Sunday, March 16, 2008

एहसास

एम० षण्मुखन
हर सफर के तले
किसी से मिलने
या कुछ हासिल करने का
मकसद होता है।
आँख भर देख
सुस्ताने
पसीना पोंछने
बात कर उलझनें
सुलझाने की खातिर
वक्त मयस्सर होता है।
पर टहलने में
गति नहीं होती है।
लगता है
पैर उकसाया गया है,
नापा जा रहा है -
रास्ता।
हर कदम के तले
भरी रहती है जगह।
आखिर
जगह नापते
हाथ लगते हैं
कहीं न पहुँचने का
एहसास
और रुख्सत पर
लौट आने की
तसल्ली मात्र ।

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