Friday, December 24, 2010

राष्ट्रीय एकता और आधुनिक हिन्दी ग़जल

डॉ. सादिक़ा नवाब सहर



ग़जल हमेशा से ही विचारों के आदान-प्रदान का लोकप्रिय माध्यम रही है, बड़ी बात को कम शब्दों में गहराई तक पहुँचाने वाली और अब तो ग़जल केवल भारत ही नहीं बल्कि विश्व की अनेक भाषाओं में अपनी पहचान रखती है।

आज का युग उन सपनों के साकार होने का युग है जिसे हमारे पूर्वज एक लम्बे समय के संघर्ष के समय से देखते आ रहे थे। हजारों साल की संयुक्त संस्कृति और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक भारत, अंग्रेजों के नफ़रत के शासन काल से लहू में तरबतर बाहर निकल आया। ग़जल के शायर ने दुआ की-ख्ुदा करे कि ये दस्तूर साज-गार आए/जो बेक़रार हैं अब तक उन्हें क़रार आए।/नुमायशी ही न हो ये निजामे-जम्हूरी/हक़ीक़तन भी ज+माने को साज+-गार आए।''

भारत के इतिहास से लक्ष्मण, भरत, रजिया सुलताना, भगत सिंह, गुरुनानक, वाजिद अली शाह अख्तर आदि जैसे व्यक्ति हमारी साझा संस्कृति और परम्पराओं के प्रतीक के रूप में हमारी ग़ज+ल की विरासत बने। स्वतंत्राता के बाद भी गाँधीजी, सरोजिनी नायडू, जवाहर लाल नेहरू और मौलाना आजाद हीरो के रूप में हमारी कविता तथा ग़जल को आकर्षित करते रहे।

हमारे ग़जलकारों ने अपने युग की अपने देश की जनता की इच्छाओं, आकांक्षाओं, आरजूओं, हसरतों का चित्रा ख्ूब खींचा है। समस्याओं की ओर हल्के-हल्के इशारे किए और उनका हल ढूंढने निकलने का प्रयत्न किया।

कमोबेश हर कवि अपनी शायरी की इब्तिदा रोमानियत से करता है। कुछ आवारा-मिजाज तथा लज्जत-परस्त अपनी प्रतिभा का रुख् मोड़ देते है, तो कुछ इस मामले में सतर्क रहते हैं।

सूर्यभानु गुप्त का यह शेर इसी सतर्कता की मिसाल है- चाँद-दरिया, चश्मेतर जिंदगी,/ख्ूबसूरत ग़मों का सफ़र जिंदगी।''

वास्तव में ग्जल में कवि के जीवन के बेहतरीन क्षणों का प्रभाव जि+न्दा रहता है। पेट भरने के लिए जब ग़ज+ल बाज+ार में लाना पड़ता है तो कवि चिल्ला उठता है-÷÷मैं ने जो गीत तेरे प्यार की ख्ातिर लिखे/आज उन गीतों को बाजार में ले आया हूँ।''

आधुनिक काल में साकारात्मक राष्ट्रीय तत्त्वों के वास्तविक शत्रुओं की निशानदेही करने का फ़जर् भी उन कवियों ने निभाया है......तथा साहित्य के स्तर पर जनता की उमंगों, इच्छाओं तथा आकांक्षाओं को आईना दिखाया है। समाजवाद की हिमायत भविष्य पर विश्वास, जनता पर भरोसा तथा अंतर्राष्ट्रीय वातावरण में शोषण के विरुद्ध लड़ने वालों से जुड़ाव लगाव समाज के शोषित-दमित वर्ग की समस्याओं को उजागर करना और जनता के हित के विरुद्ध काम करने वाली शक्तियों का भांडा-फ़ोड़ आज के ग़जलकार के प्रमुख विषय हैं। उदाहरण स्वरूप- पद्मश्री गोपालदास नीरज' जिन्होंने ग़जल को गीतिका' का नाम दिया है, अपनी ग़जलों के माध्यम से समाज के यथार्थ को प्रदर्शित करके क्रांति लाना चाहते है। उनका यह शेर देखिए जिसमें उन्होंने भारत की दुर्दशा का मातम यों किया है- ÷÷ज्यों लूट ले कहार ही दुल्हन की पालकी/हालत यही है आजकल हिन्दोस्तान की''

आधुनिक ग़ज+लकार अब अरूजी पाबंदियों की ओर ध्यान देने लगे है किंतु कहीं-कहीं इसे तोड़ते भी रहते है कि विचार बंधनों में समा नहीं पाते। मिजर् ग़ालिब को भी कुछ ऐसी ही शिकायत थी। कहते हैं- ÷बक़द्रे-जौक़ नहीं जर्फ़े-तंगनाए-ग़जल'

हमारी साझी परम्पराएँ और साझे नेता भारतीय संस्कृति का प्रतीक बनकर हिन्दुस्तानी ग़ज+ल को एकता और अखंडता का प्रतिनिधि बनाती है। महात्मा गाँधी गौतमबुद्ध, भगतसिंह हों या ताजमहल, अजंता-एलोरा.....भारतीय संस्कृति की साझी पूंजी हैं।

दुष्यंत कुमार से पहले हिन्दी ग़जल में फ़ारसी भाषा के शब्दों, बिम्ब और प्रतीकों एवं दृष्टांतों का बहुतायत के साथ प्रयुक्त किया जाता था। दुष्यंत कुमार को हिन्दी ग़जल में फ़ारसी शब्दों को कम करने का श्रेय मिलता है। साथ ही साथ हिन्दी के सरल शब्दों, प्रतीकों आदि के प्रयोग से उन्होंने हिन्दी ग़जल में भारतीय वातावरण का निर्माण किया। जिससे भारतीय और विशेषकार हिन्दी भाषा-भाषी ग़जल का आनंद ले सकें। भारतीय परिवेश, सभ्यता और संस्कृति यहाँ तक कि ऋतुएँ, पेड़-पौधों का चित्राण दुष्यंत कुमार ने अपनी ग़ज+लों में कुछ इस प्रकार किया है कि वह अजनबी या ठूँसा हुआ नहीं लगता- ÷÷अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,/ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।'' या ÷÷तूने ये हरसिंगार हिलाकर बुरा किया,/पँवों की सब ज+मीन को फूलों से ढँक दिया।''

दुष्यंत कुमार ने हिन्दी ग़ज+ल का संस्कार दिया। वरना आज भी हिन्दी ग़ज+ल घिसे-पिटे लहजे में परंपरागत विषयों से जुड़ी रहती है। दुष्यंत कुमार ने हिन्दी ग़ज+ल को जीवन और उसके यथार्थ से जोड़ा। उसे स्वतंत्रा अस्तित्व दिया। भोगे हुए यथार्थ को अपनी गहरी संवेदना के साथ रूपायित करने का हुनर दिया। हिन्दी के मुहावरे, लोच, गति और प्रवाह दिया। उसे नए आयाम और शिल्प दिये और हिन्दी ग़ज+ल को उनकी यही सबसे बड़ी देन है।

आधुनिक युग के कवि दुष्यंत कुमार के नक्+शे-क़दम पर चल पड़े और उर्दू साहित्य की लोकप्रिय तथा शताब्दियों से बरती-बरताई विधा ग़ज+ल की प्रभावोत्पादकता, गेयता, समर्थता, लोच और स्मरणीयता से आकर्षित हुई। ग़ज+ल में आत्मसंघर्ष और अंतर्द्वन्द्व से भरे अनुभवों को समाहित कर दिया और कथ्य और शिल्प दोनों ही के माध्यम से दुधारी तलवार का काम लिया। आधुनिक जनजीवन के गहरे स्वरूप को रूपायित करने की ग़ज+ल में क्षमता पाकर वे ग़ज+ल की ओर आकर्षित हुए।

सर्वहारा वर्ग के दैनिक जीवन से जुड़ी हुई तकलीफ़ों, दहशत और शंकाओं, क़ानून, न्याय की गड़बड़ियाँ जीवन-मूल्यों का हनन, बलिष्ठ व्यवस्था और सामाजिक विषमता को आज के युग के ग़ज+लकार ने कुछ इस प्रकार आशावादी स्वरों में और भविष्य के प्रति आश्वासित होकर प्रस्तुत किया कि उनका स्वर युग का स्वर बन गया -÷÷बन्द पलको, तुम्हीं दीखते, सूरदासी नयन हो गये,/प्रेम जब ऊर्ध्वगामी हुआ, गेरुए सब वसन हो गये।''

भारत में ग़ज+ल का इतिहास दीर्घ है और अब वह इतनी संपन्न हो चुकी है कि प्रेमानुभूति प्राकृतिक वर्णन, राजनीति, समाज, नीति, अर्थ, चरित्र इत्यादि से संबंधित विभिन्न विषयों को बड़ी सरलता के साथ अपने में समाहित कर लेती है। हिन्दी ग़ज+ल और उर्दू ग़जल के मिजाज में अंतर नजर आता है बल्कि कुछ लोगों का यहाँ तक विचार है कि हिन्दी ग़जल का मिजाज उर्दू ग़ज+ल की भाँति ÷÷नाजुक नहीं है बहुत कठोर है।'' (काल तुझ से होड़ है-शमशेर बहादुर सिंह, पृ.२७-२८)

इसका उत्तर यों है कि एक स्थान पर पहुँचकर हिन्दी और उर्दू ग़जल एक ही दिखाई देने लगती हैं। तेरहवीं शताब्दी में ÷अमीर ख्ुसरो' और चौदहवीं में ÷कबीर' के बाद हिन्दी ग़ज+ल रीतिकालीन श्रृगारिकता में खो गयी किन्तु उर्दू ग़ज+ल निरंतर लिखी जाती रही और मध्ययुगीन दरबारों में पलने के कारण उसमें रीतिकालीन दोहों की श्रृंगारिकता और अलंकारिता आने से वैसी ही नजाकत सौंदर्य और प्रेम-संबंधी सूक्ष्म अनुभूतियों की पीड़ा और कसक दृष्टव्य होती रही। उसमें युगबोध की झलक पहले कम और आजकल अधिक दिखाई देने लगी है -÷÷तुम्हारी फ़ाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है-मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है।/रोज बढ़ते रहते हैं कुछ मकान बस्ती में,/रोज घटता रहता है आसमान बस्ती में।''

दुष्यंत कुमार के रूप में हिन्दी ग़जल को मसीहा मिला। उनकी आम बोलचाल की भाषा और समसामयिक कविता के प्रभाव में समाज और राजनीति पर तीखे व्यंग्य प्रहार की विशेषताओं को ऐसी लोकप्रियता प्रदान हुई कि पूर्ववर्ती कवियों ने न केवल हिन्दी में ग़ज+लों का एक ख्जाना जमा कर लिया बल्कि अधिकाशतः दुष्यंतजी को ही भाषा और कथ्य संबंधी विशेषताओं को सीने से लगाए रखा।

आज ग़जल पत्र-पत्रिकाओं के योगदान से,ग़जल-संग्रहों और ग़जल-गायकी के कारण पर्याप्त संवेदनाशील विधा हो चुकी है। उसमें और व्यापकता और प्रभाव की गुंजाइश है। अभी संभावनाएॅं बाक़ी है।

अभी हिन्दी ग़जल में एक विशेष दृष्टिकोण ही अधिक उभर पाया है और वह है राजनैतिकता और सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार करने का दृष्टिकोण। वास्तव में हिन्दी ग़जल को आधुनिक काल में पुनर्जन्म मिला। इसीलिए उसमें नयी परंपराएं आधुनिक काल से अधिक जुड़ी हुई दिखाई देती हैं। आज किसी भी भाषा की ग़ज+ल ही नहीं, साहित्य की कोई भी विधा तीखे और इंक़लाबी स्वर को अपनाए बिना नहीं रह सकती।

चन्द्रसेन विराट कहते हैं- ÷÷भेद कुल खुल गया वह सूरत हमारे दिल में है,/देश को मिल जाये जो पूँजी तुम्हारी मिल में है।''(आरोह, हिंदी ग़ज+ल में, आलोक भट्टाचार्य, पृ.३३)

हिन्दी की तरह उर्दू और अन्य भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में ग़ज+ल ÷÷बैठे रहें तसव्वुरे-जानाँ किए हुए'' की कल्पना को छोड़कर बदलते हुए परिवेश और परिस्थितियों की ओर लौट आयी है। यदि वह ऐसा नहीं करेगी तो परिवर्तनशील परिस्थितियों में अपनी मौत आप मर जायेगी।

हिन्दी ग़ज+ल के क्षेत्रा में दुष्यंत कुमार का लहजा आज भी अन्य हिन्दी ग़ज+लकारों के स्वर में छलकता दिखाई देता है। दुष्यंत कुमार के आंदोलनात्मक व्यक्तित्व के बाद हिन्दी ग़ज+ल में एक और बहुत बड़े इंक़लाब की आवश्यकता है और वह आधुनिक ग़ज+लकार ही लायेंगें।

हिन्दी ग़जल में उर्दू भाषा के ही शब्द नहीं दिखाई देते बल्कि हिन्दी का एक बड़ा शब्द भंडार उर्दू भाषा और काव्य में घुल-मिल गया है। हिन्दी और उर्दू भाषाओं एक-दूसरे के सामीप्य के संबंध में विश्व के अनुपम उदाहरण है। विश्व की अन्य कोई भाषा दूसरी किसी भाषा से उतना साम्य नहीं रखती, जितना कि उर्दू और हिन्दी रखते हैं। जाने-अनजाने दोनों भाषाएं एक-दूसरे से आकर्षित रही है।

राजेश रेड्डी का शेर देखिए- ÷÷मेरे दिल के किसी कोने में इक मासूम-सा-बच्चा,/बड़ों की देखकर दुनिया बड़ा होने से डरता है।''

यह लबो-लेहजा राष्ट्रीयता के शरीर में प्राण भर देता है।

हिन्दी ग़ज+ल में नए मूल्य, नए परिवेश, नए दृष्टिकोण और नए विषय वस्तु का समावेश अनिवार्य है। पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाली ग़जल विधा के संदर्भ में नयी संभावनाओं की ओर संकेत करती है। आवश्यकता है तो बस छंद अनुशासन की। इस ओर स्वस्थ क़दम उठाना भी जरूरी है, क्योंकि ग़जल का अपना व्याकरण है जिसमें शेर, रदीफ़, क़ाफ़िया, वज्न आदि का पालन करना आवश्यक हैं। ÷मिजर् ग़ालिब' जैसे महान् ग़जलकार भी ग़जल के लिए एक उस्ताद की आवश्यकता अनुभव करते हैं। नवोदित ग़जलकारों को ग़ज+ल विधा आसान-सी प्रतीत होती है। इसीलिए तुरन्त क़लम उठाकर ग़जलें लिखना आरंभ कर देते हैं।

ग़ज+ल की कला बहुत अभ्यास चाहती है। ÷अमीर मीनाई' ठीक ही कहते हैं- ÷÷सौ शेर एक जलसे में कहते थे हम अमीर/जब तक न शेर कहने का हमको शऊर था।''

इसी अभ्यास ने आज के लोकप्रिय कवियों के शऊर को निखारा है।

महिला ग़जलकारों की संख्या बहुत कम है। उन्हें उचित प्रोत्साहन नहीं मिला कुछ समाज के बंधन और कुछ लोकलाज का डर, कुछ घर-परिवार की बंदिश स्त्रियाँ अपनी प्रतिभा को खुलकर प्रस्तुत नहीं कर पातीं। परतुं इनकी ग़जलों में जिनमें भाव की सच्चाई, अभिव्यक्ति की सादगी, सौंदर्य और ताजगी और स्त्री के अनुभव दिखाई देते हैं। वे जीवन में आशावादी दृष्टिकोण और सुंदर भविष्य की इच्छा को महत्त्व देती है इनका चिंतन संगठित है। एलिजाबेथ कोरियन ÷मौना', डॉ. ममता आशुतोष शर्मा, डॉ. राजकुमारी शर्मा ÷राज+', रंजना श्रीवास्तव ÷रंजू', डॉ. सादिक़ा नवाब ÷सहर' यानी ख्+ााकसार, मरियम ग़ज+ाला, डॉ. साधना शुक्ला, कृष्णाकुमारी, शैलजा म.न. नरहरि, उमा श्रीवास्तव की कोशिशें जारी हैं।

जैसे कि शैलजा नरहरि का शेर देखिए-

÷÷मोहब्बत में असर इतना नहीं था

वो दीवाना तो था लगता नहीं था।''

÷÷ऊँचे क़द की महत्ता न समझा

सके ख्+ाुद ही बौने हुए जग हँसाई हुई।''

(साधना शुक्ला)



÷÷एक चिनगारी छिपाने के लिए

राख बनती जा रही है जि+न्दगी।''

(रंजना श्रीवास्तव ÷रंजू')



÷÷आँखों को ज+रा खोलो, ढूँढो शिवा कहाँ?

हमको तो दीखता है रब से भरा जहाँ।''

(ममता आशुतोष शर्मा)



÷÷कौन बनवा सकेगा ताजमहल,

अब कहाँ अैसे चाहने वाले।''

(उमा श्रीवास्तव)



÷÷उसने चाहा नहीं मगर अै ÷राज+'

सच उभरकर ज+बान पर आया।''

(राजकुमारी शर्मा ÷राज+')



÷÷दुःख तो बहुत हुआ है मगर फिर भी जाने क्यों

चूमा है दिल के दाग़ को मैंने कभी-कभी।''

(सादिका नवाब ÷सहर')

राष्ट्रीय भावना एक मानसिक अनुभूति है। अनेकता में एकता की भावना अपने देश भारत की विशेषता रही है। भारत अनेक धर्मों, जातियों, और भाषाओं का देश है। इन परिस्थितियों में अपने राष्ट्र को एक सूत्रा में बाँधे रखने के लिए सभी धर्मावलम्बियों में देशप्रेम और साम्प्रदायिक सद्भाव की भावना का होना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है।

राष्ट्रीयता की भावना का आधार पारस्परिक सहानुभूति है। यह भावना व्यक्ति या समुदाय से राष्ट्र के प्रति सर्वोपरि कर्तव्य निष्ठा का अर्पण कराती है।

आज हमारी राष्ट्रीय भावना को एक ख़तरा सम्प्रदायवाद से है। देश में जब धर्मान्धता बढ़ती है तो देश की एकता तथा सामन्जस्य को गहरा आघात पहँुचता है। कुर्सी के लालच में यह सब हो रहा है। अपने राजनैतिक स्वार्थों के कारण कुछ राजनेताओं ने धर्म की आड़ में देश की अखण्डता और साम्प्रदायिक सौहार्द को कट्टरपंथियों से मिलकर चोट पहुँचाई है। चंद्रसेन विराट जैसे सशक्त ग़ज+लकार, अपनी मुक्तिकाओं में देश की साम्प्रदायिक विद्रूपताओं का सजीव चित्राण किया है,

-÷÷पंथ, अखाडे+, सम्प्रदाय या फ़िरक़ों की पग-पग खिंची लकीर हमारी बस्ती में'' (न्याय कर मेरे समय पृ. १७)

राष्ट्रीयता के प्रबल समर्थक, भाषाई सौहार्द तथा साम्प्रदायिक सद्भावना के हामी पद्मश्री बेकल ÷उत्साही÷ ने अपनी ग़ज+लों में जो उद्गार व्यक्त किए हैं, वे राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ बनाने मैं सदैव सहायक रहेंगे। बेकल साहब की ग़ज+लों में वतन परस्ती और राष्ट्रीय एकता का जज्+बा पुर असर शक्ल में भरपूर दिखाई देता है। धर्मान्धता को देष के लिए ख्+ातरा बताते हुए वे कहते हैं कि-÷÷हम कहीं हिन्दू , कहीं मुस्लिम बने बैठे रहे/धर्म की चौपल पर सारा वतन जलता रहा'' (हिन्दी ग़ज+ल, उद्भव और विकास, पृ.२२६)

प्रमुख ग़ज+लकारों के राष्ट्रीय एकता पर कहे गए अशआर पढ़ने से यह सिद्ध हो जाता है कि राष्ट्रीय एकता की भावना एक श्रेष्ठ भावना है। आज हिन्दी ग़ज+लकारों में देश पे्रम, साम्प्रदायिक सद्भाव, भाषाई सौहार्द, सामाजिक समरसता तथा राष्ट्रीय एकता के प्रति लगाव है, इसीलिए डॉ. नसीम बेचैन का कहना क्या सच नहीं!

÷÷जब सुनाई किसी ने दिल की बात

हम उसे अपनी दास्ताँ समझे।''

÷मेयार सनेही' ने प्रेम का संदेसा यों पहुँचाने का प्रयास किया है- ÷÷हम मुहब्बत के पुजारी हैं मुहब्बत की क़सम/जिसको भी सजदा करेंगे वो ख्+ाुदा हो जाएगा'' (ग़ज+ल दुष्यंत के बाद, भाग २, पृ.७०)

आम आदमी के दुख-दर्द, राष्ट्रीय एकता तथा देशप्रेम पर ग़ज+लें लिखने वाले ग़ज+लकारों में दुष्यंत कुमार, नीरज, शमशेर बहादुर सिंह, हरिकृष्ण प्रेमी, बलबीर सिंह ÷रंग', भवानी शंकर, ज्ञानप्रकाश विवेक, हनुमंत नायडू, कुँअर बेचैन, चन्द्रसेन विराट, नंदलाल पाठक, ज+हीर क़+ुरैशी, शिव ओम् अम्बर, कुलदीप सलिल, रामावतार त्यागी, बालस्वरूप राही, अवध नारायण मुद्गल, शेरजंग गर्ग, राजकुमार कृषक, अजय प्रसून, केदार नाथ कोमल, डॉं. उर्मिलेश, रोहिताश्व अस्थना, राजेश रेड्डी, म.न. नरहरि, शैलजा नरहरि, डॉ.नसीम बेचैन, मरियम ग़ज+ाला, रसूल अहमद ÷साग़र', सादिक़ा नवाब ÷सहर', अदम गोंडवी, नूर मुहम्मद नूर , हरेराम समीप , दर्शन बेज+ार, श्रीराम मधुर , उदय प्रताप सिंह , बशीर अहमद मयुख, मणिक वर्मा, बाबा कानपुरी, वृन्दावन राय ÷सरल', डॉ. रसूल अहमद ÷सागर', दिनेश प्रभात , मु. मुजीब आलम, देवमणि पाण्डेय, मेयार ÷सनेही' तथा डॉ. मीर सैयद मेहदी -आदि के नाम प्रमुख हैं। (ग़ज+ल... दुष्यन्त के बाद भाग-एक, पृ.४१)

वृन्दावन राय ÷सरल' अपनी तेहज+ीब से प्यार करने के लिए यों प्रेरित करते हैं- ÷÷अपनी तहज+ीब अगर जान से प्यारी है ÷सरल'/ग़म के मारों के लिए प्यार का साग़र लिखना'' (ग़ज+ल दुष्यंत के बाद, भाग २ पृ. २५०)

दिनेश ÷प्रभात' देश-प्रांत की सीमाओं से आगे निकल कर कुछ इस तरह मानवता का पाठ पढ़ाते हैं -÷÷हमारे प्यार की ख्+ाुशबू तुम्हारे देश जाएगी/हवा अपने पराये में कभी अन्तर नहीं करती'' (ग़ज+ल दुष्यंत के बाद, भाग २, पृ. २५६)

मु. मुजीब ÷आलम' राष्ट्रीय एकता का पक्ष लेते दिखाई देते हैं-÷÷न ख्+ााली कर सके अमृत कलष वो एकता रूपी /सदा से देश में जो विष वमन की बात करते हैं।'' (ग़ज+ल दुष्यंत के बाद, भाग २ पृ. ४७०)

बशीर अहमद ÷मयूख' तो भारत की धर्म-निर्पेक्षता की नीति का कुछ इस प्रकार बयान करते हैं कि कई सदियाँ आँखों के आगे घूम जाती हैं-÷÷सैकड़ों सदियाँ चले हैं हम, सफ़र में साथ-साथ/एकता के कारवाँ का नाम है हिन्दोस्ताँ'' (ग़ज+ल दुष्यंत के बाद, भाग २, पृ. २६)

मणिक वर्मा देश को मुहब्बत का मंदिर मानते हैं -÷÷लोग पढ़ते हों जहाँ रोज+ मुहब्बत की नमाज/+ऐसा मंदिर भी हर इक घर में बनाया जाए'' (ग़ज+ल दुष्यंत के बाद, भाग २ पृ. ९०)

डॉ. रसूल अहमद ÷साग़र÷ का अंदाज+ देखिए-÷÷एकता कहती है पुरखों की रिवायत से जुड़ो/देश के हित में करो विषपान हँसते-बोलते'' (संवेदनाओं के क्षितिज पृ.५६)

बाबा कानपुरी राष्ट्रीय एकता की भावना इस प्रकार व्यक्त करते हैं--÷÷इसे मंदिर कहो, मस्जिद कहो, गिरिजा कि गुरुद्वारा/इसी में हमने अपनी आस्थाएँ ला के रखी हैं (ग़ज+ल दुष्यन्त के बाद भाग-तीन पृ.२३८)

हरेराम ÷समीप÷ धर्म के नाम पर होने वाले दंगलों को रोकना चाहते हैं-क्या हुआ उपवन को क्यों सारे शजर लड़ने लगे/आँधियाँ कैसी हैं जो ये घर से घर लड़ने लगे (ग़ज+ल... दुष्यन्त के बाद भाग-एक पृ.२३६)

देवमणि पाण्डेय देशवासियों के बीच प्यार के पनपने की दुआ करते हैं-÷÷इस जहाँ में प्यार महके जि+न्दगी बाक़ी रहे/ये दुआ माँगो दिलों में रोशनी बाक़ी रहे'' (ग़ज+ल दुष्यंत के बाद, भाग 1 पृ. ३४४)

ग़ज+ल के साहित्य की सैद्धांतिक अनुशीलन की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है। दुष्यंत कुमार जैसे आधुनिक ग़ज+ल के मसीहा और मील के पत्थर तक की ग़ज+लों की सही समीक्षा आज तक सामने नहीं आयी। ग़ज+ल के क्षेत्रा में अखिल भारतीय स्तर पर आदान-प्रदान की आवश्यकता भी अनुभव की जाने लगी है। व्यक्तिगत और शासकीय संस्था में यदि संगोष्ठियों, कवि सम्मेलनों का आयोजन करें तो ग़ज+ल के उज्ज्वल भविष्य के वर्तमान में परिवर्तित होने में अधिक समय नहीं लगेगा। साहित्य अकादमी जैसे संस्थानों को ग़ज+ल संग्रहों और संकलनों को अनुदान देकर प्रेरित करने की ओर अधिक गंभीरता से विचार करना होगा।

डॉ. कुँअर ÷बेचैन' तहज+ीब की ख्+ाुशबू के हामी हैं। कहते हैं- ÷÷ये माना आदमी में फूल जैसे रंग हैं, लेकिन/÷कँुअर' तहज+ीब की ख्+ाुशबू मुहब्बत ही से आती है''(ग़ज+ल... दुष्यन्त के बाद भाग-एक, पृ.११३)

अवश्य ही संवेदना और शिल्प के क्षेत्रा में साठोत्तरी हिन्दी ग़ज+ल संवेदनाशील विधा है और अभी हाफ़िज+ फ़िरदौसी, मीर, ग़ालिब, इक़बाल जैसे महान ग़ज+लकारों की हिन्दी ग़ज+ल को प्रतीक्षा है।



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