Tuesday, December 28, 2010

नैसर्गिक भाषा में नैसर्गिक चिंतन का उद्गार है-

समीक्षक- डॉ. आजम



मेरा मानना है कि कविताओं की पुस्तकें तीन तरह के घर की तरह होती हैं, एक जिनमें प्रवेश द्वार होता है जो निष्कासन द्वार भी साबित हो जाता है, अर्थात् जाइए इधर-उधर देखिए वहीं खड़े -खड़े फिर निकल जाइए। दूसरी तरह की पुस्तक में प्रवेश द्वार से घुस जाइए कुछ आगे बढ़िए तो पता चलता है कि हर जगह बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ हैं और आप पछता कर लौटने के बजाए किस खिड़की से बाहर कूद आते हैं। मगर तीसरी पुस्तक ऐसी होती है जिसमें प्रवेश करने के बाद भले ही एक आध खिड़कियाँ भी दिखाई दें, मगर आगे बढ़ने का आकर्षण आप को आगे बढ़ाता रहता है, अन्ततः आप उस घर के अंत तक पहुँच कर बाहर निकलने के द्वार से ही अपने अंदर बहुत सी प्रशंसाएँ, अनुभूतियाँ लेकर निकलते हैं। ÷÷धूप से रूठी चाँदनी'' ऐसा ही घर है जो आप को प्रारंभ से अंत तक आकर्षण में बांधे रखने में सक्षम है।

÷÷धूप से रूठी चांँदनी'' वास्तव में नैसर्गिक भाषा में नैसर्गिक चिंतन का उद्गार है जो सच के अत्यंत समीप प्रतीत होता है। उन्होंने हर पंक्ति में भाव के पूरे के पूरे संसार को समेट दिया है। शाब्दिक चित्राण ऐसा कि हम स्वयं अपने सामने कविता को एक खाका, एक दृष्य पटल का रूप लेते देख लेते हैं और शनैः शनैः हम भी उस का एक हिस्स बन जाते हैं। सुधा जी और ÷÷धूप से रूठी चांदनी'' की लोकप्रियता अवश्य ही सरहदों को पार करती हुई जहांँ-जहाँ हिंदी आबाद है वहाँ-वहाँ अपना परचम लहराएगी।

उनकी कविताओं में जाबजा स्त्राी की पहचान एक इंसान के रूप में कराने का आग्रह और महज माँ, बहन, पत्नी की छवि में न बँधे रहने की छटपटाहट दिखती है- मैं ऐसा समाज निर्मित करूँगी/जहाँ औरत सिर्फ माँ, बेटी/बहन पत्नी, प्रेमिका ही नहीं/एक इंसान/सिर्फ इंसान हो। दूसरी जगह कहती हैं-दुनिया ने जिसे सिर्फ औरत और तूने/महज बच्चों की मांँ समझा/और तेरे समाज ने नारी को/वंश बढ़ाने का बस एक माध्यम ही समझा/पर उसे इंसान किसी ने नहीं समझा।

चिरपरिचित नारी संवेदनाओं का जब वह चित्राण करती हैं तो एक भिन्न परिवेश उजागर कर देती हैं- अश्रुओं की धार बहाती/हृदय व्यथित करती/इच्छाओं को तरंगित करती/स्मृतियाँ उनकी चली आई। हर साहित्यकार इस आभास के साथ जीता है कि जीवन एक रंगमंच है और भगवान के हाथों की हम सब कठपुतलियाँ मात्रा हैं-कराए हैं नौ रस भी अभिनीत/जीवन के नाट्य मंच पर/हँसो या रोओ/विरोध करो या हो विनीत/नाचता तो होगा ही/धागे वो जो थामे हैं।

बचपन वह अवस्था होती है जब मन में तर्क-वितर्क नहीं आते, प्रकृति की हर घटना उसके लिए सुखदायक होती है। मगर बड़ा होते ही चार किताबें पढ़ लेने के बाद वह तमाम सुखों से वंचित हो जाता है। जिस इंद्रधनुष को बचपन में रंगों से भगवान द्वार की गई चित्राकारी समझता था अब उस उसके लिए फिजिक्स की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया के अलावा कुछ नहीं रहता। वैज्ञानिक सत्य उसके लिए महज एक घटना बन कर रह जाता है ÷विज्ञान बौद्धिक विकास/और भौतिक संवाद ने/बचपन की छोटी छोटी/खुशियाँ छीन लीं/शैशव का विश्वास/परिपक्वता का अविश्वास बन जाता/अच्छा नहीं लगता है....।'

विदेश में भू्रण हत्या अधिक ही होती होंगी, कारण दूसरा होगा। हमारे देश में अधिकतर कन्या भू्रण की ही हत्या सुनने को मिलती है। यहाँ लोग पुत्रा की चाह में कन्या को मारने की साजिश कर लेते हैं। जहाँ सुधा जी रहती हैं वहाँ तो यौन स्वच्छंदता ही एक कारण प्रतीत होती हैं। मगर पूरे विश्व में ऐसा हो रहा है कारण जो भी हो। सुधा जी कहती हैं- मैं एक नन्हा सा स्पंदन हूँ/मुझ पर यह सितम क्यों/स्वयं आया नहीं/लाया गया हूँ/फिर यह जुल्म क्यों/पालने की जगह कूड़ादान दिया। आप चाहें तो इसे बनाकर पढ़ लें तो यह कविता भारत की हो जाती है। अभी-अभी गुजरात में सोलह भू्रण कूड़ेदान से प्राप्त हुए जिनमें अधिकतर कन्याएँ थीं।

अमेरिका एक मशीनी देश है जहाँ लोग मात्रा कलपुर्जे की तरह व्यवहार करते हैं। जहाँ कलपुर्जे समय-समय पर बदल दिये जाते हैं। उनमें संवेदना नहीं होती। भारत में हमें अपने बेकार हो चुके कबाड़े से भी अपनेपन का रिश्ता महसूस होता है इसलिए हम उन्हें फेंक नहीं पाते। उनमें स्मृतियाँ बसी रहती हैं। अमेरिका में दिल से उतरने पर कोई सामग्री क्या रिश्ते भी फेंक दिए जाते हैं। सुधा जी को वहाँ पहुँचते ही यह एहसास हो गया- एयरपोर्ट पर वह आए/मुस्कारए/ एक गौरी भी मुसकुराई/में चकराई/क्या तुम उसे जानते हो? वे बोले/यह देश अजनबियों को हाय/अपनों को बाय कहता है/मैं घबराई कैसे देश में आई।

स्त्राी-पुरुष के रिश्ते कहते है कि स्वर्ग में निर्धारित होते हैं। मेरे ख्+याल में जिस तरह स्वर्ग एक कल्पना है उसी तरह यह उक्ति भी कोरी कल्पना है। वरना तमाम ताम झाम के बाद बाँधे रिश्ते के धागे बार-बार और कभी हमेशा लिए पूरी तरह क्यों टूट जाते हैं। सच तो यह है कि जिसको एक आदर्श रिश्ता कहा जा सके वैसा कुछ होता ही नहीं....हांँ समझौतों के सहारे घर के अंदर-अंदर कोई रिश्ता बरसों बरस तक ढोया जा सकता है। जिसे बाहर वाले लम्बी अवधि तक कायम रहने के कारण आदर्श रिश्ता कह देते हैं। वरना तो वह दोनों इकाइयाँ ही जानती हैं जो कभी नहीं जुड़ती...। न जुड़ पाना ही मुझे तो अधिक स्वाभाविक प्रतीत होता है....खैर सुधा जी कहती है....लकीरें भी मिलीं/अहम् तुम्हारा/अकड़ी गर्दनों से अड़े रहे हम/आकाश से तुम/धरती सी मैं/क्षितिज तलाशते रहे हम। अर्थात् दो अलग अलग व्यक्तित्व फिर समता तलाशना तो निरर्थक ही है न फिर शिकवा शिकायत क्या।

माँ पवित्रा रिश्ता है आज हर शाइर, कवि इस रिश्ते को भुना रहा है। मगर कविता मेलोड्रामाई अंदाज की हो और ग्लीसरीनी आँसू कवि/कवयित्राी बहाने लगता है तो कविता अपने निम्न स्तर पर चली जाती है। लेकिन सुधा जी ने मांँ के प्रति जो अनुभूतियाँ प्रस्तुत की हैं वह इतनी सहज हैं कि दिल में उतरती प्रतीत होती हैं क्षण-क्षण, पल-पल/बच्चे में स्वयं को/स्वयं में तुमको पाती हूँ/जि+ंदगी का अर्थ/अर्थ से विस्तार/विस्तार से अनंत का सुख पाती हूँ/मेरे अंतस में दर्प के फूल खिलाती हो/माँ तुम याद बहुत आती हो।

सुधा जी ने दुनिया भर में घटित होने वाली मार्मिक घटनाओं पर भी पैनी नज+र रखी हुई है कई कविताएँ दूसरे देशों में घटित घटनाओं से उद्वेलित होकर लिखी हैं। जैसे ईराक युद्ध में नौजवानों के शहीद होने पर लिखी कविता हो या पाकिस्तान की बहुचर्चित मुख्तारन माई को समर्पित कविता, इस सत्य को उजागर करता है कि साहित्यकार वही है जो वैश्विक हालात पर न सिर्फ दृष्टि रखे, बल्कि उद्वेलित होने पर कविता के माध्यम से अपने विचार व्यक्त कर सके। इस तरह सुधा जी एक ग्लोबल अपील रखने वाली कवयित्राी हैं। धूप से रूठी चाँदनी में विविधता है, रोचकता है, जीवन के हर शेड मौजूद हैं। जमाने का हर बेढंगापन निहित है। पुरुषों का दंभ उजागर है, महिला का साहस दृष्टिगोचर है।

1 comment:

Anonymous said...

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