Sunday, March 30, 2008

मृग-तृष्णा

सीमा सचदेव
एक दिन
पड़ी थी
माँ की कोख में
अँधेरे में
सिमटी सोई
चाह कर भी कभी न रोई
एक आशा
थी मन में
कि आगे उजाला है जीवन में
एक दिन
मिटेगा तम काला
होगा जीवन में उजाला
मिल गई
एक दिन मंजिल
धड़का उसका भी दुनिया में दिल
फिर हुआ
दुनिया से सामना
पड़ा फिर से स्वयं को थामना
तरसी
स्वादिष्ट खाने को भी
मर्जी से
इधर-उधर जाने को भी
मिला
पीने को केवल दूध
मिटाई उसी से अपनी भूख
सोचा,
एक दिन
वो भी दाँत दिखाएगी
और मर्जी से खाएगी
जहाँ चाहेगी
वहीं पर जाएगी
दाँत भी आए
और पैरों पर भी हुई खड़ी
पर
यह दुनिया
चाबुक लेकर बढ़ी
लड़की हो
तो समझो अपनी सीमाएँ
नहीं
खुली हैं
तुम्हारे लिए सब राहें
फिर भी
बढ़ती गई आगे
यह सोचकर
कि भविष्य में
रहेगी स्वयं को खोजकर
आगे भी बढ़ी
सीढ़ी पे सीढी भी चढ़ी
पर
लड़की पे ही
नहीं होता किसी को विश्वास
पत्नी बनकर
लेगी सुख की साँस
एक दिन
बन भी गई पत्नी
किसी के हाथ
सौप दी जिन्दगी अपनी
पर
पत्नी बनकर भी
सुख तो नहीं पाया
जिम्मेदारियो के
बोझ ने पहरा लगाया
फिर भी
मन में यही आया
माँ बनकर
पायेगी सम्मान
और
पूरे होंगे
उसके भी अरमान
माँ बनी
और खुद को भूली
अपनी हर इच्छा की
दे ही दी बलि
पाली
बस एक ही
चाहत मन में
कि बच्चे
सुख देंगें जीवन में
बढ़ती गई
आगे ही आगे
वक़्त
और हालात
भी साथ ही भागे
सबने
चुन लिए
अपने-अपने रास्ते
वे भी
छोड़ गए साथ
स्वयं को छोड़ी जिनके वास्ते
और अब
आ गया वह पड़ाव
जब फिर से हुआ
स्वयं से लगाव
पूरी जिन्दगी
उम्मीद के सहारे
आगे ही आगे रही चलती
स्वयं को
खोजने की चिंगारी
अन्दर ही अन्दर रही जलती
भागती रही
फिर भी रही प्यासी
वक़्त ने बना दिया हालात की दासी
मीदों से
कभी न मिली राहत
और न ही
पूरी हुई कभी चाहत
यही चाहत
मन में पाले
इक दिन दुनिया छूटी
केवल एक
मृग-तृष्णा ने
सारी ही जिन्दगी लूटी

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