे सशक्त फुन्नव मियाँ की हेकड़ी, अपनी माँटी से उनका लगाव और ठाकुर जयपाल सिंह के खानदान से दोस्ती निभाने के उनके पैंतरे देखते ही बनते हैं और जब ढलती उम्र में रात के अंधेरे में उनके ऊपर लाठियों से गढराना हमला होता है। तो भी ललकारते हैं-÷÷ई त बड़ी नामर्दी बा'' टोक के मार त जानें। और ÷÷हट जनखे'' कहते हुए गिर पड़ते हैं। वे अपने मौत में भी वैसे ही बहादुर रहें, जैसे जि+न्दगी में। सारा वर्णन कुछ इस तरह का है जैसे लैरी कालिन्स और डॉमनिक लैपरे में ÷आधी रात की आज+ादी' नामक पुस्तक में ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा शान्ति पूर्वक सत्ता हस्तांतरित किये जाने में भी बहादुरी और गुर+त्व के दर्शन किये हैं-÷नथिंग इन हिज लाइफ हिम दैन लिविंग इट।'

फुन्नन मियाँ, फुस्सू मियाँ, थब्बू मियाँ, सैयद अली हादी, अलीम अली, कबीर और मौलवी बेदार के मालिकाना प्यार और प्राकृतिक बलात्कार, मौरूसी इमामबाड़े और रिवाज के विघटित होने पर लेखक का मर्सियाना लहजा उसके अतीत जीवी होने का सबूत है। भूमिका में समय की कहानी का दावा करने वाले राही समय के खिलाफ सहानुभूति दे बैठते हैं। विश्लेषण के बजाय ÷थे' के नगमें से जुड़ जाते हैं- ÷÷हर जनाने कमरबन्द में कुंजियों का भारी गुच्छा था पर बक्स खाली थे। तालों की कोई जरूरत नहीं थी पर औरतें कुंजियों के गुच्छों से चिपटी हुई थीं क्योंकि वही उनके खुशहाली के सामने की यादगार हर चुके थे।

केन्द्रिय चरित्रा की कभी ÷आधा गाँव', मैला आँचल', ÷परती परिकथा', अलग-अलग बैतरणी सब में है। ऐसा नहीं है कि इनमें जीवन्त पात्राों की कमी है। फुन्नन, डॉ. प्रशान्त, जितेन्द्र, विपिन, ताजमनी, सईदा, सैफुनिया आदि में से निर्णय करना कि नायक नायिका कौन हैं, मुश्किल है। यद्यपि रात्राी ने भूमिका में समय को नायक ठहराया है-÷÷यह कहानी न धार्मिक होता है न राजनैतिक और यह कहानी समय की कहानी है। यह गंगौली से गुजरने वाले समय-समय की कहानी है।'' कथा में गिरफ्+तार समय की कहानी पात्राों और चरित्राों से अलग नहीं होती। संकट तब खड़ा होता हैं जब समीकरण उलट दिया जाता है। जब हम पात्राों द्वारा समय तक पहुँचने के बजाय समय के सहारे पात्राों तक पहुँचते लगते हैं।

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