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कठिन समय में कहानी : दुनिया का सबसे बड़ा आदमी

- सोलजी के. थॉमस
ठलती लुकाठी हाथ में लेकर गलत काल के विरूद्ध बगावत की परम्परा हिन्दी साहित्य में कबीर से काशीनाथ सिंह तक लंबी है। इसे कालदोष कहकर सरलीकृत करना किसी भी संस्कृतिकर्मी के लिये असंभव है। क्योंकि दुस्समय के पंजों से दुनिया को मुक्त करना उनका लक्ष्य है। उस मंजिल तक पहुँचने के लिये उनकी आत्मा हमेशा बेचैन रहती है। वास्तव में श्रेष्ठ रचनाएँ इसी बेचैनी से अंकुरित होती हैं। दुनिया की तमाम गंभीर कहानियाँ इसके लिये साक्ष्य हैं। काशीनाथ सिंह की दुनिया का सबसे बड़ा आदमी' शीर्षक कहानी इसी सन्दर्भ में पुनर्वाचन और पुनर्मूल्यांकन की मांग करती है।
कहानी का देश-काल सन्दर्भ आजादी के चार पाँच साल बाद का है। मुख्य पात्र शौक साहब के पास धन-दौलत, नौकर-चाकर की कोई कमी नहीं थी। वे चार मरातिमवाली अपनी कोठी में तीसरी अँटारी की उस खिड़की के पास बैठे रहते थे, जो गली की तरफ खुलती थी। उनके पास सब कुछ था। हाथी था, लेकिन चढ़ते नहीं थे। घोड़े थे लेकिन दौड़ाते नहीं थे। यह सारा कुछ इसलिये था कि रईस के पास होना चाहिए। कहीं दूर देहात में उनके सैकड़ों एकड़ के फार्म भी थी, जिनमें अच्छी पैदावार होती थी, लेकिन शौक साहब को इन सबसे नहीं, सिर्फ पान, कन्या, सुपारी और चूने से मतलब था। फिर वे मूड के मुताबिक गिलौरी और तम्बाकू मुँह में डालते, देर तक घुलाते और खिड़की के बाहर थूकते थे। यों हि थूकते नहीं वह सोद्देश्य था। निशाना बाँधकर गली में जाते किसी पर थूकते थे। सड़क पर हर कोई बेसब्री से इंतजार करते थे कि एक बार शौक साहब उनके ऊपर थूकें। ये कोई पागल लोग नहीं थे। लेकिन गरीब जरूर थे। अपनी गरीबी की वजह से ही वे अपने ऊपर थुकवाने के लिये शौक साहब की खिड़की के नीचे रोजाना जाते थे। लेकिन शौक साहब सभी के ऊपर थूकते नहीं थे। वे होशियार लोगों को चुनकर उनके ऊपर थूकते थे। उन्हें ऐसे बहादुरों की तलाश थी, जो कपडे खराब होते ही माँ-बहन की धुआँधार गालियाँ बकना शुरू करें, उछलें-कूदें, आसमान सिर पर उठा लें, रो-गाकर मुहल्ले और राह चलतों का अपने इर्द-गिर्द जुटा लें, फिर बिलखें-बिलबिलायें और दया की भीख माँगते हुए, इंसाफ का वास्ता देते हुये बताऐं कि अब वे क्या पहनेंगे, उनका क्या होगा? अगर इस प्रकार प्रतिक्रिया करें तो शौक साहब के दो नौकर आकर आदर के साथ उसे ऊपर लिवा जाते, उसे चन्दन के साबुन से मल-मलकर नहलाया जाता, नया कुरता और नयी धौती पहनायी जाती, इनसे शरीर सुवासित किया जाता, अच्छे से अच्छा खाना खिलाया जाता और अन्त में उसे हाथी या घोडे पर बिठाकर गली के नुक्कड तक विदा कर दिया जाता।
विपक्ष को चुप कराने के लिये सत्ता केन्द्र अनेक मार्ग अपनाते आये हैं। कभी लाठी गोली के जरिये चुप कराते हैं तो कभी अपने अनुकूल बनाकर। पूँजीवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था में ज्यादातर दूसरा उपाय स्वीकार किया जाता है क्योंकि इसमें बहिरंगी जबरदस्ती कम है। इस रणनीति के अनुसार विपक्ष की इच्छाओं की पूर्ति करते हुये उसे अपने वश में कर लेते हैं। शौक साहब भी वही तरीका अपनाते हैं। होशियार लोगों को चुन-चुनकर उन्हें खाना, कपड़ा और घोड़ा या हाथी देकर हमेशा के लिये खामोश करते हैं। व्यवस्था विरोधी आवाजों की भू्रणहत्या करने का अहिंसात्मक तरीको अर्थात्‌ शौक साहब दानवीर नहीं बल्कि बहुत ही चालाक और केन्द्रीकृत जनविरोधी सत्ता का प्रतीक है।
सतह के व्यंग्य के नीचे हमारी समकालीन सामाजिक और राजनीति वास्तविकताएँ ही है। यहाँ व्यंग्य का स्तर काफी गहरा है। काशीनाथ सिंह व्यवस्था से अपनी असहमति को दर्ज कराते हुए विपक्ष की भूमिका निभाते हैं। इस व्यवस्था को तोड़ना उनकी कहानियों का इच्छित लक्ष्य है। संकलन की भूमिका में दर्ज इस स्वीकारोक्ति कहानी सम्बन्धी काशीनाथ सिंह के विचार ही नहीं बल्कि प्रकारान्तर से कहानी की समकालीनता को भी परिभाषित करती है - सतह पर जो चीज नजर आ रही है, वह धूल नहीं है कि दो चार घडे पानी डालो और बह जाएँ। प्यारेलाल यह संस्कार है ऊँच-नीचे के, छोटे-बडे के, ठाकुर-अहीर के, बामन-चमार के, हाथी-बैल के, राजा-परजा के। ये जाते-जाते जायेंगे। यह मिट्टी है जो सदियों से पड़ी-पड़ी जमकर पत्थर बन चुकी है। उस पर चोट करो, उसे तोड़ो, उसमें धँसों और मित्रो इसी तोड़ने की कोशिश का नतीजा है ये कहानियाँ।
कहानी का दूसरा प्रकरण विपक्ष का है। कार्यक्रम इस प्रकार चल रहा था कि एक दिन एक नौजवान ने इस पूरे कार्यक्रम पर जबरदस्त दखलांदाज किया। उसने ऐसे शख्स को जिस पर पान की पीक गिरने को थी जाने कहीं से दौड़कर धक्का मार दिया, वह आदमी लुढ़कता हुआ दूर जा गिरा और पीक मोरी के पानी पर छपाक करके रह गयी। नौजवान के इस प्रत्याशित हस्तक्षेप से भीड़ बहुत क्रूद्ध हो गई। यहाँ गौरतलब है कि काशीनाथ सिंह भीड़ शब्द का प्रयोग किया है और भीड़ का इस कहानी में विशिष्ट अर्थ है। भीड़ और समाज में फर्क है कि भीड़ की अपनी अस्मिता, स्वत्व और अस्तित्व नहीं। इसलिए शौक साहब के पीक की भीख माँगती भीड़ उस नौजवान को बेइज्जत करके छोड़ देती है। भीड़ महसूस करती है कि उस नौजवान के कारण ही उन्हें कपडे और भोजन की नौबत नष्ट हो गयी। दूसरे दिन भी उसी नौजवान ने वही हरकत और एक आदमी के साथ दुहराया तो भीड़ उसे मारने लगी। क्योंकि महीनों से वे लोग शौक साहब की पीक अपने ऊपर पड़ने का इंतजार कर रहे थे। हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि अमानवीय शोषण के शिकार होकर यातनापूर्ण जिन्दगी झेलने के बावजूद हमारी जनता उसके विरूद्ध संघर्ष करने से कतराती है। यही नहीं, अगर कोई संघर्ष करे, या करने के लिये उन्हें लामबद्ध करने की पहलकदमी करें, तो उन पर जब व्यवस्था विद्रोही, अपराधी, आतंकवादी आदि बिला लगा देती है तो ये आवाम भी व्यवस्था सहयोग देते हैं। शौक साहब ने भीड़ को आदेश दिया कि उसे छोड़ दो। यह उनकी छद्म उदारता और जाली मानवीयता का प्रदर्शिनी है। फिर दोनों के बीच बड़ी देर तक प्रतियोगिता होती रही। देखते ही देखते खिड़की से नजर आने वाली सारी सड़क और दीवारें लाल हो गयीं। इस दौरान नौजवान उछलता रहा, कूदता रहा, नाचता रहा, गिरता-भहराता रहा। उसके कपडे तार-तार हुए, कुहनी और घुटने फूटे, सीने पर खरोंच आई, मुडढों और कन्धों में मोच आयी, छाती धौकती की तरह चलती रही, पसलियाँ बाहर झाँकने लगीं, लेकिन उसके बदन पर एक भी छींटा नहीं पड़ा। यह दरअसल सत्ता को चुनौती देते संघर्षरत आदमी और सत्ता के बीच का समझौता विहीन संघर्ष है।
काशीनाथ सिंह ने इस कहानी में कहीं भी उस नौजवान का उद्देश्य के बारे में कुछ भी नहीं कहा है। शौक साहब के घोड़े, हाथी आदि सभी का वह तिरस्कार करते हुये सिर्फ यही कहता है मुझे कुछ नहीं चाहिए। यह संघर्षरत योद्धा की आत्मा की अर्थगर्भित प्रतिरोगी आवाज है। क्योंकि उनका लक्ष्य समाज की मुक्ति है। यह सब कहा नहीं गया है पर अर्न्तध्वनित है। समझौता विहीन संघर्ष में दोनों थक जाते हैं और एकाएक युवक वहाँ से गायब हो जाते हैं। यहाँ रेखांकित करने योग्य बात यह है कि सत्ता के विरूद्ध विद्रोह करके उसे पराजित करने के उपरांत ही वे प्रस्थान करते हैं। संघर्ष में हारकर या डरकर पलायन नहीं करते हैं। साहब क्रूद्ध होकर ऐलान करता है कि जब तक उस नौजवान को उधर से भगाने वाला सामने आकर हाजिर न होता तब तक के लिये थूकने का कार्यक्रम स्थगित किया गया है। तब भीड़ प्रतिक्रिया करती है। भीड़ में से कोई कहता है कि हाय कुरता' तो दूसरा कहता है कि हाय रोटी और तीसरा कहता है कि हाय चावल'। इस प्रकार पूरा वातावरण एक कीर्तन जैसा गूँज उठा कि हाय कुरता, हाय रोटी, हाय चावल'। आजादी के इतने दशकों के बाद आज भी दुनिया के सबसे बडे इस लोकतंत्र में बुनियादी सुविधाओं से वंचित जनता क्रान्ति की बजाय सत्ता केन्द्रों की पीक की भीख माँगती है। यह हमारी अनेक अस्पृहणीय वर्तमान वास्तविकताओं में से एक है।
उस नौजवान को किसी भी कीमत पर पकड़कर लाने का आदेश देता है शौक साहब। अगर वह आकाश में हो तो आकाश से, पाताल में हो तो पाताल से, कहीं भी क्यों न हो उसे चाहिए। लेकिन इस कहानी में काशीनाथ सिंह उसकी वापसी नहीं दिखाते हैं। लेकिन उसका बाप आता है और बाप से शौक साहब यही घोषणा करता है कि वह उस नौजवान को अपनी गद्दी देना चाहता है और आइन्दा वही नौजवान थूकने का यह कार्यक्रम जारी रखेगा। लेकिन अपनी निम्न जाति की ओर संकेत करते हुये बाप संदेह करता है। तब शौक साहब यह कहते हुये उन्हें आश्वस्त करते हैं कि जाति से कोई तकलीफ नहीं वह थूकने का कार्यक्रम अपने बाप पर ही थूककर शुरू करेगा। इसलिये दूसरों को इसमें कोई फरियाद नहीं होगा। कहानी का अन्तिम वाक्य है नौजवान मिला या नहीं, गद्दी पर बैठने के लिये कहा गया या नहीं, अपने बाप पर थूका या नहीं, थूका तो बाप ने कुछ किया या नहीं? इसमें सन्देह नहीं कि जवाब तो अच्छे से अच्छे दिये जाते हैं, मगर सुनने वालों का मन नहीं भरता।'' कहानी में ये तमाम सवाल अनुत्तरित हैं। लेकिन स्वतंत्र भारत के राजनैतिक इतिहास में ये सवाल अनुत्तरित नहीं है। आजादी के चार-पाँच साल बाद की कहानी को काशीनाथ अब पुनः क्यों प्रस्तुत करते हैं? वास्तव में उसके बहाने उत्सवधर्मी पूँजीवादी लोकतंत्र की अंदरूनी खोखलेपन का खुलासा ही करते हैं। उस खोखलेपन की निरंतरता का कारण संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपने इशारे पर नचाने वाले शौक साहब जैसे सामंतवादी पूँजीवादी शक्तियों का वर्चस्व है। यथास्थिति को सुरक्षित रखने के लिये वे प्रयत्नरत हैं। शौक साहब उस विद्रोही नौजवान को अपने उत्तराधिकारी बनाकर वही करना चाहते है। लेकिन वास्तविकता यथास्थिति की यांत्रिक निरंतरता मात्र नहीं है। रघुवीर सहाय की बात यहाँ सहज ही याद आ जाते है कि यथार्थ यथास्थिति नहीं है। यहाँ यथार्थ जनविरोधी यथास्थिति के विरूद्ध संघर्ष का इतिहास है। उसी यथार्थ को रेखांकित करना कहानीकार का लक्ष्य है।
आज की सबसे बड़ी त्रासदी सामाजिक सत्ता संरचना की अन्दरूनी सच को पहचानने की अर्न्तदृष्टि का अभाव है। हम सब देखते हैं, सुनते हैं और कभी-कभी सोचते हैं पर सच्चाई बहुत कम लोग ही समझते हैं। प्रायः सच का एक महाकाव्यात्मक पहलू हमारी नजरों के बाहर है। उसे देखने के लिये अर्न्तदृष्टि अनिवार्य है। ऐसे अवांछनीय सांस्कृतिक राजनीति आबो-हवा में श्रेष्ठता के तमाम प्रतिमान इतने बौने हो जाते है कि शौक साहब ही बारंबार बड़ा आदमी के रूप में प्रचारित-प्रसारित होकर जनप्रिय बन जाते है। समकालीन वास्तविकता से वाकिफ न होने की वजह से ही ऐसी त्रासदी बारंबार घटित होती हैं। इसे ही साहित्यकार और संस्कृतिधर्मी गलत समय कहते हैं। निराला, मुक्तिबोध, धूमिल, रघुवीर सहाय सरीके क्रांतदर्शी सांस्कृतिक कर्मियों ने ऐसे समय को अन्धेरा शब्द से अभिहित किया था। जब अन्धेरा और भी घुप हो गया है। उसे चीरकर ही जनता को वास्तविकता का अहसास दिया जा सकता है। ऐसे कठिन समय द्वारा प्रायोजित प्रतिमानों को तोड़ना संघर्षरत समकालीन सांस्कृतिककर्मी का दौत्य है। दुनिया की असलियतों से वाकिफ कराने के लिये ही काशीनाथ सिंह साहित्य साधना करते हैं। अपने उद्देश्य को व्यक्त करते हुये काशीनाथ सिंह सदी का सबसे बड़ा आदमी शीर्षक कहानी संग्रह की भूमिका में लिखते हैं - मैंने कुछ खास नहीं किया है, सिर्फ कहानियों की शक्ल में कुछ सुरंगे बनायी है जिनमें उतरने के बाद शायद आपको झरोखा मिले। उस झरोखे से झाँककर देखें और बतायें कि कैसी दुनिया दिखाई पड़ रही है। काशीनाथ सिंह की रचनाएँ इसके लिये साक्ष्य हैं। उनकी सदी का सबसे बड़ा आदमी' शीर्षक कहानी इस तथ्य को सत्यापित करती है।
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