Tuesday, December 21, 2010

काशी की संस्कृति अधूरी है, बिना इस्लाम के

अलकबीर



जहाँ इतिहासकारों ने काशी के बौद्ध और हिन्दू पक्ष को उजागर किया है, वहीं काशी के इतिहास का इस्लामी पक्ष पूर्णतया उपेक्षित रहा है। काशी खण्ड में जहाँ प्राचीन हिन्दू ग्रन्थों के आधार पर सिर्फ हिन्दू काशी का शोध किया गया है, वही मध्यकालीन फ़ारसी ग्रन्थों के आधार पर इस्लामी इतिहास का भी शोध किया जाना चाहिए था, क्योंकि मध्यकालीन इतिहास सांस्कृतिक मूल्यों के परिवर्तन का इतिहास रहा है। राजा मोतीचन्द की काशी पर सबसे प्रामाणिक मानी जाने वाली पुस्तक ÷काशी का इतिहास' या अल्तेकर की पुस्तक भी इस दृष्टि से अधूरी है, एक तो उन्होंने जिन पुस्तकों को आधार बनाया है, वह अप्रमाणिक हैं तथा आंग्ला इतिहासकारों द्वारा राजनैतिक उद्देश्यों से लिखी गई है। तत्कालीन फ़ारसी सन्दर्भों को तो राजा मोतीचन्द ने छूने की भी कोशिश नहीं की है, जबकि बिना इन पुस्तकों के मध्यवर्गीय इतिहास को समझा ही नहीं जा सकता। राजा मोतीचन्द ने भी अंग्रेज इतिहासकारों की ही तरह यह सिद्ध करने की कोशिश की है, भारत या बनारस में मुसलमानों का इतिहास आक्रमण और लूट का इतिहास रहा है।

इसी प्रकार जब काशी में पुरातात्त्िवक अध्ययन की बात होती है तो बौद्ध स्थलों को ही मुख्य रूप से शोध का विषय बनाया जाता है वहाँ तक कि राजघाट की खुदाई में मध्यकाल की इमारतों व खण्डहों के सर्वेक्षण के दौरान आस पास की बहुत सी महत्त्वपूर्ण मस्जिदों, खानकाहों और मकबरों को नज+रअन्दाज कर दिया गया। यदि काशी के इतिहास में किसी मस्जिद का जिक्र मिलता भी है तो मात्रा ज्ञानवापी के मस्जिद का वो भी विवादों के कारण, सच तो यह है कि हमने अपनी दृष्टि ही संकुचित कर ली है, हमारा कोण ही ग़लत है, ज्ञानवापी की मस्जिद और भगवान शिव का विश्वनाथ मंदिर संसार की सबसे नई संस्कृति इस्लाम का संसार की प्राचीनतम हिन्दू संस्कृति से मिलन स्थल है, भारत की जमीन का सांप्रदायिक एकता की अनूठी मिसाल है। मन्दिर के कलसे और मस्जिद के गुम्बद सिर उठाये यह एलान करते प्रतीत होते हैं कि हम एक हैं और सदा एक रहेंगे। संसार की कोई भी सांप्रदायिक ताकत हमें अलग नहीं कर सकती, यह अटल सत्य है कि हिन्दू और मुस्लिम इस देश के दो बाजू हैं, एक में आध्यात्म का अपार चिंतन है तो दूसरे में श्रद्धा का व्यापक फलक, एक से शंखों की ध्वनि गूंजती है तो दूसरे से अज+ान की मोकद्दस सदा।

यह सही है कि इस्लाम धर्म भारत में नहीं पैदा हुआ है, अंतिम पैगम्बर जिन्हें इलहाम स्वरूप कुरआन जैसी पवित्रा पुस्तक मिली, भारत के नहीं थे। परन्तु इस्लाम में भारत के ऋषियों और अवतारों को अपना पैगम्बर स्वीकार किया है, वेदों को सहीफों के रूप में मान्यता दी है, इतना ही नहीं भारत की कला और संस्कृति को अपनी कला और संस्कृति से प्रमाणित भी किया है। दूसरी गैर भारतीय संस्कृति से भी इस्लाम ने बहुत कुछ लिया है, जिसका विशद् वर्णन अलग से किसी लेख में संभव है। यह गंगा जमुनी तहजीब काशी की विरासत रही है। यहां पर मध्यकालीन इस्लामी प्रभाव के परिणाम के रूप में मस्जिद तथा मकबरों की लंबी फेहरिस्त है, जिससे काशी की एक और तस्वीर उभरती है।

भारत में अरबी मुसलमानों का पहला जंगी बेड़ा खलीफ़ा हज+रत उमर फ़ारूक के काल में आया था और फिर खलीफ़ा के ही आदेश से वे लौट भी गए। भारत की पाक जमीन पर रक्तपात उन्हें पसंद नहीं था। भारत के प्रति अरबी मुसलमानों के लगाव का प्रमाण है कि मैदाने कर्बला में जब हज+रत हुसैन यजीद को मानने वालो ने पूछा कि यदि आप को किसी दूसरे देश जाने दिया जाए तो आप कहां जायेगें तो हजरत हुसनै ने उस समय पहला नाम हिन्दुस्तान देश का लिया था।

मोहम्मद बिना कासिम की सिन्ध के आस पास की हिन्दू बस्तियों में इतनी प्रतिष्ठा थी कि जब वह लौटने लगा तो लोगों ने उसकी मूर्तियाँ बनाकर पूजा प्रारम्भ कर दी।

संभवतः राजघाट पर, आज वहां गहड़वार वंश के अन्तिम शासक राजा बनार का किला है, वहीं पर युद्ध हुआ था जिसमें बहुत से मुसलमान मारे गए, वहाँ चन्दन शहीद और बहुतेरी कब्रें इसी हादसे का परिणाम मानी जाती हैं। यहाँ पर एक मस्जिद भी है जिसका नाम मस्जिदें- गंजशहीदाँ है, इसके बारे में कहा जाता है कि यह इन्हीं शहीदों की याद में बनाई गई थी, जो यहाँ युद्ध में मारे गये। मस्जिद में लगे एक शिलालेख से यह बात स्पष्ट हो जाती है। आज से लगभग एक सौ सत्तर साल पहले जब काशी रेलवे स्टेशन बनवाने हेतु खुदाई हो रही थी, तो यह मस्जिद सामने आई थी इसके पूर्व यह एक टीले के नीचे दबी हुई थी।

कई मुहल्लों के नाम अफ़जल अलवी और उनके साथियों के नाम पर पड़े हैं जहाँ उनके मजार भी हैं, सालारपुर जो कि सैयद सालार मसउद के नाम पर जाना जाता है, यहाँ पर मलिक अफ़जल अलवी की मजार है जिसे लोग अलवी शहीद के नाम से पुकारते हैं, दूसरा मुहल्ला अलवीपुरा या अलईपुरा इन्हीं के नाम पर है।

मलिक सिराजुद्दीन कुचली भी अफ़जल अलवी के ही साथ आए थे, इनकी मजार औरंगाबाद में औरंगजेब द्वारा बनाई गई सराय के पास है। इनके एक अन्य साथी मलिक मोहम्मद बाकर की मजार सालार पुरा के बाकर कुण्ड नामक मोहल्ले में है जो अब बकरियाकुण्ड के नाम से जाना जाता है। यह एक टीले पर तालाब के किनारे है जहांँ शाहकुतुब अली और शाह शाबिर अली के मकबरे बने हुए हैं। मोहम्मद बाकर एक जाने माने सूफी सन्त थे, उनकी दुआओं में बेहद असर था। आज भी आप की मजार पर काफी भीड़ होती है। इसी मुहल्ले के एक अहाते में फखरूद्दीन अलवी का भी मजार है जो कि अफजल अलवी के ही साथी थे। अहाते, मजार और दहलीज की मरम्मत और निर्माण १३८५ ई. में जियाउद्दीन अहमद हाकिमे बनारस ने कराई थी, जो कि सुल्तान फिरोज शाह के समय में हाकिमें बनारस नियुक्त हुए थे। जियाउद्दीन के ही काल में एक मस्जिद का निर्माण हुआ था जो चुनार के लाल पत्थरों की बनी थी एक शानदार मस्जिद है, जो कि झाडूशाह की मस्जिद के नाम से प्रसिद्ध है। सालारपुरा के पास में ही मीरान नासिर की मजार है जो आम जनता में मिन्नानासिर की मजार के नाम से जानी जाती है। इसी क्रम में त्रिालोचन में भार्गव भूषण प्रेस के पीछे बटुआ शहीद की मजार है, मजार की इमारत की छत एक ही खम्बे पर टिकी है, अब इस मजार को मस्जिद का रूप दे दिया गया है, तथा इसे एक खम्बिया मस्जिद के नाम से पुकारते है, जिसे हाकिमे बनारस जियाउद्दीन के पुत्रा में बनवाया था। इसके अतिरिक्त पीली कोठी मुहल्ले में मुहम्मद शहीद की मजार और उनके नाम पर मुहम्मद शहीद मुहल्ला बसा है, इसी तरह यहीं पर कुतबन शहीद के नाम पर मुहल्ला कुतबन शहीद है।

ठठेरी बाज+ार में बाबर शहीद की मजार तथा चौक में सड़क के किनारे जाहिद शहीद उर्फ मर्द शहीद का मजार आज भी मौजूद है। फ़ारसी की मशहूर किताब सनमकदा बनारस में इन मजारों का वर्णन है।

जो लोग अफ़जल अलवी के साथ बनारस आए थे, उनमें से बहुत से लोग यहाँ बस गये थे, इन्होंने रेशमी कपड़ा बुनने का पेशा प्रारम्भ किया और जुलाहे या अंसारी कहलाने लगे। इन्हीं लोगों को पहले के समय में नूरबाक कहा जाता था।

यह तो महमूद गजनवी के काल में आए मुसलमानों का वर्णन है, इसके बाद विभिन्न समय में जो हाकिमें बनारस हुए और जो कुछ भी निर्माण कार्य कराया या खानकाहें और मकबरे बने वह भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। बहुत से मुहल्लों के नाम इस काल में पड़े जैसे कि मुहम्मद गौरी के काल में सैयद अलालुद्दीन और उनके नाम पर बसा जलालीपुरा, कुतुबुद्दीन ऐबक के काल में सैयद अब्दुल रज्ज+ाक के नाम पर रज्ज+ाक पुरा, हाजी मोहम्मद इदरीस के नाम पर मुहल्ला हाजी दर्रस आदि। हाजी इदरीस के काम में वाराणसी ज्ञान का केन्द्र बन गया था। शेख सादी की चर्चित पुस्तकें गुलिस्ताँ व बोस्ताँ इसी काल में बनारस में आयीं।

फिर फ़िरोज+शाह के समय में हाकिम जियाउद्दीन के नाम पर मुहल्ला जियापुरा का नाम पड़ा था जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है। इस काल की महत्त्वपूर्ण इमारतों में राजाबीवी (बीवी रजिया) मस्जिद तथा शकर तालाब की मस्जिद भी है।

यह लंबी चौड़ी सूची है जिसका वर्णन इस छोटे से लेख में संभव नहीं है।

फिर मुगल काल का बनारस आता है जो अपने आप में एक पुस्तक का रूप ले सकता है। उस काल के दो शासक महत्त्वपूर्ण है, प्रथम सम्राट अकबर, द्वितीय औरंगजेब। मस्जिद ज्ञानवापी के बारे में जब फ़ारसी पुस्तकों के पन्ने खुलते है तो मामला उलट जाता है, सामान्य स्थापित मान्यताएं टूट जाती है और कुछ किताबों से ऐसा सिद्ध होता है कि यह मस्जिद औरंगजेब के पूर्व थी और इसका निर्माण अकबर के काल में हुआ था। यह मान्यता भी खण्डित होती है कि इसका निर्माण किसी मंदिर को गिरा कर हुआ था। औरंगजेब जिसे मंदिर भंजक का नाम दिया जाता हो, उसके काल में भी विभिन्न मठो को अनुदान देने का प्रमाण मिलता है तथा मंदिरों को गिराकर मस्जिद बनाए जाने के विरूद्ध उसके फरमान भी प्रमाण के रूप में देखे जा सकते हैं। औरंजेब का अबुलहसन के नाम एक शाही फरमान देखिए जिसका अनुवाद इस प्रकार है-

÷÷हमारे शरीयत (कानून) के अनुसार यह निश्चित हुआ है कि पुराने मन्दिरों को नहीं गिराया जाए, परन्तु नया मन्दिर नहीं बनने दिया जाए। हमारे दरबार में सूचना आई है कि कुछ लोगों ने वाराणसी में और उसके आस पास रहने वाले हिन्दुओं को सताया है। वहाँ जिन ब्राह्मणों के पास पुराने मंदिर हैं, उनको भी तंग किया गया है और ये लोग इन ब्राह्मणों को अपने स्थानों से पृथक करना चाहते हैं। अतः हमारा शाही आदेश है कि कोई व्यक्ति उन स्थानों को, ब्राह्मणों और हिन्दुओं को न सताए।''

इस प्रकार इस्लामी काशी, बौद्ध और हिन्दू काशी से कम महत्त्वपूर्ण नहीं है।



1 comment:

Anonymous said...

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